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हरि माया में फंसकर नारद भूल गए हरिनामः ऋषि के मन का मोह मिटाने को श्रीहरि ने रची मायाः अथर्ववेद की कथा

हरि माया में फंसकर नारद भूल गए हरिनामः ऋषि के मन का मोह मिटाने को श्रीहरि ने रची मायाः अथर्ववेद की कथा

brahma
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नारदजी को नारायण भक्ति का रह-रहकर मान हो जाता था. इसी गुमान में वह जाने-अनजाने दूसरों का अपमान भी कर देते थे.

श्रीविष्णु को नारदजी बड़े प्रिय थे लेकिन गुमान से साधु की साधुता खत्म हो जाती है. इसे श्रीहरि चिंतित थे. एक दिन श्रीहरि नारदजी को साथ लेकर कहीं घूमने निकले.

एक गांव के पास श्रीहरि ने कहा- नारद मैं तो थक गया, प्यास लगी है. पानी का प्रबंध करिए. नारद, भगवान के लिए पानी खोजने निकले तो प्रभु ने माया फैलाई.

थोड़ी दूर पर नारद को एक कुआं दिखाई पड़ा जहां कुछ औरतें पानी भर रही थीं. एक कन्या को देखकर नारद ऐसे मोहित हुए कि सुध ही न रही, किस काम से आए हैं.

कन्या ने लपककर घड़ा भरा और अपने घर की ओर भागी. नारद ने भी उसके पीछे दौड़ लगा दी. कन्या के द्वार पर नारद ने नारायण नाम की आवाज लगाई.

घर का मालिक नारायण नाम सुनकर बाहर आया और नारदजी को तुरंत पहचान गया. उसने नारदजी को घर में बुलाया और सत्कार किया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.नारदजी ने कहा कि वह उसकी कन्या से विवाह करना चाहते हैं. बेटी के लिए नारद से बेहतर वर कहां मिल सकता था! वह नारदजी से बेटी के विवाह को राजी हो गया.

नारदजी का विवाह हो गया. ब्राह्मण ने नारदजी को खेती-बाड़ी के लिए थोड़ी जमीन दे दी. नारद को परिवार चलाना था, इसलिए वह खेती-बाड़ी में जुट गए.

जिस वीणा को बजाते नारद संसार में नारायण नाम लेते फिरते थे, वह खूंटी पर टंग गई. दिनभर खेतों में मेहनत करते शाम को थके घर आते. नारायण नाम की सुध कहां रही!

नारदजी गृहस्थी कार्य में मेहनती निकले. खूब अऩ्न उगाया और समृद्ध हो गए. इधर परिवार भी बढ़ गया. कई संतानें भी हो गईं. संतानों के पालन-पोषण में नारद फंसे रहे.

एक बार गांव में भीषण बारिश हुई. गांव के पास की नदी में उफान आया. घर, खेत, मवेशी सभी बह गए. नारद अपनी पत्नी और बच्चों को लेकर जान बचाने भागे.

घर में रखा जो कुछ भी धन बटोर सकते थे, उसे गठरी में बांधा और पत्नी तथा बच्चों के साथ सुरक्षित स्थान की तलाश में निकल पड़े.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.घर से निकलते ही अंधेरे में ठोकर लगी और गठरी हाथ से छूटकर बह गई. नारद ने सोचा चलो कोई बात नहीं धन ही गया है फिर से कमा लेंगे.

आगे बढ़े. कुछ दूरी पर पत्नी का पैर गडढ़े में पड़ा. बगल से बच्चा छूटकर पानी में गिरा और बह गया. पत्नी बिलखने लगी पर क्या हो सकता था.

इसी तरह एक-एक करके दो और बच्चे हाथ से छूटे और बाढ़ में बह गए. अब पति-पत्नी भर रह गए. दोनों जान बचाकर भाग रहे थे कि अचानक पानी के भंवर में फंस गए.

नारदजी तो किसी तरह निकल आए लेकिन पत्नी भंवर में फंसकर डूब गईं. नारदजी पत्नी और बच्चों को गंवाकर बिलख-बिलखकर रोने लगे. जमी-जमाई गृहस्थी एक दिन में समाप्त हो गई थी.

वह अपने भाग्य को कोस रहे थे और पुरानी बातें याद करने लगे. उन्हें ध्यान आया कि कैसे वह श्रीहरि को प्यासा छोड़कर आए थे और मोह-माया में जकड़ गए.

नारद को पछतावा हुआ कि उन्होंने यह क्या कर डाला. अपने प्रभु को प्यासा छोड़कर सांसारिकता में फंस गए और क्या-क्या दिन देखने पड़ गए.

यह ख्याल आते ही वह दहाड़ें मारकर रोने लगे. तभी वह गांव लुप्त हो गया. कहीं कोई बाढ़ नहीं थी. प्रभु तो उसी पेड़ के नीचे बैठे हैं जहां नारद छोडकर गए थे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.प्रभु ने पूछा- नारद पानी नहीं लगाए. बहुत जोर की प्यास लगी है. नारद प्रभु के चरणों में बैठकर आंसू बहाने लगे. उनके अश्रु से प्रभु के पांव धुल गए.

प्रभु ने कहा- नारद रोते क्यों हो. अभी कुछ पल पहले ही तो गए थे. विलंब नहीं हुआ है. देखो कहीं पानी मिल जाए. नारद को तो लगता था कि कई वर्षों बाद लौटे हैं.

वह समझ गए कि उनके मन में आया गर्व तोड़ने के लिए नारायण की रची यह माया थी. आंखें खुल गईं थीं और वह पहले की तरह नारायण नाम की महिमा गाने लगे.

प्रभु के मन में सभी भक्त का समान स्थान है. प्रभु की दृष्टि में यदि किसी भक्त को अपना स्थान बढ़ाना है तो एकमात्र रास्ता है- संसार में भक्ति की अलख जगाना. किसी आडंबर या दिखावे से प्रभु की नजरों में स्थान नहीं बढ़ता.

प्रभु शरणम् इसी उद्देश्य के साथ बनाया गया. आडंबरों में पड़ने से बेहतर है कि आप और हम मिलकर संसार में भक्ति की अलख जगाएं और प्रभु की नजरों में श्रेष्ठ बनें.

यदि आप भी कोई धार्मिक या प्रेरक कथा भेजना चाहते हैं तो मेल करें askprabhusharnam@gmail.com पर या 9871507036 पर Whatsapp करें. कथा अप्रकाशित और प्रकाशन के योग्य रही तो हम उसे स्थान देंगे.

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली

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