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पुंडरीकाक्ष स्तोत्र की साधना से ब्रह्महत्या के दोष से मुक्त हो राजा वसु हुए भगवान विष्णु में विलीन

पुंडरीकाक्ष स्तोत्र की साधना से ब्रह्महत्या के दोष से मुक्त हो राजा वसु हुए भगवान विष्णु में विलीन


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हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.हिरण्याक्ष के कोप से पृथ्वी को मुक्त कराने के लिए भगवान विष्णु वे वाराह अवतार लिया था. उन्होंने पृथ्वी को मुक्त करा लिया तो पृथ्वी ने सकाम रूप से उनकी स्तुति की और उनसे ज्ञान चर्चा के लिए अपने साथ रखा.

पृथ्वी ने पूछा- हे नाथ वसु और रैभ्य ने बृहस्पति से जब पूछा कि मोक्ष प्राप्ति कर्म से होती है या ज्ञान से? तब बृहस्पति ने उनकी इस शंका का निवारण कर दिया. यह आप बता चुके हैं.(देखें कथा- मोक्ष का अधिकारी कौन) फिर वसु ने क्या किया?

श्रीविष्णु बोले- पृथ्वी! वसु का मन सांसारिकता से भर गया था. अपने बेटे विवस्वान को राजपाट सौंपकर उन्होंने पुष्कर का रुख किया. वहां पहुंचकर पुंडरीकाक्ष स्त्रोत की कठिन साधना की. उसके फलस्वरूप वह मुझमें ही लीन हो गए.

पृथ्वी ने कहा-हे नारायण यदि पुंडरीकाक्ष की महिमा इतनी अधिक है तो मुझे कृपाकर पुंडरीकाक्ष स्त्रोत की महिमा और उससे जुड़ी कथा बताने का कष्ट करें.

श्रीहरि ने कहा- वसु पुष्कर में पुंडरीकाक्ष स्त्रोत का लगातार जप करते जा रहे थे. इससे अंतत: यह स्थिति होती है कि जिसमें सारा जगत विष्णुमय हो जाता है.

अभी वसु पाठ कर ही रहे थे कि उनके शरीर से नीले रंग के शरीर वाला एक व्यक्ति जिसकी आंखें अंगारे की तरह लाल थी और देखने में भयानक लगता था, प्रकट हुआ. वह वसु के सामने हाथ जोड कर बोला- अब मेरे लिए क्या आदेश है राजन?

वसु ने उससे पूछा- तुम हो कौन, क्या करने आये हो? देखने में व्याध या शिकारी जैसे लगते हो. तुम यहां क्यों आए हो. उस भयानक पुरुष ने अपने बारे में बताना शुरू किया.

महाराज! यह कलियुग में आपके पिछले जन्म की बात है. आप दक्षिण के जनस्थान राज्य के राजा थे. एक बार आप जंगल में शिकार खेलने गए. आपने मनोरंजन के लिए असंख्य जीवों को मारा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.आपके अंधाधुंध शिकार का शिकार एक हिरण भी हुआ. दरअसल वह हिरण नहीं बल्कि एक मुनि थे जो हिरण का रूप धरकर वन में विचर रहे थे. तीर लगते ही वह मर गए.

आप खुश हुए कि आपने हिरण मार लिया पर पास में जाकर देखा तो वहां एक तेजस्वी ब्राह्मण मरा पड़ा था. यह देख आप दुःखी हो अपने महल लौट आए.

आपने यह बात किसी को बता भी दी. समय बीतने पर एक दिन अचानक आपको याद आया कि मैं तो ब्रह्महत्या का दोषी हूं. उसी रात आपने संकल्प लिया कि ब्रह्महत्या से मुक्ति पाने के लिए कुछ भी करुंगा.

इसके लिए आपने एकादशी का उपवास रखा. अनेक व्रत किए. विष्णु भगवान की प्रसन्नता के लिए गोदान भी किया. एक दिन पेट में भयानक दर्द उठा. कोई औषधि काम न आ सकी. आपके प्राण निकल गए.

आपकी रानी का नाम था नारायणी. आखिरी समय तुमने उसे ही पुकारा था. नारायण कहते कहते आपके प्राण निकले थे. अंत समय में भगवान विष्णु का नाम लिया इसलिए विष्णु लोक में निवास मिला.

उस समय मैं तुम्हारे शरीर में एक ब्रह्मराक्षस के रूप में रह रहा था. इसलिए यह सारी बात भलीभांति जानता हूं. मैं भयंकर ब्रह्मराक्षस था और आपको भीषण कष्ट देना चाहता था पर आप तो विष्णु लोक आ गये थे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इतने में भगवान विष्णु के पार्षद आ गये. उन्होंने मुझे मूसलों से बहुत कूटा. मैं आपके रोएं के साथ बने छेद से बाहर निकल आया. आपको एक कल्प तक विष्णु लोक में रहना था. सो मेरी तो वहां पर एक न चलती.

मैंने प्रतीक्षा की. कल्प समाप्त हो गया तो फिर महाप्रलय हो गया. अब मुझे अगली सृष्टि का इंतजार था. अबकी बार आप कश्मीर के राजा सुमना के बेटे के रूप में पैदा हुए.

मैं मौका ताड़कर फिर आपके रोमछिद्रों से ही आप में घुस गया. यह अलग बात है कि आपने इस बार बहुत से पुण्य कार्य किए. यज्ञ-हवन और दान-दक्षिणा करते रहे.

आप भक्ति-भाव में तो थे लेकिन फिर भी भगवान विष्णु के नाम का स्मरण उचित तरीके से नहीं हुआ था इसलिए आपके पुण्य में वह प्रताप नहीं था जो मुझे आपके शरीर से बाहर निकाल सके.

अब यह पुंडरीकाक्ष स्त्रोत का जप आपने आरंभ किया तो इसकी अपार शक्ति के चलते मेरा आपके शरीर में और टिके रहना असंभव हो गया है. इसलिए आपके रोमछिद्रों से ही मैं बाहर निकल आया हूं.

महाराज मैं वही भयानक ब्रह्मराक्षस अब व्याध बन गया हूं. आपके सामने हूं. पहले मैं आपका अहित करना चाहता था पर अब आपका बहुत आभारी हूं कि आपने मुझे पुंडरीकाक्षपार स्त्रोत सुनने का अवसर प्रदान किया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इसके चलते अब मैं भी पापमुक्त हो गया. मुझमें बुद्धि का उदय हो गया. आपके चलते और भगवान की कृपा से मैं राक्षस से मनुष्य बन गया. अब मेरे लिए क्या आज्ञा है? राजा वसु घोर आश्चर्य में डूबे हुये यह सब सुन रहे थे.

वह बोले- हे व्याध आपके कारण मुझे पिछले जन्मों का स्मरण हुआ. मेरे प्रभाव से अब आपको व्याध नहीं धर्मव्याध के नाम से जाना जाएगा. आप विश्वप्रसिद्ध होंगे. यह पुडरीकाक्ष स्त्रोत जो भी सुनेगा उसे पुष्कर तीर्थ के स्नान का फल प्राप्त होगा.

यह कथा सुनाकर भगवान वाराह ने पृथ्वी से कहा- हे पृथ्वी! इसके बाद वसु के लिए विष्णुलोक से सजीला रथ आया और वसु उसमें सवार होकर विष्णुलोक चले गए. पुंडरीकाक्ष स्त्रोत की सिद्धि के प्रभाव से वे मुझमें विलीन हो गये.

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली
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