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संगीत साधना से भी मिल जाते हैं भगवान, पर यह काम नहीं आसान- नारद के संगीत ज्ञान की रोचक कथा

संगीत साधना से भी मिल जाते हैं भगवान, पर यह काम नहीं आसान- नारद के संगीत ज्ञान की रोचक कथा

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iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंकौशिक प्रभु गुण गाकर भिक्षा मांगते थे और बचा समय भगवान के भजन पूजन में ही लगाते. उनके बहुत-से शिष्य थे. भक्त पद्माक्ष उनके और उनके शिष्यों के भोजन का प्रबंध करते थे. शिष्यों के साथ जब वे गाते समां बंध जाता.

कौशिक के शिष्यों में एक पतिपत्नी भी थे मालव और मालवी. मालव भगवान् को दीपकों की माला से सजाता तो उसकी पत्नी मालवी मंदिर की सफाई करती. पति-पत्नी कौशिक का गायन सुनते और आनंदित होते रहते.

कौशिक के दिव्यगान की चर्चा चारों ओर गूंज उठी. हजारों ब्राह्मण उनकी संगीत साधना से जुड़ गये. कौशिक मंदिर छोड़, भिक्षा मांगने के अलावा कहीं नहीं जाते थे. कलिंग के राजा भी कौशिक की भक्ति देखने आया.राजा बड़ा घमंड़ी था. उसने कौशिक से कहा- बहुत अच्छा गा लेते हो. आज से मेरा गुणगान करने वाले गीत गाया करो. गीत इतना सुंदर हो कि नगरवासी भी अपने राजा की महानता के वे गीत गाएं.

कौशिक ने हाथ जोड़कर कहा- महाराज मेरी जीभ और वाणी केवल भगवान के ही गुणों गाती है, और कुछ भी नहीं. अतः आप मुझे क्षमा करे. यहां तक कि कौशिक के चेलों ने भी राजा की प्रशंसा करने से साफ मना कर दिया.

यह सुनते ही राजा क्रोध से जल उठा. राजा दंड दिया कि सबकी जीभ और कान को लोहे की कील से छेदने का दंड़ दिया. सब जानते थे कि राजा ऐसा कर सकता है इसलिए सबने अपनी-अपनी जीभों और कानों में खुद ही कीलें धँसा ली.

इससे राजा का क्रोध और बढ़ गया. उसने कौशिक के पास जो कुछ भी था सब छीन लिया और चेलों समेत राज्य के बाहर भगा दिया. भारी अपमान के बाद संत कौशिक जान बचाकर अपने दल-बल के साथ उत्तराखंड की ओर चले गए.कौशिक और उनके साथियों की जब मृत्यु हुई, तब ब्रह्माजी ने बड़े आदर से उन्हें और उनके साथियों को अपने लोक में बुलाकर सम्मान किया. इतना अधिक सम्मान पहले बार यहां किसी को मिला था सो यह देख ब्रह्मलोक में हलचल मच गई.

इसी बीच विष्णुजी के दूत आ पहुँचे. उन्होंने कौशिक और इनके साथियों को विष्णुलोक पहुंचाया. सम्मान देने के लिए ब्रह्मा और ब्रह्मलोक वाले भी उनके साथ गए. इस तरह विष्णुलोक में बहुत भीड़ हो गई.

भगवान विष्णु ने कौशिक और उनके शिष्यों को अपने समीप बिठाने के बाद कौशिक को अपने गणों का मुखिया बना दिया. मालव और मालवी को विष्णु लोक में गाने को रख लिया तो पद्माक्ष से बोले- तुम कुबेर हो जाओ.’

भगवान विष्णु ने उनके स्वागत में विशाल संगीत सभा बुलायी. सबसे बड़े गायक तुम्बुरू गंधर्व बुलाए गए. संगीत गाती हुई माता लक्ष्मी भी आ विराजी. भगवान सिंहासन पर विराजमान थे. सब उचित स्थान पर बैठ गये.

हमेशा भगवान के करीब रहने वाले देवर्षि नारद को संगीत न जानने के चलते दूर बिठाया गया तो संगीतज्ञ तुम्बुरु को लक्ष्मी और भगवान विष्णु के समीप में. यह बात नारदजी को बहुत खल गई.उनकी समझ में आ गया कि मेरी इतनी तपस्या और वेद, पुराण का अध्ययन, सब कुछ संगीत के सामने बहुत छोटा और महत्वहीन है. वे संगीत के बारे में जानने को उत्सुक हो गए और घोर तप करने लगे.

हज़ारों वर्ष बीतने पर आकाशवाणी हुई- नारद! यदि तुम गाना, बजाना सीखना चाहते हो तो मानसरोवर चले जाओ, वहां गानबंधु नामक उलूक रहते हैं. जाकर उनसे सीख लो.

नारद झट मानसरोवर गान बंधु के पास जा पहुंचे. देवर्षि नारद को संगीत सीखने के लिए आए देख गानबंधु खुश हुए. उन्होंने नारद को एक हज़ार दिव्य वर्ष तक संगीत सिखाया.

संगीत सीख लेने पर देवर्षि नारद ने गानबंधु को गुरुदक्षिणा के तौर पर उनकी आयु एक कल्प की कर दी और अगले कल्प में गरुड़ हो जाने का वरदान दिया. संगीत सीखकर नारद भगवान विष्णु के पास पहुंचे और गाना सुनाया.

विष्णु जी ने कहा- अभी तुम तुम्बुरु के बराबर नहीं हुए पहुंचे. कोई बात नहीं जब मैं कृष्णावतार लूंगा तो तुम्हें उनके बराबर का तो जरूर बनवा दूंगा. कृष्णावतार होने पर नारद भगवान के पास पहुंचे.भगवान ने उन्हें संगीत सीखने के लिए इस बार जाम्बवंती के पास भेज दिया. एक वर्ष तक वहां संगीत की शिक्षा दिलाने के बाद भगवान ने नारद को सत्यभामा के पास ज्ञान लेने के लिए भेजा.

सत्यभामा से एक साल तक संगीत सीखने के बाद भगवान ने उन्हें महारानी रुक्मणी के पास तीन वर्षों तक संगीत सिखवाया. यह सब सीखकर नारद फिर से भगवान विष्णु के पास पहुंचे.

अब भगवान ने खुद उनको कई वर्ष संगीत सिखाने के बाद कहा- अब आप तुम्बुरु से आगे निकल गए है. इस तरह हज़ारों साल में नारद की संगीत-साधना पूरी हुई. स्रोत: लिंग पुराण

संकलनः सीमा श्रीवास्तव
संपादनः राजन प्रकाश

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