धन का लालच प्रेरक कहानी– खाली हाथ आए थे, खाली हाथ जाएंगे
धन का लालच प्रेरक कहानी।
खाली हाथ आए थे, खाली हाथ जाएंगे।
यह धन का लालच प्रेरक कहानी एक दुराचारी राजा की कथा है, जिसे भ्रम हो जाता है कि अधिक से अधिक धन जमा करके वह सदा शक्तिशाली बना रहेगा। एक संत की सरल लेकिन गहरी शिक्षा उसे स्मरण कराती है कि इंसान खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही जाता है, इसलिए धन का सही उपयोग परोपकार और प्रभु सुमिरन में ही है।

एक दुराचारी राजा और धन का लालच
एक राजा बड़ा दुराचारी था। उसे किसी ने समझा दिया था कि उसके पास यदि ज्यादा से ज्यादा धन होगा तो उसकी सत्ता को कोई चुनौती नहीं दे सकेगी। वह हमेशा राजा बना रहेगा और सभी उससे डरेंगे।
इसी लालच में उसने सोचा कि उसे आस-पड़ोस के राजाओं से भी ज्यादा अमीर होना चाहिए। उसने अधिक से अधिक धन जमा करने के फेर में प्रजा पर तरह-तरह के कर लगा दिए। समय-समय पर राजा को उपहार देने की परंपरा चला दी।
प्रजा कर चुकाने में कितना कष्ट सहती है, इसका राजा को ख्याल नहीं रहता। प्रजा उसे कर चुकाने और उपहार देने के चक्कर में किन-किन संकटों से गुजरती है, उससे वह पूरी तरह अनजान था। धन का यह लालच प्रेरक कहानी हमें दिखाती है कि जब शासक केवल धन के मोह में अंधा हो जाए, तो प्रजा का जीवन कितना कठिन हो सकता है।
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राज्य में संत का आगमन – दुखी प्रजा की विनती
एक दिन एक संत उस राज्य में आए। लोगों ने उन्हें राजा की सनक के बारे में बताया और उनके दुख को दूर करने का कोई हल निकालने की विनती की।
जब संत राजा से मिलने उसके दरबार में गए तो उन्होंने भी कुछ कंकड़-पत्थर सड़क से उठाए और अपनी दोनों मुठ्ठियों में भरकर रख लिए। उन्होंने उन्हें दबाकर अपनी मुठ्ठी में भींच रखा था।
राजा ने उन्हें आदर से बैठने का आसन दिया। संत अपने आसन पर बैठने लगे, तभी उनकी मुठ्ठी में रखे कुछ कंकड़ छिटककर फर्श पर गिर पड़े। राजा ने उन कंकड़ों को उठाकर देखा।
राजा ने आश्चर्य में भरकर पूछा – “गुरुदेव, आपने ये कंकड़ किसलिए इकठ्ठे करके रखे हैं?”
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संत की शिक्षा- धन का लालच छोड़ो, साथ नहीं जाता

संत मुस्कुराकर बोले – “मैंने इसे इसलिए रखा है कि मरने के बाद इन्हें अपने साथ लेकर जाऊंगा और ईश्वर को उपहार स्वरूप दूंगा।”
राजा उनकी बात सुनकर हंसने लगा। उसने कहा – “आप तो संत हैं। संत तो सदा मोह-माया से दूर रहते हैं। आपके जैसा परमज्ञानी भी मरने के बाद कुछ ले जाने की बात सोचता है, यह सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है।
महात्मन! क्या आपने यह नहीं सुना कि इंसान संसार में खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही जाता है? मरते समय तो उसकी मुठ्ठी खुली रहती है। परलोक जाने वाली आत्मा कंकड़ तो दूर, एक कण भी अपने साथ नहीं लेकर जा सकती।”
राजा की बात सुनकर संत बोले – “यही तो मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि आप अपनी प्रजा को कष्ट में डालकर जो इतना सारा धन जमा कर रहे हैं, उसे क्या अपने साथ लेकर जाएंगे? आप तो समझदार हैं, आप यह धन अकारण तो जमा नहीं कर रहे होंगे। आप इतना सारा धन अपने साथ लेकर जाने के लिए ही तो जमा कर रहे होंगे। कृपा कर मुझे भी वह विधि बता दें जिससे मैं भी अपने साथ कुछ कंकड़-पत्थर ही सही, उपहार स्वरूप ले जा सकूं।”
धन का लालच प्रेरक कहानी का यह प्रसंग हमें याद दिलाता है कि मृत्यु के समय न राजा की सत्ता साथ जाती है, न उसका खजाना; केवल उसके कर्म ही ईश्वर के सामने उपस्थित होते हैं।
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राजा को मिली सच्ची संपत्ति
संत ने कहा – “जैसे कोई पिता अपने धन से नहीं, अपितु योग्य संतान के कारण समृद्ध और सुखी अनुभव करता है, वही बात राजा और प्रजा के बीच होनी चाहिए। यदि किसी पिता की संतान अयोग्य हो, तो वह उसके द्वारा जमा किए गए अनंत धन को नष्ट कर देती है, और संतान योग्य हो तो सम्मान के साथ पिता के सुख के लिए धन जमा कर सकती है।
प्रजा तो राजा के लिए संतान जैसी होती है। यदि प्रजा प्रसन्न है तो राजा समर्थवान है। तुम जिन पड़ोसी राजाओं से सामर्थ्य में बड़ा होने के लिए अपनी संतान जैसी प्रजा पर जुल्म कर रहे हो, वही प्रजा एक दिन विद्रोह कर देगी। तुम्हारे शत्रुओं को बाहर से आने की आवश्यकता कहां होगी।”
यह धन का लालच प्रेरक कहानी हमें सिखाती है कि राजा की वास्तविक ताकत खजाने में रखे सोने-चांदी से नहीं, बल्कि उसकी प्रजा की प्रसन्नता और विश्वास से आती है। जब प्रजा दुखी हो जाती है, तो धन के ढेर भी राजसत्ता को बचा नहीं पाते।

धन का मोह, परलोक और ईश्वर के सामने उत्तरदायित्व
यह कथा समझाती है कि जिस धन को येन-केन-प्रकारेण जमा करने की सनक में हम निरंतर गिरते चले जाते हैं, वह अंततः हमें अंदर से खाली कर देता है। सोचिए, ईश्वर के सामने क्या मुख दिखाएंगे?
आप चाहे जितना भी कमाते हों, उसका एक छोटा सा ही हिस्सा सही, लेकिन रखें जरूर परोपकार के लिए, ईश्वर कार्य के लिए। जिस धन में परोपकार और धर्म का अंश न हो, वह केवल अहंकार और भय का कारण बन जाता है।
खाली हाथ आए थे, खाली हाथ जाएंगे – यह भाव इस धन का लालच प्रेरक कहानी के केंद्र में है। जमा ही करना है तो प्रभु सुमिरन का धन जमा करिए। इस लोक और उस लोक, दोनों में बस वही साथ निभाएगा, वही पार लगाएगा।
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जीवन की सीख – धन के लालच से ऊपर उठें
सोचिए, ईश्वर के सामने हम क्या उत्तर देंगे, जब यह पूछा जाएगा कि आपने अपने धन से किसका दुख दूर किया, किसके जीवन में प्रकाश लाया?
धन का लालच प्रेरक कहानी हमें प्रेरित करती है कि हम चाहे जितना भी कमाएँ, उसका एक हिस्सा निश्चित रूप से परोपकार और धर्मकार्यों में लगाएँ। प्रजा, समाज और जरूरतमंदों के लिए किया गया परोपकार ही वह धन है जो वास्तव में हमारे साथ रहता है।
धन स्वयं लक्ष्य नहीं है, साधन है। जब धन के कारण प्रजा दुखी हो, जब कर के बोझ से लोग टूटने लगें, जब उपहार देने की परंपरा अत्याचार बन जाए, तब राजा हो या सामान्य व्यक्ति – उसे रुककर सोचना आवश्यक है। जमा ही करना है तो प्रभु सुमिरन का धन, अच्छे कर्मों का धन, सेवा और करुणा का धन जमा करिए। यही धन इस लोक में भी सुख देगा और उस लोक में भी पार लगाएगा।
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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