गरूड का श्रीकृष्ण से प्रश्न- दानपुण्य और धर्म कर्म से भी सद्गति न हो तो क्या करेंः श्रीकृष्ण ने सुनाया वृषोत्सर्ग का मर्म

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क्यों हुआ ब्राह्मण का अपहरण, कैसे मिला राजा वीरवाहन को स्वर्ग? श्रीकृष्ण ने बताया गरुड़ को
पक्षीराज गरुड़ अपनी एक शंका लेकर भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुंचे. गरुड़ ने उनसे पूछा कि हे भगवन- यदि कोई निरंतर दान पुण्य करता रहे, आपको भजता रहे तीर्थ- यज्ञ आदि करे तो भी कई बार उसे सद्गति की प्राप्ति नहीं होती ऐसा क्यों?
श्रीकृष्ण बोले- गरूड़ सभी धर्म कर्मों के अतिरिक्त वृषोत्सर्ग करना भी आवश्यक है. गरूड़ ने पूछा- प्रभु यह वृषोत्सर्ग क्या है, इसकी विधि क्या है? इसकी महिमा जानने की इच्छा है, कृपया बताएं.
गरुड की शंका के समाधान के लिए भगवान ने एक कथा सुनानी शुरू की. भगवन बोले- गरुड़ ब्रह्माजी के पुत्र महर्षि वशिष्ठ ने राजा वीरवाहन से जो कथा कही थी, वह सुनो. इससे तुम्हारी शंका का समाधान हो जायेगा.
प्राचीन काल में विराधनगर एक बहुत सुंदर नगर हुआ करता था. यहां का राजा था वीरवाहन. वीरवाहन की दयालुता, सत्यवादिता और दान-धर्म का डंका बजता था. प्रजा खुशहाल थी.
एक बार वीरवाहन शिकार के लिए गया. शिकार करते वह जंगल के बहुत भीतर तक गया तो उसे वहां महर्षि वशिष्ठ का आश्रम दिखा. राजा को काफी समय से एक जिज्ञासा थी. उसे जिज्ञासा शांत करने का उचित अवसर लगा और आश्रम में चला गया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
वीरवाहन वशिष्ठ को प्रणामकर उनके पास बैठ गया. वशिष्ठ ने राजा के आने का प्रयोजन पूछा. राजा ने कहा- महर्षि मैं इस चिंता में रहता हूं कि मुझसे अनजाने में भी कोई पाप या धर्मविरुद्ध कार्य न हो जाए.
मैं यथाशक्ति धार्मिक कार्य करता रहता हूं पर मुझे यमराज और उनके दूतों से बहुत भय लगता है कि कहीं मुझे अनजाने में हुए किसी पाप के चलते नरक न देखना पड़े. कोई ऐसी युक्ति बताएं जिससे मैं भयमुकत हो जाऊं.
वशिष्ठजी बोले- सद्गति के लिए गया तीर्थ में पितरों का श्राद्ध करने, दूसरे उपाय करने के बावजूद जो वृषोत्सर्ग यानी वृष दान नहीं करते उनके कार्य निष्फल रहते हैं. वृषोत्सर्ग से ब्रह्महत्या तक के पाप धुल जाते हैं. इसलिए विधिवत वृषोत्सर्ग करना चाहिए.
ब्राह्मण को श्वेत वृषभ अथवा सांड का, क्षत्रिय को भूरा लाल और वैश्य को पीला तथा काला सांड शूद्र के वृषोत्सर्ग के लिए उत्तम है. किस प्रकार के वर्ण और किस तरह के वृष का उत्सर्ग उत्तम रहेगा यह जानकर ही वृषोत्सर्ग करना चाहिए. इनमें नीला वृष सर्वोत्तम है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
वृषोत्सर्ग कराने वाले ब्राह्मण की उपस्थिति में इनके माथे पर शुभ तिलक लगाकर, बछियाओं से विवाह कराने के बाद जांघों पर त्रिशूल का निशान बनाकर और उसके बाद धूप दीप और नैवेद्य के साथ बताई गयी तिथि पर पूजा करके बंधनमुक्त कर देना चाहिए.
वशिष्ठ जी ने कहा- इसकी महिमा स्पष्ट करने के लिए मैं आपको कथा सुनाता हूं. त्रेता युग में विदेह नगर में एक ब्राह्मण रहता था- धर्मवत्स. पुरोहित का कार्य करके उसका जीवन चलता था. धर्मवत्स वृषोत्सर्ग कराने में निपुण था.
एक बार जब पितृपक्ष आने वाला था तो उसने यजमानों के लिए जंगल जाकर कुश इकट्ठा करने की सोची. वन में पलाश के पत्ते तथा कुश एकत्र करने लगा. पलाश के बढिया पत्ते और अधिक कुश की आशा में वह वन के थोड़ा भीतर चला गया.
अचानक धर्मवत्स ने देखा कि चार बहुत ही सजीले और सुंदर वस्त्रों से सुसज्जित पुरुष खड़े थे. धर्मवत्स मूर्तिवत खड़ा ही रह गया, वह यह नहीं पूछ पाया कि इस सघन वन में वे चारो कौन हैं, किस उद्देश्य से आये और क्या कर रहे हैं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
उन चारो युवकों ने धर्मवत्स की बांह और पैर पकड़ लिया और आकाशमार्ग से ले उड़े. भयभीत धर्मवत्स चिल्ला भी नहीं पाया. वे उसे वन के बहुत ऊपर आकाश में ले गए. पूछने पर उन युवकों ने कोई उत्तर नहीं दिया कि वे उसे कहां ले जा रहे हैं.
धर्मवत्स कई वन, नदियों, नगरों और बड़े ग्रामों के ऊपर से उड़ता रहा. वे जब एक बहुत घने जंगल के ऊपर से उड़ रहे थे तभी उन्हीं के बीच एक सुंदर नगर दिखायी दिया और उन्होंने धर्मवत्स को उसी नगर के एक उपवन में जा उतारा.
नगर बड़ा सुंदर था. संगीत की ध्वनि गुंज रही थी. कुछ सामान्य से दिखने वाले लोग दिखे, कुछ मैले कुचैले वस्त्र पहने लोग. इसके विपरीत कुछ लोगों के वस्त्र और आभूषण तो ऐसे थे जैसे वे देवता हों और स्वर्ग से सीधा यहीं आये हों.
धर्मवत्स को एक बार लगा कि वह या तो सपना देख रहा है अथवा मर चुका है. चारों युवक धर्मवत्स को यहां के राजा के सम्मुख ले गए जो सोने के वैभवशाली सिंहासन पर विराजमान था.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
सभा सजी थी और राजा आमोद में डूबा था. तभी धर्मवत्स को देख वह सब कुछ त्यागकर अपने दिव्य सिंहासन से उठ खड़ा हुआ. राजा व्यग्रता से धर्मवत्स की ओर बढा. राजा ने धर्मवत्स का स्वागत पैर छूकर किया और आसन दिया.
राजा ने कहा- हे ब्राह्मणदेव आप जैसे विष्णुभक्त के दर्शन से मेरा कुल पवित्र हो गया. राजा ने उन चारों युवकों को आदेश देते हुए कहा कि ब्राह्मण श्रेष्ठ को इनकी दक्षिणा समेत जहां से लाये थे वही जस का तस छोड़ आओ.
धर्मवत्स ने राजा से अपनी जिज्ञासा व्यक्त की और कहा- पहले मुझे यह बताएं कि मुझे यहां क्यों लाया गया, आप कौन हैं? मेरी पूजा आपने क्यों की और फिर अब इस तरह वापस क्यों भेज रहे हैं? कृपया उचित उत्तर अवश्य दें.
महाराज ने कहा- हे विप्रवर आप एक अत्यंत श्रेष्ठ ब्राहमण है जो अपने कर्मों के प्रति सचेत और पवित्र हैं साथ ही वृषोत्सर्ग के सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता हैं. हमें आपके दर्शन के लाभ लेने थे सो हम आपको यहां लाये. फिर भी इस तरह लाने के लिये क्षमा.
आपने पूछा है कि मैं कौन हूं, तो स्वयं अपने मुख से अपने संबंध में बखान नहीं करूंगा. मेरे यह मंत्री विपश्चित आपको मेरे बारे में बताएंगे हो सकता है इससे आपकी जिज्ञासा शांत हो.
मंत्री विपश्चित ने धर्मवत्स को प्रणामकर कहा- हे श्रेष्ठ बाह्मण, मैं आपको अपने राजा विपश्चित और उनके ऐश्वर्य प्रताप के बारे में बताने से पहले आपको पूर्वजन्म की एक कथा सुनाता हूं.
मंत्री ने क्या कथा सुनाई. उस कथा में ऐसा क्या था जो वशिष्ठजी राजा वीरवाहन को सुनाई जिससे उसका न केवल भय ही मिटा ब्लकि वह स्वर्ग का अधिकारी हुआ. कथा का दूसरा हिस्सा थोड़ी देर में पढें.
संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली