पार्वतीजी ने कौतुक में मूंद दी महादेव की आंखें, अंधकार में डूबा ब्रह्मांड. देवी के स्पर्श से महादेव के शरीर से जन्मा एक अंधा बालकः अंधकासुर कथा भाग-एक

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हमने पहले भी बताया कि भोलेनाथ को समर्पित एप्प लाने की तैयारी चल रही है. दो-तीन दिनों में एप्प बन जाएगा. उसमें शिवजी की पूजा से जुडे सारे मंत्र, शिवलिगों के बारे में जानकारी, घर में शिव-गौरी पूजन विधि, उपयोगी मंत्र, पार्वतीजी की पूजा, शिव के विभिन्न स्वरूपों की पूजा विस्तृत होगी साथ ही शिवपुराण भी होगा.
कुल मिलाकर कह सकते हैं कि शिव-पार्वती की पूजा और उनकी महिमा से जुड़ी पढ़ने जानने योग्य चीजों के लिए आपको कहीं और जाने की जरूरत न होगी. आज आपको शिव पुराण में अंधकासुर की कथा दे रहे हैं, जो काफी पहले प्रकाशित हो चुकी है. कई लोगों ने इसकी मांग पिछले दिनों की थी.
भगवान शिव ने मंदार पर्वत पर लंबी समाधि लगाई थी. माता पार्वती को एक मजाक सूझा. उन्होंने अपने हाथों से भोलेनाथ की आंखें मूंद दीं.
महादेव के नेत्रों को स्वयं शक्तिस्वरूपा ने बंद किया था. इससे संसार में अंधकार छा गया. साधनारत महादेव का शरीर प्रचंड अग्नि की तरह जल रहा था.
माता के स्पर्श करते ही पसीने की बूंदें बनीं और धरती पर गिरीं. उससे एक भयंकर स्वरूप वाला जीव पैदा हुआ जो अंधकार के कारण जन्म से अंधा था.
उसका भयंकर स्वरूप देखकर स्वयं माता के मन में भय पैदा हुआ. महादेव ने कहा यह जीव आपके कौतुक के कारण हुए अंधकार में हम दोनों के स्पर्श से पैदा हुआ है इसलिए हमारी संतान जैसा है.
हिरण्यकश्यपु का भाई असुरराज हिरण्याक्ष संतानहीन था. हिरण्यकश्यपु को एक बेटा था प्रह्लाद जिसकी रक्षा स्वयं नारायण ने नरसिंह अवतार लेकर की थी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
हिरण्याक्ष भी अपने भतीजे की तरह तेजस्वी संतान की इच्छा रखता था. शिवरूप में संतान प्राप्ति के लिए वह महादेव की तपस्या कर रहा था.
जब अंधक पैदा हो गया तो उसे लेकर शिवजी हिरण्याक्ष के पास गए. महादेव ने कहा- पूर्वजन्म और वर्तमान के कर्मों के कारण तुम मुझे प्राप्त नहीं कर पाओगे. फिर भी मैं तुम्हें अपने अंश से जन्मा पुत्र देता हूं.
महादेव ने अंधक को हिरण्याक्ष को सौंप दिया. शिवअंश पाकर हिरण्याक्ष बड़ा प्रसन्न हुआ. अंधे होने के कारण उसका बालक का नाम अंधक रखा गया.
अंधक को हिरण्याक्ष ने उत्तराधिकारी घोषित किया. परंतु असुर उसे कई कारणों से स्वीकार नहीं कर रहे थे.
एक तो वह अंधा था इस कारण वह देवों से युद्ध में असमर्थ था. दूसरा उसका जन्म असुरों से नहीं बल्कि दैवीय संयोग से हुआ था.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
असुरगुरू शुक्राचार्य के परामर्श पर उसने ब्रह्मा की तपस्या शुरू की. कई सहस्त्र वर्ष के घोर तप से ब्रह्रमा प्रसन्न हुए और उससे वरदान मांगने को कहा.
अंधक ने दो वरदान मांगे- पहला उसे त्रिकालदर्शी नेत्र मिल जाएं और दूसरा वह अमर हो जाए. ब्रह्मा ने नेत्र की बात तो मान ली और पर अमरता देने से मना कर दिया.
ब्रह्मा ने कहा- जिसने जीवन लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है. अपनी पसंद से अपनी मृत्यु की शर्त चुन लो. मैं वह वरदान दे सकता हूं.
अंधक ने बुद्धि लगाई. उसने मांगा- मेरे शरीर के रक्त से मेरे जैसे जीव पैदा हो जाएं और मेरा अंत तभी हो जब मैं अपनी मातातुल्य स्त्री पर आसक्त हो जाउं.
अंधक को यह पता था कि वह स्त्री-पुरुष को संयोग से नहीं बल्कि शिव के योगबल से उत्पन्न हुआ है. सो उसकी माता का प्रश्न ही नहीं है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
वह इस बात से अंजान था कि पार्वती ने उसे पुत्र रूप में स्वीकार किया था. प्रहलाद के बाद अंधक असुरराज अंधकासुर बना.
उसने अपने सभी विरोधियों को समाप्त किया और असुरों को संगठित कर तीनों लोगों को जीता. एक बार अंधक की किसी देवकन्या से विवाह की इच्छा हुई.
उसने अपने मंत्रियों को संसार की सबसे सुंदर कन्या का पता लगाने के लिए भेज दिया. उसके मंत्रियों ने खोजबीन शुरू की.
एक दिन उनकी नजर कैलाश पर विचरण करती माता पार्वती पर पड़ी. उन्होंने देवी के रूप का अंधक के सामने वर्णन किया तो अंधक उनपर मोहित हो गया.
उसने महादेव के पास दूत भेजे और देवी पार्वती को अंधकासुर को सौंप देने को कहा. शिवजी समझ गए कि अब अंधक का अंत आ गया है. इसलिए उन्होंने दूतों को समझाकर लौटा दिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
इसी बीच अंधक के एक पुत्र कनक ने इंद्र को युद्ध के लिए ललकारा. इंद्र के हाथों कनक का वध हो गया. अंधकासुर के भय से घबराएं इंद्र शिवजी की शरण में पहुंचे.
महादेव ने इंद्र को अभयदान दिया. क्रोधित अंधकासुर कैलाश पर सेना लेकर चढ़ आया. उसने वहां देवी पार्वती को देख लिया और मोहित हो गया.
महादेव अपने अंश का वध नहीं करना चाहते थे. उन्होंने अंधकासुर को तरह-तरह से समझाया लेकिन वह नहीं माना.
महादेव और अंधक में संग्राम हुआ. इसी बीच ग्रहों के सेनापति मंगल का जन्म हुआ. शुक्राचार्य को शिवजी द्वारा निगल लेने और अंधकासुर को शिवजी ने हजार वर्ष अपने त्रिशूल पर टांगकर रखा फिर अंधक को अपना गण बनाया. यह सारी कथा विस्तार से अगले तीन और पोस्ट में आज ही पढ़ें.
संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली