ब्रह्मराक्षस और महातांत्रिक के बीच संग्राम की काशी की सत्यकथा
आपने ब्रह्मराक्षस के बारे में शायद कहीं सुना हो। ब्रह्मराक्षस के साथ एक महातांत्रिक के काशी के श्मशान में चौदह रात्रि तक चले संग्राम की सत्यकथा लेकर आए हैं। ब्रह्मराक्षस के साथ महातांत्रिक के इस संग्राम के गवाह हैं कुछ इंजीनियर। पढ़ें इसे, बुरी शक्तियों से आपको निडर बनाने के लिए ये कथाएं लेकर आते हैं।
घटनास्थल है काशी क्षेत्र। जहां महातांत्रिक की साधना स्थली थी। एक दिन वह ध्यान में बैठे हुए थे। तभी बनारस-मिर्जापुर हाईवे पर काम कर रहे एक प्रोजेक्ट के मुख्य इंजीनियर अपने एक परिचित के साथ उनकी कुटिया में पहुंचे। उन्होंने बताया कि जिस प्रोजेक्ट पर वह काम कर रहे हैं। वहां एक स्थान पर दो ब्रह्म-राक्षसों ने उत्पात मचाया हुआ था।
कई औघड़ों को उन दोनों ने परास्त कर दिया था। वे इतने प्रबल थे कि औघड़ उनसे लड़ने के बाद अपनी विद्या गंवा बैठते तथे उनसे लड़ने के बाद वे खाली हो जाते थे यानी अपनी सारी विद्या गंवा बैठते थे। इसलिए कोई अब वहां जाना नहीं चाहता था। दोनो ब्रह्मराक्षसों का अहंकार लगातार बढ़ता जा रहा था। वे दोनों जैसा चाहते वैसा ही करते। सड़क नहीं बनने देते थे। वहां तीन वर्षों तक काम ठप्प रहा।
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जब बात नहीं बनी तो मुख्य इंजीनियर किसी के साथ महातांत्रिक के पास आया। अपनी व्यथा सुनायी। महातांत्रिक किसी की रोजी-रोटी नहीं खराब होने देना चाहते थे। अतः तैयार हो गए। वे अगले दिन उस इंजीनियर के साथ वहीँ पहुंचे। जहाँ ये बाधा आयी हुई थी। क्या ट्रक और क्या बुल्डोज़र सभी ऐसे सरक जाते थे, कि जैसे खिलौने हों। ऐसा तीन वर्षों से हो रहा था।
मुख्य इंजीनियर की नौकरी पर बात आने वाली थी। बहुत परेशान था बेचारा। हालांकि पहले ऐसी बातों को दरकिनार किया करता था। यक़ीन नहीं था उसको। पर जब बहुत जतन करके हार गया तब विवश हो गया। उसको किसी ने बताया था। महातांत्रिक के बारे में और इसीलिए आया था वो।
मुख्य इंजीनियर के साथ महातांत्रिक जा पहुंचे वहाँ। उन्होंने देखा वहाँ दो वृक्ष थे। बड़े बड़े कई सौ वर्षों पुराने। यहीं थे वो दोनों ब्रह्म-राक्षस। यहाँ तो द्वन्द सम्भव नहीं था। अतः उन्होंने उनको ही अब वहीँ उनके स्थान पर आमन्त्रित करने की सोची।
आराम से और सुलभता से तो मानने वाले वो थे नहीं। अतः उन्होंने उन पेड़ों के मध्य में मूत्र-त्याग कर दिया और अपना चिन्ह अंकित कर दिया। इसके बाद महातांत्रिक अपने स्थान पर वापस हो गए। धार्मिक व प्रेरक कथाओं के लिए प्रभु शरणम् के फेसबुक पेज से जु़ड़े, लिंक-कुछ मंत्र पढ़ते हुए आ गए वापस अपने स्थान पर और जुट गए तैयारियों में। अपनी साधनास्थली वाले श्मशान में उस रात अकेले ही पहुंचे वो। आसन लगाया और इक्कीस कपाल सजाये और कर दिया आह्वान। तेज हवा चलने लगी, पेड़ झुक गए, मिट्टी उड़ने लगी।
महातांत्रिक को उनके खबरियों ने सूचना दी। जिसे सुनकर उन्होंने अट्ठहास किया। तभी वे दोनों ब्रह्मराक्षस प्रकट हो गए। तमतमाता चेहरा लिए।
ब्रह्मराक्षसों ने कहा- हमारे स्थान को अपवित्र करने के लिए माफी मांग और हमारा भोग दे। वरना तेरा भी सर्वनाश कर देंगे।महातांत्रिक को भी क्रोध आया, उऩ्होंने अपना औघड़ी रुप दिखाया। उनका तो उद्देश्य ही उन दोनों को सबक सिखाना था, फिर क्षमा कैसे मांगते।
उन्होंने और कह दिया कि ये जानते हुए कि तुम दोनो वहां निवास करते हो। फिर उन्होंने वहां मूत्र-त्याग किया और बोले तुमसे जो बन पड़े कर लो।
युद्ध शुरु हुआ, जो चला चौदह रात्रि तक। चौदह रात्रि तक महातांत्रिक से उन दोनों ब्रह्मराक्षसों का महासंग्राम हुआ। मजे की बात यह कि सूर्योदय के साथ ही विश्राम हो जाता और सूर्यास्त होते ही युद्ध की घोषणा। काली शक्तियां रात में ही प्रभावी होती हैं। ब्रह्मराक्षस रात्रि में आ जाते युद्ध को।
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धार्मिक व प्रेरक कथाओं के लिए प्रभु शरणम् के फेसबुक पेज से जु़ड़े, लिंक-आखिर में अपनी सप्त-पाश विद्या से बाँध ही लिए वे दोनों और डाल दिए एक कलश में। मानव चर्म से ढका उस कलश को और गाड़ दिया श्मशान में स्थित अपनी धूनी के बगल में। अब काम वाली जगह पर कोई रोक नही बची।
अगले ही दिन सड़क बननी शुरु हो गई। अब कोई अड़चन न रही। मुख्य इंजीनियर बहुत प्रसन्न हुआ। पाँव पड़ गया महातांत्रिक के। उनको धन देने की इच्छा ज़ाहिर की। पर उन्होंने कुछ भी नहीं लिया। लेकिन जब मुख्य इंजीनियर ने जिद ही पकड़ ली। तो महातांत्रिक ने एक कन्या के लिए श्रृंगार मांग लिया जो कि इंजीनियर ने हंसी-ख़ुशी दे दिया।
महातांत्रिक ने वो श्रृंगार माँ गंगा को समर्पित कर दिया। माँ गंगा से अथाह प्रेम था उन्हें। घण्टों गुजार देते उसके निर्मल जल में साधना करते करते।
ये आज से लगभग साठ वर्ष पहले की बात है। उस समय गंगा जी का पानी इतना निर्मल था कि निचला तल भी दीखता था। उसमे पड़े सिक्के सब दीखते थे। ये काशी के घाट थे।
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उधर दो वर्षों में उस सड़क का कार्य संपूर्ण हो गया। अब उन दोनों ब्रह्मराक्षस को मुक्त करना था। महाऔघड़ ने उनसे बहुत चाकरी करवायी थी। असमय फल लगवाए थे, कुँए खुदवा दिए थे, साफ़-सफाई करवाई थी लेकिन एक रात्रि को माँ गंगा के तट पर उन दोनों को मुक्त कर दिया।
दोनों ब्रह्मराक्षस प्रसन्न हो गए। जरुरत पड़ने पर कभी भी प्रकट होने का वचन दिया। उनका निवास नष्ट हो चुका था इसलिए महातांत्रिक ने उनको हिमालय में बसने का सुझाव दिया। दोनो ब्रह्मराक्षस संन्यासी का रूप धारण कर उसी रात्रि प्रस्थान कर गए। इसके बाद महातांत्रिक ने जीवन भर उन दोनों ब्रह्मराक्षस से फिर कभी मुलाक़ात नहीं की।आपको यह पोस्ट कैसी लगी, अपने विचार लिखिएगा. प्रभु शरणम् ऐप्प में ऐसे उपयोगी पोस्ट बहुत मिल जाएंगे. छोटा सा ऐप्प है. करीब पांच लाख लोग उसका प्रयोग करके प्रसन्न हैं. आप भी ट्राई करके देखिए. अच्छा न लगे तो डिलीट कर दीजिएगा.
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