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गणेश अवतारः मद का नाश करने वाला है गणेशजी का एकदंत अवतार, ऋणमुक्ति का मंत्र

गणेश अवतारः मद का नाश करने वाला है गणेशजी का एकदंत अवतार, ऋणमुक्ति का मंत्र

ganpati
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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंच्यवन ऋषि ने मद नामक एक असुर को पैदा किया. मद बहुत बलवान और पराक्रमी दैत्य था. च्यवन तो ऋषि थे. उन्होंने मद को अपने भाई और दैत्यों के गुरू शुक्राचार्य के पास भेज दिया.

मद दैत्यगुरु शुक्राचार्य के पास गया और समस्त ब्रह्माण्ड का स्वामी बनने की इच्छा प्रकट की. शुक्राचार्य ने कहा कि ऐसा संभव है यदि मद घोर तप करके अतुलित शक्तियां प्राप्त कर ले.

शुक्राचार्य ने मदासुर को अपना शिष्य बना लिया और शक्ति के एकाक्षरी मंत्र ह्रीं की विधिपूर्वक दीक्षा दी और तप का तरीका बताया. मदासुर अपने गुरु से दीक्षा लेकर वन में चला गया और काफी वर्षों तक कठोर तपस्या करता रहा.

उसके शरीर में चींटियों ने अपने घर बना लिए. दीमक ने अपनी बांबियां बना लीं. उसके शरीर पर ही छोटे-छोटे पौधे उग आये. इतना लंबा तप था कि उसने जिस स्थान पर ध्यान लगाया था उसके चारों और बड़े-बड़े वृक्ष उग आए.

ऐसी तपस्या से माँ शक्ति प्रसन्न हुईं और मदासुर को वरदान मांगने को कहा- मदासुर ने उनसे निरोगी काया और समस्त ब्रह्माण्ड को अपनी शक्ति से जीतने का वरदान मांग लिया.देवी से शक्तियां प्राप्तकर मदासुर लौटा तो शुक्राचार्य ने उसे असुरों का राजा नियुक्त कराया. मदासुर ने पहले सम्पूर्ण धरती पर अपना साम्राज्य स्थापित किया. फिर स्वर्ग पर चढ़ाई की. इन्द्र को जीतकर वह स्वर्ग का भी शासक बन बैठा.

शुक्राचार्य के सुझाव पर मदासुर ने एक अन्य असुर राजा प्रमदासुर की कन्या सालसा से विवाह किया. उससे उसे तीन पुत्र हुए. देवी के वरदान के प्रभाव से उसने शूलपाणी भगवान शिव को भी टिकने न दिया.

सर्वत्र असुरों का क्रूरतम शासन चलने लगा. पृथ्वी पर स्वाहा, स्वधा और वषटाकार जैसे समस्त धर्म-कर्म लुप्त हो गए. देवताओं एंव मुनियों के दुख की कोई सीमा न रही. सर्वत्र हाहाकार मच गया.

चिन्तित देवता सनत्कुमार के पास गए तथा उनसे उस असुर के विनाश एवं फिर से धर्म-स्थापना का उपाय पूछा. सनत्कुमार ने कहा -देवगण आप लोग श्रद्धा-भक्तिपूर्वक भगवान एकदन्त की उपासना करें. वही आप लोगों का मनोरथ पूर्ण करेंगे.

महर्षि के उपदेशानुसार देवगण भगवान एकदन्त की उपासना करने लगे. तपस्या के सौ वर्ष पूरे होने पर मूषक के वाहन पर सवार भगवान एकदन्त प्रकट हुए तथा वरदान मांगने को कहा.देवताओं ने निवेदन किया- प्रभो! मदासुर के शासन में देवगण स्थानभ्रष्ट और मुनिगण कर्मभ्रष्ट हो गए हैं. आप हमें इस कष्ट से मुक्ति दिलाकर अपनी भक्ति प्रदान करे.

उधर देवर्षि नारद ने ने मदासुर को सूचना दी कि भगवान एकदन्त ने देवताओं को वरदान दिया है. अब वे तुम्हारा प्राण- हरण करने के लिए तुमसे युद्ध को शीघ्र आएंगे.

मदासुर अपनी विशाल सेना लेकर स्वयं भगवान एकदन्त से युद्ध करने के लिए चला. भगवान एकदन्त रास्ते में ही प्रकट हो गये. राक्षसों ने देखा कि भगवान एकदन्त सामने से चले आ रहे हैं.

वह मूषक पर सवार हैं. उनकी आकृति अत्यन्त भयानक है. उनके हाथों मैं परशु, पाश आदि आयुध हैं. उन्होंने असुरों से कहा की तुम अपने स्वामी से कह दो यदि वह जीवित रहना चाहता है तो देवताओं से द्वेष छोड़ दे.

उनका राज्य उन्हें वापस कर दे. अगर वह ऐसा नहीं करता है तो मैं निश्चित ही उसका वध करूंगा. महाक्रूर मदासुर युद्ध के लिए तैयार हो गया. जैसे ही उसने धनुष पर बाण चढ़ाना चाहा कि भगवान एकदन्त का तीव्र परशु उसे लगा.वह बेहोश होकर गिर गया. उसका सारथी उसे युद्धभूमि से लेकर भागा. बेहोशी टूटने पर मदासुर समझ गया कि यह सर्वसमर्थ परमात्मा ही हैं. इनसे जीत पाना संभव न होगा.

उसने हाथ जोड़कर स्तुति करते हुए कहा- प्रभो ! आप मुझे क्षमाकर अपनी दृढभक्ति प्रदान करें. एकदन्त ने प्रसत्र होकर कहा कि जहां मेरी पूजा आराधना हो वहां तुम कभी मत जाना. आज से तुम पाताल में रहोगे.

देवताओं को उनका लोक वापस मिल गया था. उन्होंने भी प्रसत्र होकर एकदन्त की स्तुति की और फिर अपने लोक चले गए.

ऋणहर्ता गणेश मंत्रः
ऊं गणेश ऋणं छिन्धि वरेण्यं हुं नमः फट्
गणपति को शोडषोपचार पूजा(एप्प में देखें षोडषोपचार पूजा विधि) के बाद इसका जप आरंभ करना चाहिए. इस मंत्र के एक लाख जप करने से सिद्धि हो जाती है. ऋणहर्ता मंत्र से सिद्ध व्यक्ति को ऋणमुक्ति का मार्ग मिल जाता है.

इसके अलावा दरिद्रता का नाश होता है और साधक धनवान व ज्ञानवान बनता है. मंत्र जप के बाद ऋणहर्ता गणेश स्तोत्र का पाठ भी कर लेना चाहिए.

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