बगलामुखी कवचः सम्पूर्ण पाठ, हिंदी अर्थ, महत्व व पाठ विधि

बगलामुखी कवच — सम्पूर्ण पाठ, अर्थ, महत्व और पाठ विधि (हिंदी)

माँ बगलामुखी कवच एक प्राचीन तांत्रिक-स्तोत्र है जो साधक को मानसिक स्थिरता, वाक्-संयम और शत्रु-बाधाओं से रक्षा का आशीर्वाद देता है। यह कवच विश्वसारोद्धार तन्त्र से लिया गया है। पार्वती जी के द्वारा भगवान शिव से पूछे जाने पर भगवती बगला के कवच के विषय में प्रभु वर्णन करते हैं कि देवी बगला शत्रुओं के कुल के लिये जंगल में लगी अग्नि के समान है। वे साहस्य देने वाली और मुक्ति प्रदान करने वाली है।

माँ बगलामुखी कवच क्यों पढ़ें?

बगलामुखी दस महाविद्याओं में से एक हैं। इनकी उपासना से वाणी में तेज, निर्णय में स्पष्टता और विवादों में विजय का आशीर्वाद मिलता है। कवच का पाठ मुख्यतः सुरक्षा-भाव से किया जाता है—ताकि साधना के दौरान कोई मानसिक या तांत्रिक बाधा न आए।

  • इस कवच के पाठ से अपुत्र को धीर, वीर और शतायुष पुत्र की प्राप्ति होती है और निर्धन को धन प्राप्त होता है।
  • महानिशा में इस कवच का पाठ करने से सात दिन में ही असाध्य कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं।
  • तीन रात्रियों को पाठ करने से ही वशीकरण सिद्ध हो जाता है।
  • मक्खन को इस कवच से अभिमंत्रित करके यदि बंध्या स्त्री को खिलाया जाये, तो वह पुत्रवती हो जाती है।
  • इसके पाठ व नियम पूजन से मनुष्य बृहस्पति के समान हो जाता है, नारी समूह में साधक कामदेव के समान व शत्रु के लिये यम के समान हो जाता है।
  • मां बगलामुखी के प्रसाद से उसकी वाणी गद्य-पद्यमयी हो जाती है। उसके गले से कविता लहरी का प्रवाह होने लगता है।
  • इस कवच का पुरश्चरण एक सौ ग्यारह पाठ करने से होता है, बिना पुरश्चरण के इसका उतना फल प्राप्त नहीं होता।

इस कवच को भोजपत्र पर अंगंध से लिखकर पुरुष को दाहिने हाथ में व स्त्री को बायें हाथ में धारण करना चाहिए।

ध्यान दें: तांत्रिक अनुष्ठानों में गुरु-मार्गदर्शन अत्यंत आवश्यक है। बिना दीक्षा या अनुभव के जटिल प्रयोग न करें। माँ बगलामुखी कवच को यदि बिना किसी योग्य साधक के मार्गदर्शन में सिद्ध करने के प्रयास किए जाएं तो इसके गहरे दुष्परिणाम हो सकते हैं। 

यदि गलत मंशा से इस कवच का पाठ या सिद्धि के प्रयास होते हैं तो साधक का स्वयं का नाश होता है, गहरा शोक प्राप्त होता है। इसलिए इस तंत्र साधना में बहुत सावधानी आवश्यक है।


ध्यान

सौवर्णासनसंस्थितां त्रिनयनां पीताशुकोल्लासिनीम्।
हेमाभांगरुचिं शशांकमुकुटां सच्चम्पकस्रग्युताम्।।
हस्तैर्मुद्गर पाशवज्रदसनाः संविततं भूषणैः।
व्याप्ताग्निं बगलामुखीं त्रिजगतां संस्तम्भिनीं चिन्तयेत्।।


विनियोगः

ॐ अस्य श्रीबगलामुखीस्तोत्रमन्त्रकवचस्य भैरव ऋषिः, विराट् छन्दः श्रीबगलामुखी देवता, ह्रीं बीजम्, श्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकं, मम पराय च मनोभिलाषितैकाग्र्यसिद्ध्यै विनियोगः।


ऋषि-न्यास

शिरसि भैरव ऋषये नमः।
मुखे विराट् छन्दसे नमः।
हृदि बगलामुखीदेवतायै नमः।
गुह्ये ह्रीं बीजाय नमः।
पादयोः श्रीं शक्तये नमः।
सर्वाङ्गे क्लीं कीलकाय नमः।


करन्यास

ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः।
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः।
ॐ हूं मध्यमाभ्यां नमः।
ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः।
ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
ॐ हः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।


हृदयादि न्यास

ॐ ह्रां हृदयाय नमः।
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा।
ॐ हूं शिखायै वषट्।
ॐ ह्रैं कवचाय हूं।
ॐ ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्।
ॐ हः अस्त्राय फट्।


मन्त्रोच्चारः

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ह्रीं ह्लीं श्रीबगलानने मम शत्रून नाशय नाशय ममैश्वर्याणि देहि देहि, शीघ्रं मनोवाञ्छितं कार्यं साधय साधय ह्रीं स्वाहा।


॥ अथ कवचम् ॥

शिर मे पातु ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ह्रीं ह्लीं पातु ललाटकम्।
सम्बोधनपदं पातु नेत्रे श्री बगलानने।।1।।

श्रुती मम शत्रुं पातु नासिकां नाशयप्रियम्।
पातु गण्डौ सदा ममैश्वर्याभिवर्धनं तु मस्तकम्।।2।।

देहि वाचं सदा जिह्वां पातु शीघ्रं वचो मम।
कण्ठदेशं मनः पातु वाञ्छितं वाग्मूलकम्।।3।।

कार्यं साधयह्रीं तु करौ पातु सदा मम।
मायायुक्ता यथा श्रीं हृदयं पातु सर्वदा।।4।।

अग्निधिक्चक्रवाल्यादिदण्डाढ्या बगलामुखी।
रक्षां करोतु सर्वत्र गृहेऽरण्ये सदा मम।।5।।

प्राणादीन मनुः पातु सर्वाङ्गे सर्वसिद्धिषु।
मन्त्रराजः सदा रक्षां करोतु मम सर्वदा।।6।।

ॐ ह्रीं पातु नाभिदेशं कटि मे बगलाऽवतु।
मुखवर्णप्रियं पातु लिङ्गं मे मुण्डयुक्तमकम्।।7।।

जानुनी सर्वदुःखानां पातु मे वर्णपत्रकम्।
वाचं मुखं तथा पादं षड्वर्णाः परमेश्वरी।।8।।

जङ्घायुग्मं सदापातु बगला शत्रुमोहिनी।
पृष्ठभयेति पदं पृष्ठं पातु वर्णत्रयं मम।।9।।

जिह्वावर्णप्रियं पातु गुल्फौ मे कलयेति च।
पादौ च सर्वदा पातु बुद्धिः पादतले मम।।10।।

विनाशयपदं पातु पादांगुल्योनखानि मे।
ह्रीं बीजं सर्वदा पातु बुद्धिविद्यवचांसि मे।।11।।

सर्वाङ्गं प्राणवः पातु स्वाहा रोमाणि मेऽवतु।
प्राची पूर्वादले पातु चामुण्डायां विष्णुवल्लभा।।12।।

माहेशी दक्षिणे पातु चामुण्डा राक्षसेऽवतु।
कौमारी पश्चिमे पातु वारुणे चापराजिता।।13।।

वाराही च उत्तरे पातु नारसिंही शिवेऽवतु।
ऊर्ध्वं पातु महालक्ष्मीः पाताले शारदाऽवतु।।14।।

इन्द्रादयौ शत्रुः पातु सायुधाः सवाहनाः।
राजद्वारे महादुर्गे पातु मां गणनायकः।।15।।

श्मशाने जलमध्य च भैरवः सदाऽवतु।
त्रिभुजा रक्तवसनाः सर्वाभरणभूषिताः।।16।।

योगिन्यः सर्वदा पातु महारात्रौ सदा मम।।17।।


फलश्रुति

इति ते कथितं देवि कवचं परमाद्भुतम्।।17।।
श्रीविजयं नाम कवचं सर्वशत्रुविजयप्रदम्।।18।।

अपुत्रो लभते पुत्रं धीरं शूरं शतायुषम्।।18।।
निर्धनो धनमाप्नोति कवचास्यास्य पाठतः।।19।।

जपित्वा मन्त्रराजं तु ध्यात्वा श्री बगलामुखीम्।।19।।
पठेदिदं हि कवचं निशायां नियमात् तु यः।।20।।

यद् यद् कामयते कामं साध्यासाध्ये महीतले।।20।।
तत् तत् काममवाप्नोति सप्तरात्रेण शंकर।।21।।

गुरुं ध्यात्वा सुरां पीत्वा रात्रौ शक्तिसमन्वितः।।21।।
कवचं यः पठेद् देवि तस्यासाध्यं न किञ्चन।।22।।

यं ध्यात्वा च जपेन्मन्त्रं सहस्रं कवचं पठेत्।।22।।
त्रिरात्रेण वशं याति मृत्योः तत्र न संशयः।।23।।

लिखित्वा प्रतिमां शत्रोः सतालेन हरिद्रया।।23।।
लिखित्वा हृदि तत्पादं तं ध्यात्वा च जपेन् मनुम्।।24।।

एकविंशद्दिनं यावत् त्र्यहं च सहस्रकम्।।24।।
जपित्वा पठेत् तु कवचं चतुर्विंशतिवारकम्।।25।।

संस्तम्भं जायते शत्रुर्नास्ति कार्या विचारणा।।25।।
विवादे विजयं तत्र संग्रामे जयमाप्नुयात्।।26।।

श्मशाने च भयं नास्ति कवचस्य प्रभावतः।।26।।
नवनीतं चाभिमन्त्र्य स्त्रीणां दद्यान्महेश्वर।।27।।

वन्ध्यायां जायते पुत्रो विद्याबलसमन्वितः।।27।।
श्मशानांगारमादाय भौमे रात्रौ शनावथ।।28।।

पादोदकेन स्पृष्ट्वा च लिखेत् लोहशलाकया।।28।।
भूमौ शत्रोः स्वरूपं च ह्रीं नाम समालिखेत्।।29।।

हस्ते तद्धृदये दृष्ट्वा कवचं त्रिदिनं पठेत्।।29।।
ध्यात्वा जपेन् मन्त्रराजं नवरात्रं प्रयत्नतः।।30।।

दह्यते श्वरदाहेन दशमेऽहनि न संशयः।।30।।
भूजपत्रेऽथवा स्तोत्रमङ्गंधेन संलिखेत्।।31।।

धारयेद् दक्षिणे बाहौ नारी वामभुजे तथा।।31।।
संग्रामे जयमाप्नोति नारी पुत्रवती भवेत्।।32।।

संपूज्य कवचं नित्यं पूजायाः फलमालभेत्।।32।।
प्राणादीन शत्रुर्नैव कर्तुं शक्नोति तं जनम्।।33।।

वृहस्पतिसमो वापि विभवे धनदोपमः।।33।।
कामतुल्यो नारीणां शत्रूणां च यमोपमः।।34।।

कवितालहरी तस्य भवेद् गंगाप्रवाहवत्।।34।।
गद्यपद्यमयी वाणी भवेद् देवीप्रसादतः।।35।।

एकादशशतं यावत् पुरश्चरणमुच्यते।।35।।
पुरश्चरणविहीनं तु न चेदं फलदायकम्।।36।।

न देयं परहस्तस्थं दुर्जनस्य विशेषतः।।36।।
देयं शिष्याय भक्ताय पवित्रं चाप्यथाऽऽशुयात्।।37।।

इदं कवचमश्नात्वा भजेद् यो बगलामुखीम्।।37।।
शतकोटि जपित्वा तु तस्य सिद्धिर्न जायते।।38।।

दाराढ्यो मनुजोऽयं लक्ष्मीपतिः प्राप्नोति सिद्धिं पराम्।।38।।
विद्यां श्रीविजयं तथा सुनियतं धीरं च वीरं वरम्।।39।।

प्राणादीन मनुं विलिख्य नितरां भूजत्रेऽङ्गंधेन वै।।39।।
धृत्वा राजपुरं जिति खलु ते दासोऽस्ति तेषां नृपः।।40।।

॥ इति श्रीविश्वसारोद्धारतन्त्रे पार्वतीश्वरसंवादे बगलामुखी कवचं सम्पूर्णम् ॥


क्रमवार हिंदी भावार्थ (सरल शब्दों में)

प्रस्तावना (श्लोक 1–4)

  • साधक देवी से प्रार्थना करता है कि वह उसके मस्तक, ललाट, नेत्रों की रक्षा करें।

  • देवी उसके कान, नाक, गण्ड और मस्तक की रक्षा करें तथा ऐश्वर्य में वृद्धि करें।

  • वाणी, जिह्वा, कंठ और मन की रक्षा हो; वाञ्छित कार्य शीघ्र सिद्ध हों।

रक्षा-भूमिकाएँ (श्लोक 5–11)

  • देवी बगलामुखी अग्नि, चक्र, शूल आदि से युक्त होकर गृह और वन में सर्वत्र रक्षा करें।

  • प्राण, मनु, मन्त्रराज साधक के सम्पूर्ण अंगों और सिद्धियों की रक्षा करें।

  • नाभि, कटि, मुख, लिङ्ग, जानु, वाणी, मुख, पाद, जङ्घा, पृष्ठ, गुल्फ, पादतल की रक्षा हो।

दिक्पाल और देवी-देवताओं की रक्षा (श्लोक 12–17)

  • प्राची, पूर्वादल, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर, ऊर्ध्व, पाताल—सभी दिशाओं में देवी-देवता रक्षा करें।

  • इन्द्रादि शत्रु, राजद्वार, श्मशान, जलमध्य में भैरव और योगिनियाँ रक्षा करें।

फलश्रुति (श्लोक 18–40)

  • इस कवच के पाठ से अपुत्र को पुत्र, निर्धन को धन प्राप्त होता है।

  • सात रात्रि में कामनाएँ पूरी होती हैं; विवाद और संग्राम में विजय मिलती है।

  • पुरश्चरण (1100 पाठ) आवश्यक है; बिना पुरश्चरण के फल नहीं मिलता।


पाठ विधि — कैसे पढ़ें (स्टेप-बाय-स्टेप)

  1. समय: प्रातः स्नान के बाद या सायंकाल। महानिशा में पाठ विशेष फलदायी है।

  2. स्थान: शांत, स्वच्छ कोना; देवी की प्रतिमा/चित्र सामने रखें।

  3. दिशा: पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें।

  4. वस्त्र: स्वच्छ वस्त्र; पीला वस्त्र प्रिय है पर अनिवार्य नहीं।

  5. आरम्भ: दीपक जलाएँ, अगरबत्ती, पीले पुष्प अर्पित करें।

  6. विनियोग: विनियोग मंत्र का उच्चारण करें।

  7. न्यास: ऋषि-न्यास, करन्यास और हृदयादि न्यास करें।

  8. मन्त्रोच्चार: बीज मंत्र का उच्चारण करें।

  9. कवच पाठ: संस्कृत उच्चारण से कवच पढ़ें; कठिन लगे तो हिंदी अर्थ समझते हुए पढ़ें।

  10. समापन: धन्यवाद, छोटी स्तुति या आरती; प्रसाद अर्पित करें।


महत्व और लाभ (मान्यतानुसार)

  • मानसिक दृढ़ता, धैर्य और सकारात्मक दृष्टिकोण।

  • वाणी पर संयम; विवादों में विजय का आशीर्वाद।

  • अपुत्र को पुत्र, निर्धन को धन प्राप्त होता है।

  • सात दिन में असाध्य कार्य सिद्ध होते हैं।

  • तांत्रिक परंपरा में वशीकरण/आकर्षण/संरक्षण संबंधी सिद्धियाँ (केवल गुरु-मार्गदर्शन में)।


सावधानियाँ

  • कवच के तांत्रिक संदर्भों को बिना गुरु के प्रयोग न करें।

  • श्रद्धा, शुद्धता और विधि के बिना केवल जप से अपेक्षित फल नहीं मिलता।

  • पुरश्चरण (1100 पाठ) आवश्यक है; बिना पुरश्चरण के फल नहीं मिलता।

  • कवच को अयोग्य या दुर्जन के हाथ न दें।

  • गहन अनुष्ठान हेतु योग्य मार्गदर्शन आवश्यक है।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

क्या पीला वस्त्र पहनना अनिवार्य है?

नहीं; पीला वस्त्र प्रिय है पर अनिवार्य नहीं। स्वच्छ वस्त्र और श्रद्धा अधिक महत्वपूर्ण है।

क्या घर में भी पाठ कर सकते हैं?

हाँ, घर में शांत और स्वच्छ स्थान पर श्रद्धापूर्वक पढ़ सकते हैं। जटिल तांत्रिक अनुष्ठान गुरु-मार्गदर्शन में ही करें।

क्या विद्यार्थी भी पढ़ सकते हैं?

हाँ; यह पाठ मानसिक अनुशासन और सकारात्मकता के लिए लाभकारी माना जाता है।

क्या संस्कृत में ही पढ़ना चाहिए?

संस्कृत परंपरागत और श्रेष्ठ है; पर अर्थ समझकर हिंदी में पढ़ना भी स्वीकार्य है।

बगलामुखी कवच और बगलामुखी मंत्र में क्या फर्क है?

कवच सुरक्षा-स्तोत्र है; मंत्र विशिष्ट जप/साधना हेतु। दोनों के उद्देश्य अलग हैं।

पुरश्चरण क्या है?

पुरश्चरण का अर्थ है निर्धारित संख्या में पाठ करना। इस कवच का पुरश्चरण 1100 (एक सौ ग्यारह) पाठ करने से होता है।


निष्कर्ष

माँ बगलामुखी कवच श्रद्धा, आत्मबल और देवी के संरक्षण का शक्तिशाली स्तोत्र है। नियमित, शुद्ध और श्रद्धापूर्वक पाठ करने से इसका प्रभाव हृदय में उतरता है। गहन साधना या तांत्रिक प्रयोग के लिए योग्य गुरु से मार्गदर्शन लें।

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