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वेदों में बताई गई है देवताओं की तैंतीस कोटिः याज्ञवल्क्य ने जनक के दरबार में दिया 33 कोटि देवों का वर्णन

वेदों में बताई गई है देवताओं की तैंतीस कोटिः याज्ञवल्क्य ने जनक के दरबार में दिया 33 कोटि देवों का वर्णन

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राजा जनक के दरबार में एक बार ब्रह्मचर्चा चली. याज्ञवल्क्य जनक के राजपुरोहित थे. चर्चा वेद आधारित देवताओं की संख्या और कोटि पर पहुंची.

विदग्ध मुनि ने याज्ञवल्क्य से पूछा- हे ऋषिश्रेष्ठ वैदिक शास्त्र कहते हैं जो हमें देता है वह देवता है. तो फिर देवता कितने हैं? आप वेदों के आधार पर उनकी कोटि कैसे निर्धारित करेंगे?

विद्ग्ध ने आगे कहा- दिव्य शक्तियों से युक्त सभी जड़ और चेतन भी देव हैं. सूर्य, चंद्र, नक्षत्र से लेकर माता-पिता, गुरू आचार्य और अतिथि को भी देव कहा जाता है. देवों की संख्या के बारे में एक भ्रम हो रहा है. वेद आधारित निदान करें.

याज्ञवल्क्य ने उत्तर देना शुरू किया- हे विदग्ध! तैंतीस कोटि के जड़-चेतन ही देवता हैं. आठ वसु, बारह आदित्य, ग्यारह रूद्र, इंद्र एवं प्रजापति. वेद इन 33 प्रकार के देवताओं के बारे में कहते हैं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

विदग्ध ने कहा- इनके नाम विस्तार पूर्वक बताएं ऋषिवर. याज्ञवल्क्य ने देवताओं का परिचय देना आरंभ किया. अग्नि, पृथ्वी, वायु, अंतरिक्ष, सूर्य, द्युलोक, चंद्रमा और नक्षत्र- ये आठ वसु हैं.

दस प्राण और ग्यारहवीं आत्मा- ये ही एकादश रूद्र हैं. इनके शरीर त्यागने पर शरीर व्यर्थ हो जाता है और बंधु-बांधव रोने लगते हैं, इसलिए इन्हें रूद्र(रोने वाला) कहा जाता है.

एक वर्ष के 12 महीने ही बारह आदित्य हैं. ये मास मनुष्य की आयु क्षीण या कम करते हैं इसलिए इन्हें आदित्य कहा जाता है.

गर्जना करने वाला बादल ही इंद्र है. इसलिए परवर्ती काल में इंद्र को वर्षा का देवता कहा जाने लगा. यज्ञ को ही प्रजापति समझना चाहिए.

याज्ञवल्क्य ने चर्चा को आगे बढ़ाते कहा- हे मुनिवर विदग्ध! देवताओं की संख्या अन्य प्रकार से भी बताई गई है. अग्नि, वायु, अंतरिक्ष, सूर्य, पृथ्वी और द्युलोक को षटदेव कहा गया है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

विदग्ध ने पूछा- फिर दो देव कौन से हैं? याज्ञवल्क्य ने बताया- अन्न और प्राण को दो देवता कहा जाता है.

विदग्ध ने अगला प्रश्न पूछा- एक देव किसे मानेंगे? प्राण रूपी परमात्मा को ही एकमात्र देव या परमदेव कहा जाना चाहिए- याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया.

महर्षि याज्ञवल्क्य ने वेदों में वर्णित देवताओं के बारे में यह सरल व्याख्या की. इससे जनक की सभा में मौजूद सभी विद्वान नतमस्तक हो गए और उन्हें श्रेष्ठ मान लिया.

याज्ञवल्क्य ने इत प्रकार 33 कोटि के देवताओं के बारे में बताया जिसे वेदों के मर्मज्ञों ने स्वीकार किया. कोटि के दो अर्थ होते हैं- वर्ग और करोड़. इसलिए देवताओं की 33 कोटि मानी जानी चाहिए न कि 33 करोड़. (प्रश्न उपनिषद से)

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

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