संकटमोचन हनुमानः लंका का कौन सा चक्रव्यूह तोड़ने को पक्षी बने हनुमानजी
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जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी. हनुमानजी की यह कथा बहुत लंबी है. इसे कई हिस्से में दिया जाएगा. इस लाइऩ के नीचे फेसबुकपेज का लिंक है. इसे लाइक कर लें ताकि आपको पूरी पोस्ट मिल जाए.लंका में महाबलशाली मेघनाद के साथ लक्ष्मणजी का बड़ा ही भीषण युद्ध चला. अंतत: मेघनाद मारा गया. रावण जो अब तक मद में चूर था अब उसके मन में भी श्रीरामजी की सेना से भय होे लगा.
खास तौर पर लक्ष्मण का पराक्रम सुनकर रावण थोड़े तनाव में आ गया था. रावण बेचैनी में महल में घूम रहा था.
रावण को कुछ दुःखी देखकर रावण की मां कैकसी ने उसके पाताल में बसे दो भाइयों अहिरावण और महिरावण की याद दिलाई.
रावण को याद आया कि यह दोनों तो उसके बचपन के मित्र रहे हैं.
लंका का राजा बनने के बाद उनकी सुध ही नहीं रही थी. रावण यह भली प्रकार जानता था कि अहिरावण व महिरावण तंत्र-मंत्र के महापंडित, जादू टोने के धनी और मां कामाक्षी के परम भक्त हैं.
माता के याद दिलाने पर उसे अहिरावण और महिरावण की याद आई और उसे उनमें विजय की एक आस दिखाई दी. उसने युद्ध में उन दोनों की सहायता लेने का निश्चय किया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.रावण ने दोनों को बुलाने के लिए दूत भेजे. दूतों ने पाताल लोक जाकर दोनों को बताया कि लंकापति रावण को आपके सहायता की आवश्यकता है.
अहिरावण और महिरावण को युद्ध की पूरी सूचना ही न थी. जब उन्होंने कुंभकर्ण और मेघनाद के वध की बात सुनी तो वे बड़े दुखी हुए और विलाप करने लगे.
फिर दूतों से जब पता चला कि विभीषण ने इस कार्य में शत्रु की सहायता की है तो दोनों भाई आग-बबूले हो गए. दोनों की भुजाएं क्रोध से फड़कने लगीं.
दोनों रावण के समक्ष उपस्थित हुए और उससे अपना शोक संदेश व्यक्त किया. रावण भी दोनों भाइयों के समक्ष भावुक हो गया.
उसने दोनों से सहायता मांगी और कहा कि वे अपने छल बल, कौशल से श्रीराम व लक्ष्मण का सफाया कर दे. अहिरावण और महिरावण को इसके लिए तैयार हो गए.
उन्होंने संकल्प लिया कि या तो वे दोनों भाइयों का वध करेंगे अन्यथा अपने प्राण त्याग देंगे.
यह बात दूतों के जरिए विभीषणजी को भी पता लग गयी. युद्ध में अहिरावण व महिरावण जैसे परम मायावी के शामिल होने से विभीषण चिंता में पड़ गए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.विभीषण को लगा कि भगवान श्रीराम और लक्ष्मण की सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी करनी पड़ेगी. उन्होंने श्रीरामजी से कुछ बताने से पहले हनुमानजी को ही सारी चिंता बताई.
वानर सेना में विमर्श हुआ और श्रीराम-लक्ष्मण की सुरक्षा का जिम्मा परमवीर हनुमानजी को राम-लक्ष्मण को सौंप दिया गया.
अहिरावण-महिरावण ने विभीषण के प्रति भी प्रतिशोध का भाव था इसलिए उनकी निगरानी और सुरक्षा की भी विशेष व्यवस्था की गई.
राम-लक्ष्मण की कुटिया लंका में सुवेल पर्वत पर बनी थी. हनुमानजी ने भगवान श्रीराम की कुटिया के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा खींच दिया.
कोई जादूटोना तंत्र-मंत्र का असर या मायावी राक्षस इसके भीतर नहीं घुस सकता था.
अहिरावण और महिरावण श्रीराम और लक्ष्मण को मारने उनकी कुटिया तक पहुंचे पर इस सुरक्षा घेरे के आगे उनकी एक न चली, असफल रहे. ऐसे में उन्होंने एक चाल चली.
महिरावण विभीषण का रूप धर के कुटिया में घुस गया.
राम व लक्ष्मण पत्थर की सपाट शिलाओं पर गहरी नींद सो रहे थे. दोनों राक्षसों ने बिना आहट के शिला समेत दोनो भाइयों को उठा लिया और अपने निवास पाताल की और लेकर चल दिए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.विभीषण लगातार सतर्क थे. उन्हें कुछ देर में ही पता चल गया कि कोई अनहोनी घट चुकी है.
विभीषण को महिरावण पर शक था, उन्हें राम-लक्ष्मण की जान की चिंता सताने लगी.
विभीषण ने हनुमानजी को महिरावण के बारे में बताते हुए कहा कि वे उसका पीछा करें. लंका में अपने रूप में घूमना रामभक्त हनुमान के लिए ठीक न था सो उन्होंने पक्षी का रूप धारण कर लिया और पक्षी का रूप में ही निकुंभला नगर पहुंच गये.
निकुंभला नगरी में पक्षीरूप धरे हनुमान जी ने कबूतर और कबूतरी को आपस में बतियाते सुना.
कबूतर, कबूतरी से कह रहा था कि अब रावण की जीत पक्की है. अहिरावण व महिरावण राम-लक्ष्मण को बलि चढा देंगे. हनुमानजी ने श्रीराम-लक्ष्मण की रक्षा कैसे की यह प्रसंग बहुत लंबा है.
शेष भाग इसे कल प्रकाशित करेंगे. आप प्रभु शरणम् का मोबाइल एप्प डाउनलोड कर लें, वहां आपको पूरी कथा मिल जाएगी. इसे डाउनलोड करना बहुत सरल है. नीचे में इसका लिंक है.
संकलनः सीमा श्रीवास्तव
संपादनः राजन प्रकाश
