कुमार कार्तिकेय ने तोड़ दी गणेशजी की दांतः महादेव ने समुद्र में फेक दिया कार्तिकेय का रचा लक्षण शास्त्र

कुमार कार्तिकेय ने तोड़ दी गणेशजी की दांतः महादेव ने समुद्र में फेक दिया कार्तिकेय का रचा लक्षण शास्त्र

ganesha kartikeya
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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंएक बार राजा शतानीक ने महामुनि सुमंतु से पूछा– हे मुने! गणेशजी ने किसके लिये विघ्न उत्पन्न किया था, जिसके कारण उन्हें विघ्न विनायक कहा गया? आप विघ्नेश तथा उनके द्वारा विघ्न उत्पन्न करने के कारण मुझे बताने का कष्ट करें.

सुमन्तु मुनि बोले– राजन! एक बार कुमार कार्तिकेय लक्षण शास्त्र की रचना में तल्लीन थे. शास्त्र में पुरुषो और स्त्रियों के श्रेष्ठ लक्षणों के बारे में वह विस्तार से वर्णन जैसे जटिल कार्य में मनोयोग से जुटे थे.

यह कार्य इतना विशद और गंभीर था इस कारण कार्तिकेय उलझे थे. उसी समय वहां श्रीगणेशजी पहुंचे और वह कार्तिकेय के कार्य में विघ्न डालने लगे.

कुमार कार्तिकेय ने जो कार्य आरंभ किया था उसको लेकर उनमें गर्व का भाव आ गया था. इस अद्भुत कार्य में पड़े विघ्न को वह सह नहीं पाए और क्रोध में छोटे भाई पर प्रहार कर दिया.

क्रोधित कार्तिकेय ने झपटा मारा जिससे गणेशजी का एक दांत उखड़ गया. कार्तिकेय का क्रोध इतने में ही नहीं थमा. वह गणेशजी को मारने दौड़े. तभी भगवान शंकर आ गए उन्होंने पूछा कि कार्तिकेय तुम्हारे इस अतिशय क्रोध का क्या कारण है?कार्तिकेय ने कहा– पिताजी! मैं अपने लक्षण शास्त्र के अनुसार पुरुषों के लक्षण बनाने के उपरांत स्त्रियों के लक्षण बनाने में मग्न था. इसी बीच गणेशजी ने बिना कार्य के गंभीरता समझे बड़ा विघ्न किया.

पिताजी इस विघ्न के चलते मेरा ध्यान भंग हो गया. मेरा क्रम टूट गया. मैं स्त्रियों के लक्षण चाहकर भी नहीं बना सका. मेरा सब प्रयास निष्फल रहा. इस कारण मुझे क्रोध हो आया.

महादेवजी ने कार्तिकेय से उनका पूरा दुख सुना और गणेशजी के प्रति उनके भीषण क्रोध का कारण समझा. महादेवजी ने किसी तरह कार्तिकेयजी को समझा बुझाकर उनका क्रोध शांत किया और फिर मुस्कारने लगे.

हंसते हुए महादेवजी ने उनसे पूछा- पुत्र! तुमने बताया कि तुमने पुरुष के लक्षणों को समझकर उसे लिख लिया है. स्त्री के लक्षण लिखने का कार्य अधूरा रह गया. अच्छा बताओ, मुझमें पुरुष के कौन-से लक्षण हैं?

कार्तिकेय ने कहा– पिताश्री! आप में तो ऐसे अद्भुत पुरुष के लक्षण हैं कि संसार भर में आप कपाली के नाम से प्रसिद्ध होंगे. पुत्र का यह वचन सुनकर अब महादेवजी को क्रोध आ गया. उन्होंने कार्तिकेय के उस लक्षण-ग्रन्थ को उठाकर समुद्र में फेंक दिया.कार्तिकेय इससे पूर्व कि कुछ कह पाते भगवान शिव अन्तर्धान हो गये. शिवजी ने समुद्र को बुलाकर कहा- तुम स्त्रियों के आभूषण स्वरुप माने जाने वाले विलक्षण लक्षणों की रचना करो और कार्तिकेय ने जो पुरुष-लक्षण के विषय में कहा है उसको भी फिर से कहो.

समुद्र ने कहा– प्रभु! आपने जो आज्ञा मुझे दी हैं मैं उसे अपने पूरे सामर्थ्य के साथ पूरा करने का प्रयास करूंगा. महादेव ने कहा कि यह पुरुष-लक्षण का शास्त्र सामुद्रिक शास्त्र के नाम से प्रसिद्ध होगा.

शंकरजी अंतर्धान होने के बाद पुनःप्रकट होकर कार्तिकेय से बोले– कार्तिकेय! इस समय तुमने जो गणेश का दाँत उखाड़ लिया है उसे दे दो. यही उचित है और दुःख न करो.

निश्चय ही जो कुछ यह हुआ है, होना ही था. यह स्त्री पुरुष के लक्षणों का सामुद्रिक शास्त्र समुद्र को ही रचना था. यह गणेश के बिना सम्भव नहीं था. इसलिए दैवयोग से गणेश द्वारा यह विघ्न उपस्थित किया गया, उसका कोई अपराध नहीं है.

यदि तुम उन लक्षणों को प्राप्त करने की इच्छा रखते हो तो समुद्र से ग्रहण कर लो, किंतु स्त्री-पुरुषों का यह श्रेष्ठ लक्षणशास्त्र ‘सामुद्र-शास्त्र’ नाम से ही प्रसिद्ध होगा. अब तुम गणेश को तुम दांतयुक्त कर दो.

कार्तिकेय ने भगवान देवदेवेश्वर से कहा– आपके कहने से मैं दांत तो विनायक के हाथ में दे देता हूं, किंतु इन्हें इस दांत को सदैव धारण करना पड़ेगा. यदि इस दांत को फेंककर ये इधर-उधर घूमेंगे तो यह फेंका गया दांत इन्हें भस्म कर देगा.ऐसा कहकर कार्तिकेय ने गणेशजी का दांत उनके हाथ में रख दिया. भगवान देवदेवेश्वर ने गणेशजी को इस बात के सहमत कर लिया कि वह कार्तिकेय की बात को स्वीकार करेंगे. पिता की इच्छा रखने के लिए गणेशजी ने बात मान ली.

सुमन्तु मुनि ने कहा– राजन! आज भी भगवान शंकर के पुत्र विघ्नहर्ता महात्मा विनायक की प्रतिमा हाथ में दात लिए देखी जा सकती हैं. देवताओं की यह रहस्यपूर्ण बात देवता भी नहीं जान पाये थे. पृथ्वी पर इस रहस्य को जानना तो दुर्लभ ही है.

मैंने इस रहस्य को आपसे तो कह दिया हैं, किंतु गणेश को यह अमृत कथा चतुर्थी तिथि के संयोग पर कहनी चाहिए. जो इस चतुर्थी व्रत का पालन करता हैं उसके लिये इस लोक तथा परलोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता.

सुमन्त मुनि बोले– चतुर्थी तिथि में निराहार रहकर व्रत करना चाहिए. ब्राह्मण को तिल का दान देकर स्वयं भी तिल का भोजन करना चाहिये. इस प्रकार दो वर्ष का व्रत करने पर भगवान विनायक प्रसन्न होकर व्रती को अभीष्ट फल प्रदान करते हैं.

वह अपार धन-सम्पत्ति का स्वामी हो जाता है तथा परलोक में भी अपने पुण्य-फलों का उपभोग करने के पश्चात इस लोक में आकर वह दीर्घायु, कान्तिमान,बुद्धिमान, भाग्यवान तथा असाध्य-कार्यों को भी क्षण-भर में ही सिद्ध कर लेने वाला होता है.

(स्रोत- भविष्य पुराण ब्रह्मपर्व, बाइसवां अध्याय)

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