अक्षय तृतीया बीतने से पहले जरूर पढ़ लें. दूसरा मौका सालभर बाद आएगा
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया या आखा तीज कहा जाता है. अक्षय तृतीया को सूर्य और चंद्र दोनों ही उच्च के होते हैं. इस कारण अक्षय तृतीया को अत्यंत शुभ दिन माना जाता है. पूरे दिन कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है जिसका फल विशेष रहता है. इस बार 7 अप्रैल 2019 को है अक्षय तृतीया.
अक्षय तृतीया को भगवान विष्णु के नर-नरायण, हयग्रीव और परशुराम- तीन अवतार हुए हैं. त्रेतायुग की शुरुआत भी इसी शुभ तिथि से मानी जाती है. इस दिन माता लक्ष्मी की विशेष पूजा करने की रीति है.
पौराणिक कथाएँ, व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र, गीता ज्ञान-अमृत, श्रीराम शलाका प्रशनावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ने के हमारा लोकप्रिय ऐप्प “प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प” डाउनलोड करें.
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हमारा फेसबुक पेज लाइक कर लें इससे आपको प्रभु शरणम् के पोस्ट की सूचना मिलती रहेगी. इस लाइन के नीचे हमारे फेसबुक पेज का लिंक है उसे क्लिक करके लाइक कर लें.अक्षय तृतीया को माता लक्ष्मी की उपासना से भी विशेष रूप से देखा जाता है. इस साल यानी 7 मई 2019 में अक्षय तृतीया का अद्भुत संयोग बन रहा है. ऐसा पूरे एक दशक बाद हो रहा है. चार ग्रह- सूर्य, शुक्र, चंद्र और राहु अपनी उच्च राशि में गोचर करेंगे. इससे पहले वर्ष 2003 में 5 ग्रहों का ऐसा योग बना था. कुल मिलाकर देखा जाए तो मानव जीवन पर इनका प्रभाव बेहतर होगा. हालांकि आपकी कुंडली के हिसाब से ग्रहों के प्रभाव अलग-अलग हो सकते हैं.
अक्षय तृतीया 2019 का शुभ मुहूर्त
इस मुहूर्त में सोना खरीदना बहुत शुभ माना जाता है.
7 मई – सुबह 06:26 से रात 11:47 तक
गृहस्थों के लिए लक्ष्मी परम आवश्यक है. अक्षय तृतीया माता लक्ष्मी की वर्षभर के लिए विशेष उपासना आरंभ करने का शुभ दिन है. आज हम आपको कुछ उपयोगी मंत्र आदि से परिचित करा रहे हैं जिन्हें आप माता लक्ष्मी के प्रतिदिन पूजन में शामिल कर लें. बहुत ज्यादा विधि-विधान नहीं कहेंगे.
माता लक्ष्मी को अपनी माता समझिए. उनसे अपराधों के लिए क्षमा याचना करिए और आवश्यकतानुसार धन प्रदान करने की याचना करिए. कभी कमी न होगी, आप यकीन करिए. हां, अगर आपकी आवश्यकता ही रोज सुरसा की तरह मुंह फैलाती जाए तो फिर कहना मुश्किल है.
आज आपको मैं प्रतिदिन की पूजा में तीन प्रकार की चीजें बताऊंगा. अपनी सुविधा से इसे आप करें. एक पूजन में आपको दैनिक पूजा में 2 अतिरिक्त मिनट देने होंगे. दूसरे में करीब 4 से 5 मिनट रोज के अतिरिक्त लगेंगे और तीसरी में रोज के 6 से 7 अतिरिक्त मिनट.
आप जिसमें सुविधा महसूस करें वह पूजा करें पर जो भी मंत्र आराधना आज से आप आरंभ करेंगे उसे कम से कम एक साल तक करना है.
इसमें ध्यान देने की एक बात और है कि परिवार की किसी भी महिला चाहे वह माता, सास, बहन, पत्नी, बेटी, का भूले से भी अपमान न हो अन्यथा अपेक्षित फल नहीं मिलता.
अक्षय तृतीया को पूरा दिन शुभ मुहूर्त का होता है. जब सुविधा हो तब से आरंभ कर सकते हैं पूजन. यदि भोजन आदि ग्रहण कर लिया हो तो भी कोई बात नहीं. स्नान कर लें और फिर भगवती से पूजा की अनुमति लेकर पूजा आरंभ कर सकते हैं.
अक्षय तृतीया को श्रीलक्ष्मीनारायणजी का भी पूजन करना चाहिए.
लक्ष्मीनारायण की प्रतिमा या चित्र के सामने पहले एक घी का दीप जला लें. फिर जल, दूध, दही, शहद, घी, शक्कर जो भी उपल्बध हों उनसे क्रमश: स्नान कराके फिर वही पाँचो समान एक में मिलाकर पंचामृत बनाकर स्नान कराएं. इसके बाद मूर्ति कोगंगा जल से स्नान कराएं.
भगवान को तिलक लगाएं, धूप दीप दिखाकर तुलसी डालकर मिश्री चढ़ाएं. यह सभी कार्य करते हुए ऊँ लक्ष्मीनारायणाय नम: मंत्र का जप करते रहें. जब सभी समान चढ़ा देने पर फिर इसी मंत्र का जितना माला जप कर सके तो करें.
वैसे अक्षय तृतीया को कोई भी समय शुभ होता है पर आज दोपहर दो बजे से पहले कर लेना ज्यादा शुभ है. घर का कोई भी सदस्य यह पूजा कर सकता है. समय न मिल पाए तो शाम को भी कर सकते हैं. श्रीलक्ष्मीनारायण जी की मूर्ति न हो तो श्रीकृष्ण या श्रीरामजी की मूर्ति भी मान्य है.
माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने की तीन सरल पूजा अगले पेज में देखें.सबसे पहले तो यह ध्यान रखें कि गृहस्थ को हमेशा कमलासन पर विराजमान श्रीलक्ष्मीजी की पूजा करनी चाहिए.
लक्ष्मीजी की पूजा आरंभ करने से पहले कम से कम 5 बार, 11 बार या संभव हो तो एक माला “ऊं गं गणपत्यै नमः” का जप अवश्य कर लेना चाहिए.
कुछ मंत्र बता रहे हैं जिनसे कमलासना लक्ष्मीजी की आराधना करें तो पैसा, पद, मान-प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है.
मंत्र जप के समय माता के सामने घी का दीपक जलाएं.
लाल फूल चढ़ाएं एवं सफेद मिठाई का भोग लगाएं. इतना विधि-विधान अक्षय तृतीया के लिए है.
प्रतिदिन की पूजा में यदि माता के सामने दीपक या धूप भी जल रहा हो तो भी चिंता की बात नहीं. भक्त का भाव देखते हैं भगवान न कि फूल-प्रसाद और कर्मकांड.
पहली पूजाः
लक्ष्मी गायत्री मंत्रः
“ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्नयै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्”
इस मंत्र की एक माला कमल पर विराजमान लक्ष्मीजी की प्रतिमा या चित्र के सामने करें. अक्षय तृतीया को तो यथासंभव करें.
इसे साल भर तक प्रतिदिन एक माला करें. इसका जप करने में आपको 4 से पांच मिनट लगेंंगे. जप मानसिक होना चाहिए अर्थात मन में. मंत्र उच्चारण की ध्वनि मुख से बाहर नहीं आनी चाहिए.
माता की प्रतिमा के सामने दीपक या कम से कम धूप जलाकर रखें.
दूसरी पूजाः
मंत्रः
ऊँ कमलवासिन्यै नमः
देवी भागवत में आता है कि इंद्र ने एक करोड़ बार ‘ऊं कमलवासिन्यै नमः’ मंत्र जपकर कमल के आसन पर विराजमान लक्ष्मीजी की आराधना की, तो असुरों द्वारा छीना गया ऐश्वर्य पुनः प्राप्त किया था.
आप प्रतिदिन कम से कम एक माला ऊं कमलवासिन्यै नमः का जप आरंभ करें. इसे भी मानसिक जप रखना है. उच्चारण की ध्वनि बाहर नहीं आनी चाहिए.
इसमें तीन मिनट का समय लगेगा. माता की प्रतिमा के सामने दीपक या धूप जलाए रखें.
तीसरी पूजाः
धनदायक कनकधारा स्तोत्रः
लक्ष्मी प्राप्ति का बहुत कारगर साधन है कनकधारा स्तोत्र का पाठ करना. कनकधारा मंत्र की विशेषता है कि इसे बिना किसी विशेष माला, जप, पूजा व विधि-विधान से किया जा सकता है. इस स्तोत्र का प्रतिदिन एक बार पाठ करें.
जप करने से पहले यदि कनकधारा यंत्र आपके पास हो तो उसके सामने दीपक और धूप अवश्य जला लें.
कनकधारा यंत्र उपलब्ध न हो तो इंटरनेट से इसका प्रिंट आउट निकाल सकते हैं. हम कनकधारा यंत्र की तस्वीर भी दे रहे हैं.
अगर कुछ संभव न हो तो घर में कमलपुष्प पर आसीन माता लक्ष्मी की फोटो आदि हो तो उसके सामने भी पूजा आरंभ कर सकते हैं.
बाद में भी किसी शुभ मुहूर्त में कभी भी कनकधारा यंत्र लाकर भी घर में स्थापित कर सकते हैं. भगवान शंकराचार्य जी द्वारा रचित यह सिद्ध मंत्र होने के साथ ही चैतन्य भी माना गया है.
माँ लक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए यह यंत्र और स्तोत्र सभी यंत्रों से ज़्यादा महत्वपूर्ण व प्रभावशाली माना गया है. अक्षय तृतीया इसके लिए सबसे उत्तम अवसर है. इसलिए आज से ही इसका आरंभ कर सकते हैं. यदि आज दिन की पूजा हो गई हो तो भी कोई बात नहीं.
संध्याकाल में स्नान करके, साफ वस्त्र धारणकर, माता को धूप-दीप, पुष्प आदि जो भी उपलब्ध सामग्री हो उससे विभूषित करके इसका पाठ आरंभ कर सकते हैं. इसका पाठ फिर नियमित रूप से करना चाहिए.
यदि किसी दिन कनकधारा पाठ नहीं कर पाते हैं तो भी परेशान होने की बात नहीं. माता के सामने विनीतभाव से खड़े होकर क्षमा प्रार्थना कर लें. उस दिन के बदले पाठ अन्य किसी दिन भी कर लें.
कनकधारा मंत्रकनकधारा स्तोत्र हिंदी एवं संस्कृत में दिया जा रहा हैः
कनकधारा स्तोत्रः
अंग हरे: पुलकभूषणमाश्रयन्ती भृंगांगनेव मुकुलाभरणं तमालम ।
अंगीकृताखिल विभूतिरपांगलीला मांगल्यदाsस्तु मम मंगलदेवताया: ।।1।।
मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारे: प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि ।
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवाया: ।।2।।
विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदान दक्षमानन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोsपि ।
ईषन्निषीदतु मयि क्षण मीक्षणार्ध मिन्दीवरोदर सहोदरमिन्दिराया: ।।3।।
आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दमनिमेषमनंगतन्त्रम ।
आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रम भूत्यै भवेन्मम भुजंगशयांगनाया: ।।4।।
बाह्यन्तरे मुरजित: श्रितकौस्तुभे या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति ।
कामप्रदा भगवतोsपि कटाक्षमाला कल्याणमावहतु मे कमलालयाया: ।।5।।
कालाम्बुदालि ललितोरसि कैटभारे र्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव ।
मातु: समस्तजगतां महनीय मूर्तिर्भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया: ।।6।।
प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावान्मांगल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन ।
मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धम मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया: ।।7।।
दद्याद्दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारा-मस्मिन्नकिंचन विहंगशिशौ विषण्णे ।
दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाह: ।।8।।
इष्टा विशिष्टमतयोsपि यया दयार्द्रदृष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते ।
दृष्टि: प्रह्रष्टमकमलोदरदीप्तिरिष्टाम पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टराया: ।।9।।
गीर्देवतेति गरुड़ध्वजसुन्दरीति शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति ।
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै तस्यै नमस्त्रिभुवनैक गुरोस्तरुण्यै ।।10।।
श्रुत्यै नमोsस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै रत्यै नमोsस्तु रमणीयगुणार्णवायै ।
शक्त्यै नमोsस्तु शतपत्रनिकेतनायै पुष्टयै नमोsस्तु पुरुषोत्तम वल्लभायै ।।11।।
नमोsस्तु नालीकनिभाननायै नमोsस्तु दुग्धोदधिजन्मभूत्यै ।
नमोsस्तु सोमामृतसोदरायै नमोsस्तु नारायणवल्लभायै ।।12।।
सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि ।
त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये ।।13।।
यत्कटाक्षसमुपासनाविधि: सेवकस्य सकलार्थसम्पद: ।
सन्तनोति वचनांगमानसैस्त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ।।14।।
सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम ।।15।।
दिग्घस्तिभि: कनककुम्भमुखाव सृष्टस्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुतांगीम ।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धि पुत्रीम ।।16।।
कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरंगितै रपांगै: ।
अवलोकय मामकिंचनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया: ।।17।।
स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम ।
गुणाधिका गुरुतर भाग्यभागिनो ते भुवि बुधभाविताशया: ।।18।।
अगर संस्कृत में पाठ नहीं कर पाते तो हिंदी में कर सकते हैं. अगले पन्ने पर देखें कनकधारा स्तोत्र हिंदी में.कनकधारा स्तोत्र का हिंदी रुपांतरणः
जिस प्रकार भ्रमरी अर्ध विकसित पुष्पों से अलंकृत तमाल वृक्ष का आश्रय ग्रहण करती है, उसी प्रकार भगवान श्री विष्णु के रोमांच से शोभयमान लक्ष्मी की कटाक्ष लीला श्री अंगों पर अनवरत पड़ती रहती है और जिसमें समस्त ऐश्वर्य-ध-संपत्ति का निवास है। वह समस्त मंगलों की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी की कटाक्ष-लीला मेरे लिए मंगलदायिनी हो।
जिस प्रकार भ्रमरी कमलदल पर मंडराती है अर्थात बार-बार आती जाती रहती है उसी प्रकार भगवान मुरारी के मुखकमल की ओर प्रेम सहित जाकर और लज्जा से वापस आकर समुद्र-कन्या लक्ष्मी की मनोहर मुग्ध दृष्टिमाला मुझे अतुल श्री ऐश्वर्य प्रदान करें।
जो समस्त देवों के स्वामी इन्द्रपद के वैभव का विलास अर्थात सुखोपभोग प्रदान करने में समर्थ है तथा मुर नामक दैत्य के शुत्र भगवान श्री हरि को भी अत्यंत आनंद प्रदान करने वाली है एवं नीलकमल जिस लक्ष्मी का सहोदर भ्राता है ऐसी लक्ष्मी के अधखुले नेत्रों की दृष्टि किंचित क्षण के लिए मुझ पर थोड़ी अवश्य पड़े।
जिसकी पुतली एवं भौंहें काम के वशीभूत हो अर्ध विकसित एकटक नयनों को देखने वाले आनंदकंद सच्चिदानंद भगवान मुकुन्द को अपने सन्निकट पाकर किंचित तिरछी हो जाती है। ऐसे शेषशायी भगवान विष्णु की अर्द्धंगिनी श्री लक्ष्मी जी के नेत्र हमें प्रभूत धन-संपत्ति प्रदान करने वाले हों।
जिन भगवान मधुसूदन के कौस्तुभमणि से वशीभूत वक्षस्थल में इन्द्रनीलमय हारावली के समान सुशोभित होती है तथा उन भगवान के भी चित्त मे काम अर्थात स्नेह संचारिणी कमल कुंज निवासिनी लक्ष्मी की कटाक्ष माला मेरा मंगल करे।
जिस प्रकार मेघों की घनघोर घटा में बिजली चमकती है उसी प्रकार कैटभ दैत्य के शत्रु भी विष्णु भगवान के काली मेघपंक्ति के समान मनोहर वक्ष:स्थल पर आप विद्युत के समान देदीप्यमान होती हैं तथा जो समस्त लोकों की माता, भार्गव-पुत्री भगवती श्री लक्ष्मी की पूजनीयामूर्ति मुझे कल्याण प्रदान करे।
समुद्रकन्या लक्ष्मी का वह मंदालस, मंथर, अर्धोंन्मीलित चंचल दृष्टि के प्रभाव से कामदेव ने मंगलमूर्ति भगवान मधुसूदन के हृदय में प्राथमिक (मुख्य) स्थान प्राप्त किया था। वही दृष्टि यहां मेरे ऊपर पड़े।
भगवान नारायण की प्रेमिका लक्ष्मी का नेत्ररूपी मेघ, दाय रूपी अनुकूल वायु से प्रेरित होकर दुष्कर्म रूपी धाम को दीर्घकाल के लिए परे हटाकर विषादग्रस्त मुझ दीन-दुखी सदृश्य जातक पर धनरुपी जलधारा की वर्षा करे।
विलक्षण मतिमान मनुष्य जिनके प्रीतिपात्र होकर उनकी कृपा दृष्टि के प्रभाव से स्वर्ग पद को अनायास ही प्राप्त कर लेते हैं, उन्हीं कमलासना कमला लक्ष्मी की वह विकसित कमल गर्भ के सदृश्य कान्तिमती दृष्टि मुझे मनोSभिलाषित पुष्टि-सन्तत्यादि वृद्धि प्रदान करें।
जो भगवती लक्ष्मी वृष्टि-क्रीड़ा के अवसर पर वाग्देवता अर्थात ब्रह्म शक्ति के स्वरूप में विराजमान होती है और पालन-क्रीड़ा के समय पर भगवान गुरुड़ ध्वज अथवा विष्णु भगवान सुंदरी पत्नी लक्ष्मी (वैष्णवी शक्ति) के स्वरूप में स्थित होती है तथा प्रयल लीला के समय शाकंभरी (भगवती दुर्गा) अथवा भगवान शंकर की प्रिय पत्नी पार्वती (रुद्रशक्ति) के रूप में विद्यमान होती है उन त्रिलोक के एकमात्र गुरु भगवान विष्णु की नित्ययौवन प्रेमिका भगवती लक्ष्मी को मेरा नमस्कार है।
हे लक्ष्मी! शुभकर्म फलदायक! श्रुति स्वरूप में आपको प्रणाम है। रमणीय गुणों के समुद्र स्वरूपा रति के रूपा में स्थित आपको नमस्कार है। शतपत्र कमल-कुंज में निवास करने वाली शक्ति स्वरूपा रमा को नमस्कार है तथा पुरुषोत्तम श्री हरि की अत्यंत प्राणप्रिय पुष्टि-रूपा लक्ष्मी को नमस्कार है।
कमल के समान मुखवाली लक्ष्मी को नमस्कार है। क्षीर समुद्र में उत्पन्न होने वाली रमा को प्रणाम है। चंद्रमा और अमृत की सहोदर बहन को नमस्कार है। भगवान नारायण की प्रेयसी लक्ष्मी को नमस्कार है।
हे कमलाक्षि! आपके चरणों में की हुई स्तुति ऐश्वर्यदायिनी और समस्त इंद्रियों को आनन्दकारिणी है तथा साम्राज्य अर्थात पूर्णाधिकार देने में सर्वथा समर्थ एवं संपूर्ण पापों को नष्ट करने में उद्यत है। माता, मुझे आपके चरण कमलों की वन्दना करने का सदा शुभ अवसर प्राप्त होते रहे।
जिनके कृपा-कटाक्ष (तिरक्षी चितवन) के लिए की गई उपासना (आराधना), सेवक (उपासक) के लिए समस्त मनोरथ और संपत्ति का विस्तार करती है, उस भगवान मुरारी की हृदयेश्वरी लक्ष्मी का मैं मन, वचन और काया से भजन करता हूं।
हे भगवती भगवान हरि को प्रिय पत्नी! आप कमल कुंज में निवास करने वाली हैं, आपके चरण कमलों में नीला कमल शोभायमान है। आप श्वेत वस्त्र तथा गन्ध माला आदि से सुशोभित हैं। आपकी सुंदरता अद्धितीय है। हे त्रिभुवन की वैभव प्रदायिनी! आप मेरे ऊपर प्रसन्न होइए।
दिग्गजों के द्वारा कनक कुंभ (सुवर्ण कलश) के मुख से पतित आकाशगंगा के स्वच्छ, मनोहर जल से जिस (भगवान) के श्री अंग का अभिषेक (स्नान) होता है उस समस्त लोकों के अधीश्वर भगवान विष्णु पत्नी, क्षीर सागर की पुत्री, जगन्माता लक्ष्मी को मैं प्रात:काल नमस्कार करता हूं।
हे कमलनयन भगवान विष्णु प्रिय लक्ष्मी! मैं दीन-हीन मनुष्यों में अग्रमण्य हूं इसलिए आपकी कृपा का स्वभाव सिद्ध पात्र हूं। आप उमड़ती हुई करुणा के बाढ़ की तरल तरंगों के सदृश्य कटाक्षों द्वारा मेरी दिशा में अवलोकन कीजिए।
जो मनुष्य इन स्तोत्रों के द्वारा नित्य प्रति वेदत्रयी स्वरूपा तीनों लोकों की माता भगवती रमा (लक्ष्मी) का स्तोत्र पाठ करते हैं वे भक्तगण इस पृथ्वी पर महागुणी और अत्यंत सौभाग्यशाली होते हैं एवं विद्वद्जन भी उनके मनोगत भाव को समझने के लिए विशेष इच्छुक रहते हैं।
श्री भगवान शंकराचार्यजी द्वारा विरचित इस सुवर्ण, कनकधारा स्तोत्र का पाठ जो मनुष्य तीनों काल अर्थात प्रात: मध्याह्र एवं सायं में करते हैं वे लोग कुबेर के समान धनी होते हैं।
अपीलः
यदि आपको लगता है हमारी बात- ईश्वर से डरें नहीं उनसे प्रेम करें सही है और आप भी इसी में विश्वास रखते हैं तो आप प्रभु शरणम् से जुड़ जाएं. हम इसी प्रकार से ईश्वर की भक्तिरस का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं. वर्तमान समय की यही आवश्यकता है. आप प्रभु शरणम् ऐप्प डाउनलोड कर लें और हमारा फेसबुक पेज भी जरूर लाइक करें.
आप इसे ऐसे समझें कि जो ईश्वर की स्तुति का अभियान चला रहे हैं उसमें आपकी ओर से ये श्रद्धा पुष्प होंगे. आप दिनभर इंटरनेट यूज करते हैं. कुछ डेटा धार्मिक ज्ञान के लिए खर्च की जाए तो क्या हर्ज है. डाउनलोड करने के लिए प्लेस्टोर में सर्च करें- PRABHU SHARNAM और डाउनलोड कर लें.
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अक्षय तृतीयाः सोना खरीदने नहीं, सोना बनने का पर्व
बच्चों के सामने ईश्वर को कोसकर अपने बच्चे का कितना नुकसान किया कोई अंदाजा है!
पराया धन ढेला समानः सुंदर गुणों के विकास के लिए उपमन्यु की कथा बच्चों को सुनाएं

