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वास्तव में यही तो मोहमाया है, अमरबेल जैसी लिपटी है, आसानी से कहां छूटेगी!

वास्तव में यही तो मोहमाया है, अमरबेल जैसी लिपटी है, आसानी से कहां छूटेगी!

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इस लाइन के नीचे हमारे फेसबुक पेज का लिंक है उसे क्लिक करके लाइक कर लें.कल मछलियों की कथा सुनाई थी. मौन का मर्म मछलियों ने जान लिया तो अपनी जान को मुसीबत से डालने का तरीका उन्हें आ गया. ज्ञान की उपयोगिता तो वास्तव में तभी है जब वह उपयोगी हो जाए. मछलियों के लिए वही उपयोगी था.

हम संसार में आते हैं तो अपने साथ एक शाश्वत सत्य लिए आते हैं- जन्म तो आज हुआ मृत्यु की तिथि भी निर्धारित है. एकमात्र सत्य है.

कब होगी पता नहीं लेकिन होगी जरूर इसे कोई टाल नहीं सकता. रामजी ने जीवन की कितनी चाबी भरी है यह तो ठीक-ठीक कोई ज्योतिषी कोई ज्ञानी-ध्यानी बता ही नहीं सकता.

फिर क्या उपाय है?

तो यही मान लें कि जीवन का हर दिन अंतिम दिन ही है और अंत भला तो सब भला. भला अंतिम दिन कोई बुरे काम करता है. तो फिर आज से ही मानना शुरू कर दें कि अंतिम दिन है. किसी का दिल नहीं दुखाकर नहीं जाना है भाई.

अहा! वाह,वाह क्या बात है, क्या बात कह दी!!

सुंदर लच्छेदार शब्दों में मैंने जो बात कही उसे पढ़कर मन को अच्छा तो लगा होगा. शायद यह भी सोच रहें होंगे कि काश ये लाइन कॉपी हो जाए तो व्हॉट्सएप्प पर या फेसबुक पर शेयर कर दूं, अपना स्टेट्स मैसेज बना लूं. इंप्रेशन जमेगा.

बस इंप्रेशन जमाने के भूल-भूलैया में ही तो फंसे हैं हम. यदि ऊपर कही लाइन बहुत पसंद आई है तो फिर आप इसे पढ़ते जाइए. आखिर में जो बातें कहीं गई हैं उसे तो कॉपी नहीं कर पाए तो स्क्रीनशॉल लेकर फॉरवर्ड कर देंगे.

मुस्कुरा रहे हैं आप या खीझ भी रहे हों, पर कोई बात नहीं. आप इसे पढ़ेंगे जरूर इतना तो मैं जानता हूं. यकीन मानिए निराश नहीं होंगे. आनंद ही आएगा.

कथा वाकई बहुत दमदार है. आपके विचारों को झकझोर कर रख देगी. शुरू करता हूं.अवंतिका नगर के बाहर, क्षिप्रा नदी के पार एक महापंडित रहता था. उसकी दूर-दूर तक ख्याति थी. वह रोज क्षिप्रा को पार करके, नगर के एक बड़े सेठ को धर्मकथा सुनाने जाता था.

नियम के अनुसार वह सेठ को कथा सुनाने चला तो एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि वह बहुत चौंका. जब वह नाव से क्षिप्रा पार कर रहा था कि एक घड़ियाल ने सिर बाहर निकालकर पंडित को आवाज दी.

घड़ियाल बोला- पंडितजी, महाराज मेरी भी उम्र हो गई. इस नदी से होकर ही रोज सेठ के पास जाते हैं. मुझे भी कुछ आते-जाते कुछ ज्ञान दे दिया करें और मैं यह ज्ञान आपसे मुफ्त नहीं मांगता हूं इसके लिए आपको उचित दान-दक्षिणा भी मिलेगी.

घड़ियाल ने कुटिलता से आंखे नचाते हुए अपने मुंह में दबा हुआ एक हीरों का हार पंडितजी को दिखाया.

हीरों का हार! कथा सुनाने के बदले में ऐसी सुंदर दक्षिणा. पंडित की आंखें उमंग में भरी चमकने लगीं.

आंखों में तैरती लालच की लाल-लाल डोरी ने बुद्धि पर कब्जा जमाया और पंडितजी तो भूल ही गए कि वणिक को कथा सुनाने जाते थे.

घड़ियाल से पंडितजी बोले- पहले आपको ही कथा सुनाएंगे यजमान.

अब रोज पंडितजी घड़ियाल को कथा सुनाने लगे. घड़ियाल भी रोज भी पंडितजी को तरह-तरह के उपहार देकर लुभाता रहता. कभी हीरे, कभी मोती, तो कभी अनेक रत्नों से जड़े कंठाहार.

पंडितजी के दिन तो मजे में कट रहे थे. रोज इतनी बहुमूल्य दक्षिणाएं मिल रही थीं.

कुछ दिनों बाद घड़ियाल ने कहा- पंडित जी! अब मेरी उम्र पूरी होने के करीब आ रही है, मुझे त्रिवेणी तक छोड़ आएं. एक पूरा मटका भरकर हीरे जवाहरात दूंगा.एक पूरा मटका हीरे-जवाहरात का भरा! पंडितजी ने कहा- आप जब कहें यजमान चल पड़ते हैं.

पंडितजी घड़ियाल को लेकर त्रिवेणी गए और घड़ियाल को त्रिवेणी में छोड़ दिया. घड़ियाल ने भी अपना वादा निभाया.

उन्हें रत्नों से भरा हुआ मटका दे दिया. पंडितजी ने भी घड़े को भली-भांति देख लिया और मटके में भरे हीरे जवाहरात को देखकर आनंदित हुए.

घड़ियाल का भी काम हो चुका और पंडितजी का भी काम पूरा हुआ. पंडितजी अपने धन को कलेजे से चिपकाए विदा होने लगे तो घड़ियाल उन्हें देखकर हंसने लगा.

घडियाल को हंसते देखकर पंडित ने पूछा- तुम हंस रहे हो? इसका क्या कारण है?

घड़ियाल ने कहा- पंडितजी मैं कुछ न कहूंगा. मनोहर नाम के धोबी के गधे से अवंतिका में पूछ लेना. वही बताएगा कि मैं आप पर हंस क्यों रहा हूं. बस इतना बता दूं कि मैं अकारण नहीं हंस रहा.

घड़ियाल ने यह कहकर पंडितजी के मन में धनप्राप्ति से आया सारा उत्साह, सारी खुशी समाप्त कर दी.

पंडित के मन में अब तो बेचैनी बहुत बढ़ने लगी कि कारण जानने की.

इससे भी ज्यादा दुख पंडित को इस बात का हो रहा था कि घड़ियाल ने पूछने को कहा भी तो धोबी के गधे से. मेरे जैसा ज्ञानी घड़ियाल जैसे मलेच्छ जीव के हंसने का कारण पूछे तो वह भी धोबी के गधे से.घड़ियाल ने भी पंडितजी के मन के भाव भांप लिए.

उसने कहा- आप बुरा न मानें. गधा मेरा पुराना सत्संगी है. मनोहर कपड़े धोता रहता है, गधा नदी के किनारे खड़ा रहता है, बड़ा ज्ञानी है. सच पूछो तो उसी से मुझमें भी ज्ञान की किरण जगी.

पंडितजी वापिस लौटे तो बड़े उदास थे. चैन मुश्किल हो गई, रात नींद न आए कि घड़ियाल हंसा तो क्यों हंसा? गधे को ऐसा क्या राज मालूम है? पर मैं यह बात पूछूं भी तो गधे से! रातभर विचारों का द्वंद्व चलता रहा.

रात तो जैसे तैसे कट गई, सुबह संभाल न सके स्वयं को. थोड़ी देर और विचारों के साथ संघर्ष किया और फिर चल पड़े गधे से घड़ियाल के हंसने का कारण जानने.

खोजते-खाजते पहुंच ही गए मनोहर धोबी के गधे के पास.

गधे से सप्रेम पूछा- महाराज! मैं वही पंडित हूं जिससे आपका मित्र घड़ियाल कथाएं सुनता था. मुझे भी समझाएं, मामला क्या है? घड़ियाल हंसा तो क्यों हंसा?

पंडितजी की बात सुनकर अब वह गधा भी हंसने लगा.

पंडितजी के मन का क्लेश तो अब पहले से भी ज्यादा बढ़ गया. घड़ियाल तो हंसा सो हंसा अब यह गधा भी मुझ पर हंस रहा है. इतनी दूर से इसे खोजता-खाजता परेशानहाल पहुंचा हूं और यह मेरा माखौल उड़ा रहा है.

गधा तो ज्ञानी था. वैसे स्वभाव से गधे चाहे जैसे भी होते हों पर पंडितजी के यजमान ने कहा था कि ये गधा ज्ञानी है. ज्ञानी है तो फिर यह भी मुझपर हंस रहा है.

आखिर ऐसा क्या कर दिया है मैंने? गधा भी उनके मन के भाव भांप गया.गधे ने कहा- सुनो पंडितजी महाराज, पिछले जन्म में मैं एक सम्राट का मंत्री था. सम्राट ने एक बार कहा कि मेरी उम्र हो गई, त्रिवेणी चलेंगे, संगम पर ही रहेंगे. इसका इंतजाम करो.

हम त्रिवेणी गए. त्रिवेणी का वातावरण ऐसा भाया सम्राट को कि उन्होंने वहीं शेष जीवन बिताने की ठान ली,

महाराज ने कहा- अब मैं वापस न जाउंगा. तुम्हें यहां रहना हो तो मेरे साथ ही रह जाओ और यदि वापिस लौटना हो तो ये करोड़ स्वर्णमुद्राएं हैं इन्हें ले लो और वापस चले जाओ.

मैंने महाराज से करोड़ मुद्राएं स्वर्ण की ले लीं और अवंतिका वापिस आ गया. त्रिवेणी पर वास का पुण्य छोड़कर मैं स्वर्ण मुद्राएं लेकर चला आया.

इस कारण मैं इस जन्म में गधा हुआ. इसी कारण से घड़ियाल आप पर हंसा.

कहानी प्रीतिकर है. बहुत से लोग हैं, जिनका ज्ञान उन्हीं को मुक्त नहीं कर पाता, बहुत हैं जिनके ज्ञान से उनके जीवन में कोई सुगंध नहीं आती. सब जानते तो हैं पर जानकर भी अंजान बने हैं तो फिर जानने का कोई लाभ नहीं है.

शास्त्र से परिचित हैं, शब्दों के मालिक हैं, तर्क का श्रृंगार है उनके पास, विवाद में उन्हें हरा न सकेंगे. आप लेकिन जीवन में वे हारते चले जाते हैं. उनका खुद का ज्ञान उनके जीवन में किसी काम नहीं आता.जो ज्ञान मुक्ति न दे वह ज्ञान नहीं. ज्ञान की परिभाषा यही है, जो मुक्त करे. इस एक बात को जितनी गहराई से संभालकर रख लें उतना ही हितकर होगा.

सत्य आपको स्वयं पाना होगा. कोई जगत में सत्य दे नहीं सकता और जब तक यह भरोसा किए बैठे हैं कि कोई आकर सत्य दे देगा, तब तक आप भटकेंगे. तब तक सावधान रहना, कहीं मनोहर धोबी के गधे न बन जाएं!

तब तक त्रिवेणी पर आते रहेंगे और आकर मौके भी गंवाते रहेंगे. संगम पर पहुंच जाओगे पर समाधि नहीं बनेगी. अंतिम ठौर परमात्मा का है. यह बात भली-भांति जानते हुए भी बार-बार उस घर के करीब आ तो जाएंगे पर हर बार भटक जाएंगे⁠⁠⁠.

-राजन प्रकाश, प्रभु शरणम् में…

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