अंधकासुर ने की अपनी माता पार्वती के हरण की कोशिश, क्रोधित शिव ने सारी असुर सेना का नाश कर दियाः अंधकासुर कथा भाग-2

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पिछला भाग पढ़ने के लिये क्लिक करे पहले भाग में आपने पढ़ा कि शिव-पार्वती के अंश से उत्पन्न अंधक को महादेव ने असुरराज हिरण्याक्ष को दे दिया. अंधक ने ब्रह्माजी को प्रसन्नकर अपनी मृत्यु की शर्त रखी कि अपनी जननी पर आसक्ति उसकी मृत्यु का कारण बने.
अंधक अपनी जननीस्वरूपा माता पार्वती पर रीझ गया और उन्हें प्राप्त करने के लिए तरह-तरह के यत्न करने लगा. अंधकासुर के दूतों ने पार्वतीजी के रूप का जो वर्णन किया उसे सुनकर वह मोहित था.
उसने शिवजी के पास दूत भेजकर कहलवाया कि वह पार्वतीजी को अंधक को दे दें. महादेव ने उन्हें भगा दिया तो अंधक ने पार्वतीजी को बस से प्राप्त करने की कोशिश की. उसने सेना भेजकर कैलाश पर चढ़ाई की पर शिवगणों ने उसे मारकर भगा दिया.
इस पराजय से बौखलाया अंधकासुर बड़ी सेना लेकर स्वयं युद्ध के लिए आया. महादेव से उसका कई वर्षों तक संग्राम हुआ. महादेव अपना पुत्र समझकर उसका वध नहीं करना चाहते थे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
उन्होंने अंधक को समझाने का बहुत प्रयास किया पर वह तो मानने को राजी ही न था. महादेव ने उसे पराजित कर दिया किंतु यह सोचकर वध नहीं किया कि शायद उसे सदबुद्धि आ जाए.
अंधकासुर के सिर पर काल सवार हो गया था. उसने भोलेनाथ की कृपा का मर्म नहीं समझा. प्रतिशोध में जलते अंधकासुर ने पार्वतीजी के अपहरण की योजना बनाई. वह मौके की प्रतीक्षा में था.
एक दिन उसे पता चला कि शिवजी अपने गणों के साथ कैलाश से दूर गए हैं तो वह कैलाश आया और देवी का हरण करने की कोशिश की. देवी ने अपनी शक्तियों के साथ उससे संघर्ष किया. किंतु अंधकासुर भी तो उनके और महादेव का एक अंश था.
इसलिए उसे पराजित करना आसान न था. देवी ने इंद्र से सहायता मांगी. इंद्र अपनी सेना का साथ आए और भयानक संग्राम छिड़ा लेकिन अंधक पर विजय करना सरल न था. देव सेना पराजित होने लगी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
देवी ने महादेव का आह्वान किया. वह तत्काल पहुंचे. उन्होंने अंधक को पकड़ लिया और उसे फिर से समझाने की कोशिश की परंतु वह नहीं माना. महादेव ने कहा कि तुम दो नेत्रों से अंधे थे इसलिए मैंने तुम्हारे दो अपराध क्षमा किए हैं.
यह अंतिम चेतावनी है. उन्होंने अंधक को जीवनदान दे दिया. अंधकासुर के बार-बार पराजित होने से असुरों के बीच उसकी अहमियत कम होने लगी. इसलिए उसने प्रचंड संग्राम की तैयारियां शुरू कीं.
चचेरे भाई प्रहलाद ने भी उसे समझाने का प्रयास किया लेकिन वह नहीं माना. अंधकासुर का एक महाबलशाली मित्र और सेनापति था-बाली. अंधक को इस बात का क्रोध था कि इंद्र ने यदि सहायता न की होती तो वह पार्वतीजी का हरण कर लेता.
उसने बाली को देवों का नाश करने भेजा. बाली ने सेना समेत देवलोक पर चढ़ाई की और सभी देवताओं को निगल लिया. महादेव के क्रोध की सारी सीमाएं टूट चुकी थीं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
उन्होंने बाली पर भयानक आघात किया. आघात इतना प्रचंड था कि बाली आकाश में गोल-गोलकर चक्कर खाने लगा और उसके पेट से सभी देवता बाहर निकल आए.
जब देवता सुरक्षित निकल आए तो महादेव ने उसका सेना सहित अंत कर दिया. अंधकासुर इस विनाश के लिए तैयार न था. वह सेना विहीन हो चुका था.
उसने असुरगुरू शुक्राचार्य को कहा कि वह मृत संजीवनी विद्य़ा का प्रयोगकर असुरों को जीवित करें. महादेव शुक्राचार्य के गुरू थे. उन्होंने शुक्र को ज्ञान दिया था.
शुक्र अपने गुरू से शत्रुता करना नहीं चाहते थे पर असुर सेना का समूल नाश होने के कारण वह तैयार हो गए क्योंकि वह दैत्यों के गुरू थे.
शुक्राचार्य शिवजी द्वारा प्रदत्त मृत संजीवनी विद्या के बल पर असुरों को जीवित करने लगे. महादेव को यह खबर हुई तो वह बड़े क्रोधित हुए. शुक्राचार्य को यह विद्या स्वयं महादेव ने विश्व कल्याण के लिए सिखाई थी.
परंतु वह तो शिवद्रोहियों का कल्याण कर रहे हैं. महादेव के क्रोध की कोई सीमा न रही. उन्होंने शुक्राचार्य को ही निगल लिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
शुक्राचार्य असुरों के गुरू क्यों बने थे और वह उनकी सहायता क्यों करते थे, इसके पीथे एख लंबी कथा है. देवगुरू बृहस्पति के पिता अंगीरस द्वारा शुक्राचार्य के साथ बड़ा भेदभाव हुआ था.
बृहस्पति और शुक्राचार्य दोनों अंगिरस के शिष्य थे और साथ-साथ अध्ययन करते थे लेकिन अंगीरस ने शिक्षा देते समय शुक्र के साथ भेदभाव किया था. अपने पुत्र बृहस्पति को उन्होंने ज्यादा शिक्षा दी.
इससे दुखी होकर शुक्र कश्यप की शरण में गए थे. शुक्र ने अपनी पीड़ा कश्यप से बताई और उन्हें शिक्षा देने का अनुरोध किया था. कश्यप ने समझाया था कि शिव विश्व के गुरू हैं. उनसे श्रेष्ठ कोई गुरू नहीं. तुम उन्हें प्रसन्न करो.
कश्यप की युक्ति पर शुक्र ने कैसे महादेव से मृत संजीवनी विद्या सीखी. यह प्रसंग बड़ा सुंदर है किंतु लंबा है. शुक्राचार्य को शिवजी के वरदान की कथा को कुछ देर में विस्तृत रूप में अगली पोस्ट में सुनाउंगा.
संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली