एक ही दंपत्ति के दो बच्चे, एक देव दूसरा दैत्यबुद्धि का क्यों हो जाता है?
एक दुविधा अक्सर होती है लोगों में कि एक ही माता-पिता की दो संतानें स्वभाव से, कर्म से और विचार से एकदम उलट क्यों हो जाती हैं? इसका उत्तर भागवत महापुराण से समझने का प्रयास करना चाहिए.
धार्मिक कथाओं के लिए प्रभु शरणम् के फेसबुक पेज से जु़ड़े. लिंक-कई बार एक ही माता-पिता से जन्मी दो संतान का स्वभाव एक दूसरे से बिलकुल विपरीत होता है. ऐसा भी हो सकता है कि ऐसा उत्तम हो कि सभी पसंद करते हों. कह सकते हैं स्वभाव से देवता हो. वहीं दूसरा एकदम उलट. उसके सारे लक्षण ऐसे हों कि सभी उससे दूर भागें. उसे असुर ही समझा जाए. ऐसा कई बार देखने को आता है. एक का ध्यान पढ़ाई-लिखाई में और भविष्य संवारने में रहेगा तो दूसरा उलटे ही काम करेगा.
ऐसा कई बार गर्भधारण संस्कार में दोष के कारण होता है. इसकी पृष्ठभूमि आपको भागवत महापुराण में मिल जाती है. इसे ध्यान से समझना चाहिए और अपनी संतानों को भी समझाना चाहिए.
पहले मैं आपको कथा बताता हूं. अंत में निष्कर्ष पर भी बात करेंगे.
देवताओं की माता अदिति और दैत्यों की माता दिति सगी बहनें थीं. देवता और दैत्य दोनों ही प्रजापति कश्यप के अंश से जन्मे पर दोनों के स्वभाव एकदम उलट.
शास्त्रों में संतान प्राप्ति की प्रक्रिया को संतान यज्ञ कहा गया है. इस यज्ञ की आहूति होती है पति-पत्नी का शारीरिक मिलन परंतु उसके विधान भी कहे गए हैं. प्रजापति कश्यप की एक पत्नी अदिति इसे मानती थीं जबकि अदिति ने द्वेष में भरकर आनंद की कामना से भोग किया.
आपको जो कथा सुनाने जा रहा हूं उसे सिर्फ एक कथा नहीं समझें. हर गृहस्थ के लिए इसमें एक बड़ा रहस्य छुपा है.संतान उत्पत्ति जीवन का अनिवार्य संस्कार है किंतु उसकी भावना कैसी है यह बहुत मायने रखती है. वासना और आनंद के लिए हुए भोग के परिणाम से उत्पन्न संतान की दशा वही होती है जो दिति के पुत्रों हिरण्यकश्यपु और हिरण्याक्ष के साथ हुआ.
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दिति ने पूजा की तैयारी कर रहे पति को बलपूर्वक संभोग के लिए विवश किया था. इसका दुष्परिणाम था यह. आइए सुनते हैं वह कथा कि कामभावना से पीडि़त होकर दिति ने क्या अनर्थ किया था?
प्रदोष काल में संभोग क्यों वर्जित है? उस सहवास से जन्मी संतानें कैसी हो जाती हैं? अगले पेज पर…हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.ब्रह्माजी के मानसपुत्र मरीची और कर्दम ऋषि की पुत्री कला के पुत्र थे महर्षि कश्यप. दक्ष प्रजापति ने अपनी साठ कन्याओं में से 13 का विवाह कश्यप से किया. कश्यप की इन्हीं पत्नियों से देवता, असुर, पशु-पक्षी, यक्ष-गंधर्व, किन्नर-वनस्पति आदि पैदा हुए थे.
प्रजापति कश्यप एक शाम संध्या पूजा की तैयारी कर रहे थे. तभी काम के आवेश से उन्मत उनकी एक पत्नी दिति, संभोग की इच्छा से यज्ञशाला में पहुंच गईं.दिति ने कहा- आपकी पत्नी के रूप में मेरी अन्य बहनें मातृत्व का आनंद ले रही हैं. मुझे भी मातृत्व सुख प्रदान चाहिए. पति धर्म निभाते हुए आप मेरे साथ सहवास करें.
कश्यप ने कहा- मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूर्ण करूंगा क्योंकि तुम मेरी पत्नी हो. पत्नी मोक्ष की संगिनी होती है किन्तु कुछ समय के लिए रुक जाओ. अभी मैं संध्यावंदन कर रहा हूं.
दिति दक्ष की पुत्री थीं. समस्त शास्त्रों में पारंगत लेकिन कामबाण से त्रस्त होने के कारण उन्होंने अपने ज्ञान का प्रयोग कुतर्क के लिए आरंभ किया.दिति ने कहा- विवाह के समय मेरे पिता को आपने वचन दिया था कि पत्नियों को प्रसन्न रखने के लिए ब्रह्मांड की जो भी वस्तु आपके सामर्थ्य में होगी उसे प्रदान कर संतुष्ट करेंगे. आप प्रजापति के वचन भंग का दोष क्यों लेते हैं?हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.कश्यप ने समझाने का प्रयास किया- प्रिये, मुझे समस्त वचन याद हैं. मैं प्रजापति दक्ष को दिए वचन को भंग करने से होने वाले पापों से भी परिचित हूं.
मैं वचनभंग नहीं करता बस थोड़ा समय मांगता हूं. यह समय संतान उत्पत्ति के कार्यों के लिए शुभ नहीं है. दिति ने शर्त रख दी कि या तो मुझे तर्कों से संतुष्ट करो या संसर्ग से.कश्यप ने समझाया- जीवनभर के पुण्यों का दान करके भी कोई अंर्धांगिनी के ऋण से मुक्त नहीं हो सकता. मोक्ष के लिए इंद्रियों को वश में करना आवश्यक है और यह पत्नी के सहयोग से ही हो सकता है.
संध्याकाल में भूतों के साथ स्वयं महादेव भी विचरण करते हैं. वह आपके बहनोई हैं. उन्हें भले ही कोई न देखे किंतु वह सबको देख सकते हैं.
महादेव को अप्रसन्न करने का दुःसाहस स्वयं नारायण, ब्रह्मदेव में भी नहीं है. लोकाचार का मान रखने के लिए ही सही आप संसर्ग के लिए बाध्य न करें. यह समय उचित नहीं.
दिति के दिमाग पर दो चीजें सवार थीं. एक तो कामवासना, दूसरी अपनी बहन अदिति से श्रेष्ठ संतान की इच्छा. कश्यप ने समझाने का एक प्रयास और किया.कश्यप बोले- हे दिति आप प्रजापति दक्ष की पुत्र हैं. समस्त गुणों से युक्त. आपके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं. मैं आपको सर्वश्रेष्ठ संतान प्राप्ति की विधि बता सकता हूं. आप उस पर चलें. वासना और द्वेष की भावना से जन्मी संतान लोकनिंदा का कारण बनती है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.कश्यप और दिति के बीच तर्क-वितर्क चलता रहा. कश्यप के तर्कों से दिति संतुष्ट न हुई. आखिरकार न चाहते हुए भी कश्यप को संध्याकाल में सहवास करना पड़ा.
कश्यप इस अपराध का प्रायश्चित करने चले गए. बाद में दिति को भी बड़ा पछतावा हुआ. काम का प्रभाव मस्तिष्क से उतरा तो उन्हें अपने कार्य के लिए ग्लानि होने लगी.
उन्होंने अपने पति कश्यप से और बहनोई महादेव से बार-बार क्षमा मांगी.कश्यप क्रोध में थे. उन्होंने कहा- दिति तुमने काम से पीड़ित होकर महादेव का अपमान किया. इससे तुम्हारी कोख से पैदा होने वाली संतानें असुर होंगी और संसार को पीड़ा देंगी.
उनके कर्मों से ऋषि-मुनि, देव-गंधर्व, स्त्री-पुरूण और स्वयं त्रिदेव पीड़ित होंगे. तुमने वैदिक आचार और लोक आचार दोनों को भंग किया है इसलिए तुम्हारी संताने वैदिक और सांसारिक मर्यादाओं का भी मान नहीं रखेंगी.
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अपनी संतानों का चरित्र सुनकर अदिति विलाप करने लगीं. वह बार-बार कश्यप तथा त्रिदेवों से क्षमा मांगने लगीं. कश्यप का क्रोध भी पत्नी के विलाप को देखकर शांत होने लगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.कश्यप बोले- मेरे लाख समझाने पर भी तुम नहीं मानीं, पापकर्म में मुझे भागीदार बनाया लेकिन तुम्हें पछतावा हुआ है इसलिए तुम्हारी संतानों का संहार स्वयं नारायण करेंगे.
यह सुनकर दिति का मन शांत हुआ. उनके मन से एक बोझ तो उतरा.दिती बोलीं- मेरे लिए यही सांत्वना काफी है कि मेरे पुत्र किसी पुण्यात्मा के शाप से नहीं नारायण के हाथों मरकर मोक्ष को प्राप्त करेंगे.
कश्यप दिति के इस वचन से बड़े प्रसन्न हो गए.
उन्होंने दिति को एक वरदान भी दिया- तुम्हारे पुत्र तो नारायण के द्रोही होंगे लेकिन एक नाती नारायण का अनन्य भक्त होगा. वह नारायण को अतिप्रिय होगा. उसके पुकारने पर स्वयं नारायण प्रकट हो जाएंगे और उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी करेंगे.
उसका प्रताप ऐसा होगा कि दैत्यकुल का प्रभाव तुम्हारी छोटी बहन अदिति के पुत्रों जो देवों के नाम से विख्यात होंगे, उनसे भी आगे होगा. स्वभाव से वह बहुत धर्मनिष्ठ होगा.
गूगल ने प्रभु शरणम् को 4.7 की रेटिंग दी है. आज तक ऐसी रेटिंग किसी हिंदू धार्मिक ऐप्प को नहीं मिली है.कुछ तो बात होगी कि गूगल इसे देता है ऐसी शानदार रेटिंग.
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हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इस वरदान को प्राप्तकर दिति को बहुत प्रसन्नता हुई. समय आने पर दिति में गर्भ के लक्षण प्रकट होने लगे.
उन्हें पुत्रों के संबंध में पति कश्यप के शाप का स्मरण था. वह जानती थीं कि गर्भ में आई संतान अत्याचारी और नारायण की शत्रु होंगी. यह सोचकर उन्होंने अपने तेज से पुत्रों को 100 वर्षों तक गर्भ से बाहर आने ही न दिया.
दिति द्वारा इतने समय तक गर्भ को रोकने से संसार में कई अनहोनी घटनाएं घटने लगीं. चारों ओर भयंकर अंधकार हो गया. पृथ्वी का संतुलन बिगड़ने लगा. अपशकुन होने लगे. इस अव्यवस्था से घबराए देवतागण रक्षा की गुहार लिए ब्रह्माजी की शरण में भागे. ब्रह्माजी ने उन्हें कारण बताया तो देवताओं ने इसका निदान करने की विनती की.अंततः ब्रह्माजी दिति के पास गए और उसे बहुत समझाया कि वह होनी को बदलने का व्यर्थ प्रयास कर रही हैं.
ब्रह्माजी के समझाने-बुझाने पर दिति ने अपनी संतानों को गर्भ से मुक्त किया. उनकी संतानें हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यपु हुए. हिरण्याक्ष का संहार करने के लिए भगवान ने वाराह अवतार लिया और हिरण्यकश्यपु से अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा के लिए नृसिंह अवतार लिया.
संतान प्राप्ति को एक यज्ञ का दर्जा शास्त्रों में दिया गया है. संतान प्राप्ति से मिलन के लिए कुछ नियम भी निर्धारित किए गए हैं. ये नियम हमारे ऋषि-मुनियों ने ऐसे ही नहीं स्थापित कर दिए, इसके पीछे गहन शोध भी था.
कामवासना मात्र की पूर्ति से ठहरे गर्भ से उत्पन्न संतान में विकार आते ही हैं. यदि गर्भ ठहर भी जाए तो उसे मारना बहुत बड़ा दोष माना गया है. इससे आपकी आने वाली संतानों पर भी बाधा हो सकती है. इसे प्राणी हत्या के बराबर माना गया है.आज के युग में बहुत से ऐसे उपाय हैं जिन्हें समय रहते कर लिया जाए तो इन अपराधों से बचाव हो सकता है. संतान प्राप्ति यज्ञ पर शास्त्रों में क्या कहा गया है?
इसपर विस्तृत पोस्ट शीघ्र ही प्रभु शरणम् ऐप्प पर पुनः प्रकाशित करेंगे. आप ऐप्प डाउनलोड कर लें.
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