आज विशेष स्नान से बढ़ता है रूप सौंदर्य? नर्क चतुर्दशी क्यों है रूप चतुर्दशी? ये काम की बात ज़रूर पढ़ें

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iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंप्रागज्योतिषपुर में नरकासुर नामक राजा हुआ करता था. उसका एक नाम भौमासुर भी था. भौमासुर या नरकासुर पृथ्वी और भगवान नृसिंह की संतान था.
हिरण्याक्ष ने जब पृथ्वी को बंधक बना लिया था तब पृथ्वी का उद्धार करने के लिए भगवान विष्णु ने वराह अवतार लिया. वराह भगवान से पृथ्वी ने अपने साथ कुछ समय व्यतीत करने की विनती की जिसे भगवान ने मान लिया.
पृथ्वी के गर्भ से वराह भगवान का अंश था नरकासुर. जब लंका का राजा रावण मारा गया उस समय पृथ्वी के गर्भ से उसी स्थान पर नरकासुर का जन्म हुआ जहां माता सीता का जन्म हुआ था. सोलह वर्ष की आयु तक राजा जनक ने ही भौमासुर को पाला था.
बाद में पृथ्वी इसे ले गई और श्रीविष्णु ने इसे प्राग्ज्योतिषपुर का राजा बना दिया. नरकासुर मथुरा के राजा कंस का मित्र था. विदर्भ की राजकुमारी माया से इसका विवाह हुआ और विवाह के समय भगवान विष्णु ने इसे एक दुर्भेथ रथ दिया.
कुछ दिनों तक तो नरकासुर ठीक से राज्य करता रहा किन्तु बाणासुर की संगति में पड़कर यह दुष्ट हो गया. महर्षि वसिष्ठ ने इसे विष्णु के हाथों मारे जाने का शाप दे दिया.नरकासुर ने तपोबल से ब्रह्मा को प्रसन्न करके यह वर पाया कि उसे देवता, असुर, राक्षस आदि कोई भी नहीं मार सकेगा और उसका राज्य सदा ही बना रहेगा. उसका वध सिर्फ एक स्त्री ही कर सकती थी.
नरकासुर ने हयग्रीव, सुंद आदि असुरों की सहायता से देवराज इन्द्र को जीत लिया. फिर वरुण का छत्र और अदिति के कुंडल ले भागा तथा घोर अत्याचार करने लगा. 16,100 देवपुत्रियों तथा मुनिपुत्रियों को रनिवास में कैद करके रख लिया.
देवमाता अदिति भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा की संबंधी थीं जिन्हें इस घटना की सूचना मिलने पर बहुत क्रोध आया, तथा उन्होंने भगवान कृष्ण से नरकासुर को खत्म करने की अनुमति मांगी.
नरकासुर की मृत्यु एक श्राप के कारण किसी स्त्री के हाथों ही हो सकती थी. सो श्रीकृष्ण ने सारथी का स्थान ग्रहणकर सत्यभामा को नरकासुर से युद्ध का अवसर प्रदान किया.सत्यभामा के साथ गरूड पर सवार होकर भगवान श्रीकृष्ण प्रागज्योतिषपुर आए. नरकासुर का अभेद किला स्वयं मूर दैत्य ने तैयार किया था. वहां प्रवेश करना बहुत कठिन था.
नगर इस तरह से बनाया गया था कि उसके चारों के पहाड़ उसे किले की तरह सुरक्षित बनाते थे. चारों ओर जल की भरी खाई थी. उसके बाद आग की ऊंची दीवार खड़ी की गई थी.
उसके भीतर मूर दैत्य ने दस हजार सुदृढ जाल बिछा रखे थे. भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी गदा के प्रहार से पहाड़ों को चूर-चूर कर दिया औऱ तलवार से सारे जाल को काट-काटकर फेंक दिया.
भगवान ने पांचजन्य शंख से भयंकर नाद किया जिसकी ध्वनि से असुर सेना का मस्तक फट गया. मूर दैत्य जल में सो रहा था. इस नाद से उसकी नींद खुली. मूर के पांच मुख थे. उसने गरूड पर अपना त्रिशूल चलाया जिसे श्रीकृष्ण ने नष्ट कर दिया.
मूर बौखलाकर गदा लेकर भगवान की ओर दौड़ा जिसे भगवान ने चूर-चूर कर दिया. फिर भगवान ने चक्र चलाकर उसके पांचों सिर काट लिए. मूर के वध के बाद उसके सात पुत्र युद्ध के लिए आए.
भगवान और गरूड़ ने उनका सेना समेत कुछ ही देर में सफाया कर दिया. अब भौमासुर अकेला रह गया था. उसने भगवान पर वही शक्ति चलाई जिसके प्रहार से उसने इंद्र को अचेत कर दिया था.वह शक्ति गरूड को लगी किंतु गरूड बस थोड़े से विचलित हुए. भगवान ने उस पर प्रहार कर उसके सारे अस्त्र-शस्त्र समाप्त कर दिए. फिर ब्रह्माजी का मान रखने के लिए उन्होंने सत्यभामा के हाथों भौमासुर का वध करा दिया.
इसके बाद पृथ्वी वहां उपस्थित हो गईं. उन्होंने भगवान से अनुरोध किया कि वह भौमासुर के पुत्र को अभयदान दें ताकि उसका वंश न समाप्त होने पाए. भगवान ने अनुरोध मान लिया.
भगवान ने अदिति के कुंडल वरूण का छत्र प्राप्त किया और भौमसुर द्वारा हरण की गई देवपुत्रियों तथा मुनिपुत्रियों को नरकासुर की कैद से मुक्ति दिलाई गई. उन सबने भगवान श्रीकृष्ण से विनती की कि वह उन्हें स्वीकार करें ताकि उन्हें सम्मान प्राप्त हो.
भगवान ने सभी को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर उनका खोया सम्मान उन्हें लौटाया तथा अमृतवर्षा करने वाले देवमाता अदिति के कर्णफूल भी उन्हें पुनः अर्पित कर दिए.
विजय के प्रतीक चिह्न के रूप में भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर के रक्त से अपने मस्तक पर तिलक किया था. इस कारण भगवान के शरीर में असुर के शरीर का दुर्गंध समा गई थी.भगवान चतुर्दशी की सुबह अपने महल में लौटकर आए थे जहां उनकी पत्नियों ने उन्हें सुगंधित जल से स्नान करवाया तथा इत्र का छिड़काव किया ताकि नरकासुर के शरीर की दुर्गन्ध भगवान के शरीर से चली जाए.
ऐसी मान्यता है कि इसी कारण नर्क चतुर्दशी के दिन सायंकाल में स्नान की परम्परा आरम्भ हुई. इसलिए नरक चतुर्दशी की सुबह को रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है. इस दिन प्रातःकाल हल्दी और चंदन के उबटन से स्नान करने पर रूप-सौंदर्य बढ़ता है.
रूच चतुर्दशी की प्रात:काल स्नान का विशेष महत्व होता है. सूर्योदय से पूर्व स्नान करें. इससे शरीर में दिव्य शक्ति का संचार होता है और कई प्रकार के रोगों से छुटकारा प्राप्त होता है.
स्नान से पूर्व वरुण देवता का स्मरण करते हुए जल में हल्दी व कुंकुम डालकर स्नान करें. मान्यता यह है कि इस दिन स्नान से शुद्ध होकर भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करने से पापों का क्षय होता है और रूप में निखार आता है.
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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