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शिव पुराणः शिवा की नादानी, शिव ने किया शिवा का त्याग

शिव पुराणः शिवा की नादानी, शिव ने किया शिवा का त्याग

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हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.शिवपुराण की कथा ब्रह्माजी अपने पुत्र नारद को सुना रहे हैं. पिछली कथा से आगे,

सती ने श्रीराम की परीक्षा के लिए सीता का रूप लिया था. इस बात का उन्हें भी पश्चाताप हो रहा था. वह सोच रही थीं कि अब शिवजी का सामना कैसे करूंगी. वह जो प्रश्न करेंगे उनका क्या उत्तर दूंगी. मैंने तो स्वामी के वचन पर भी शंका की है.

इसी चिंता में भरी वह दुखी हृदय से वहां पहुंची जहां शिवजी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे. उन्होंने आशा के अनुसार सतीजी से पहला प्रश्न यही किया- श्रीराम की परीक्षा आपने कैसे ली? क्या संतुष्टि हुई या कोई संशय अभी शेष है?

सतीजी के मुख से कुछ नहीं निकला. वह टाल-मोटल करती रहीं. महादेव इस प्रश्न को छोड़ दें उसने मन में बार-बार यही भाव आ रहे थे. शिवजी पूछते रहेस सतीजी टालती रहीं.

सर्वज्ञ भगवान के लिए क्या समस्या. उन्होंने आंख मूंदकर ध्यान किया और सबकुछ जान लिया. सती ने क्षणभर के लिए ही सही लेकिन जो रूप लिया था, शिवजी उनकी वंदना करते थे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.विष्णुजी ने बताया था कि महेश्वर ने स्वयं उन्हें प्रणम्य बनाया है. इस नाते उनकी लक्ष्मी भी प्रणम्य और पूजनीय हो गईं. शिवजी के लिए जो पूजनीया हैं, सती ने कौतुक में उनका ही रूप धर लिया. अब उन्हें पत्नी समान प्रेम कैसे दें!

शिवजी बोले तो कुछ नहीं परंतु मन से ही सती का त्याग करने का निर्णय कर लिया. सतीजी माया से ग्रसित थीं. वह समझ नहीं पा रही थीं फिर उन्होंने भी अपनी योगशक्ति से शिवजी के मन का भाव जान लिया.

शिवजी भी व्यथित थे. उन्होंने कैलास पर एक पेड़ के नीचे आसन लगाया और समाधि में चले गए. ब्रह्माजी के मुख से यहां तक की कथा सुनने के बाद नारद के मन में भी बेचैनी हुई.

नारद ने प्रश्न किया- पिताश्री यह तो बड़े दुख की बात थी कि इस तरह कौतुक में ही शिव और शिवा का वियोग हुआ था. उन्हें तो बहुत सारे कार्य संयुक्त रूप से संपन्न करने थे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.ब्रह्मा बोले- शिव और शिवा का वियोग हो ही नहीं सकता नारद. यह तो समझ का फेर है. संयोग-वियोग तो भोगियों के लिए हैं, योगियों के लिए कहां? उनके लिए दोनों स्थितियां एक सी हैं. शिव-शिवा के चरित्र को समझना इतना सरल नहीं है.

कही हई वाणी और उस वाणी के अर्थ को क्या अलग किया जा सकता है? दोनों का अस्तितत्व संयुक्त रूप से है और हमेशा रहेगा. वैसे ही दोनों शिव और शिवा का संयोग-वियोग उनकी इच्छा से और उनकी लीला स्वरूप ही होता है.

जो हुआ उसके पीछे भी महादेव की एक लीला थी. उन्हें पूर्व का एक कार्य पूरा करना था. शिवजी और उनके ससुर दक्ष के बीच एक विवाद हो गया था. दक्ष ने अज्ञानता में कुछ मूर्खताएं कर दी थीं.

मेरे द्वारा प्रजापति बनाए जाने से दक्ष गर्व में भर गया था. उसे अपनी उद्दंडता का दंड भुगतना ही था. शिव द्वारा शिवा का त्याग उसका ही परिणाम था. (शिव पुराण रूद्र संहिता, सती खंड-2) क्रमशः जारी….

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

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