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श्रीविष्णु ने निभाया वेदों के पुनः उद्धार का वचन, प्रयागराज को बनाया उत्तम तीर्थः कार्तिक माहात्म्य- चौथा अध्याय

श्रीविष्णु ने निभाया वेदों के पुनः उद्धार का वचन, प्रयागराज को बनाया उत्तम तीर्थः कार्तिक माहात्म्य- चौथा अध्याय

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पिछली कथा से आगे…

भगवान देवताओं को दिया वचन निभाने को कृतसंकल्प थे. इसके लिए भगवान विष्णु ने मछली का रूप धरा. उन्हें पृथ्वी की रक्षा में सहयोग का भार डालने योग्य समर्थवान और दयालु पुरूष की आवश्यकता थी. इसके लिए उन्होंने कश्यप को चुना परंतु कश्यप की परीक्षा भी तो आवश्यक थी.

श्रीविष्णु मछली के रूप में नदी स्नान करते कश्यप की अंजली में समा गए. मछली पर दया करके कश्यप ने उसे अपने कमंडल में रख लिया. मछली का आकार बढ़ने लगा. तो उसे एक कुंए में रखा. कुंआ छोटा पड़ा तो तालाब बनवाया.तालाब भी पलभर में छोटा पड़ने लगा. कश्यप ने समझ लिया कि भगवान की कोई माया है. उन्होंने स्तुति करके इसका रहस्य पूछा. भगवान ने उन्हें आदेश दिया कि तुम सभी ऋषियों को बुलाओ. तुम्हारे लिए एक विशाल नौका आएगी.

समस्त उत्तम औषधियों, अन्न और वृक्षों के बीच लेकर उस नौका में सवार हो जाना. समुद्र में समाए समस्त वेदों को अपने ज्ञान से शीघ्रतापूर्वक रहस्य समेत ढूंढकर निकाल लाओ. तब तक मैं देवताओं के साथ प्रयाग में रुकूंगा.तपोबली मुनियों ने बीज और यज्ञ मंत्रों सहित वेदों का फिर से उद्धार किया. उन ऋषियों में से जिस ऋषि ने अपनी शक्ति से जो भाग निकाला वह भाग उसी ऋषि के नाम से प्रसिद्ध हुआ. सभी मुनि प्रयागराज पहुंचे और प्राप्त वेद को श्रीहरि के सम्मुख ब्रह्माजी को सौंप दिया.

वेदों को पुनः प्राप्तकर ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हो गए. देवों और ऋषियों के साथ उन्होंने अश्वमेध यज्ञ किया. यज्ञ की समाप्ति पर देवताओं ने श्रीविष्णु से विनती की- इसी स्थान पर हमें पुनः प्रसन्नता प्राप्त हुई है, हमें यज्ञ का भोग फिर से मिला है इसलिए आपकी कृपा से यह स्थान श्रेष्ठ और पुण्यदायी हो. यह मास अक्षय फल देने वाला हो.श्रीविष्णु उनकी इस बात से बड़े प्रसन्न हुए. उन्होंने कहा कि मेरी भी कुछ ऐसी अभिलाषा हुई थी. अतः ऐसा ही होगा. यह ब्रह्मक्षेम नाम से सबको सुलभ होगा. राजा भागीरथ तप से गंगा जी को पृथ्वी पर लाएंगे और इसी स्थान पर सूर्यपुत्री यमुना से गंगा का संगम होगा.

जो पुरुष अपने पितृ ईश्वरों का यहां श्राद्ध आदि कर्म करेंगे उनके पितृगण मेरा स्वरूप धारण करेंगे. मकर संक्रांति माघ मास में प्रातःकाल यहां स्नान करने से संपूर्ण पापों का नाश होगा. उनको मैं सालोक्य, सामीप्य और सारूप्य तीनों प्रकार की मुक्ति क्रम से प्रदान करता हूं.

हे मुनिवरों! मैं सर्वज्ञ रूप से बदरी वन में सदैव निवास करता हूं. जो फल और स्थान सौ वर्षों में मिलता है तुमको वहां एक दिन में ही प्राप्त हो जाएगा. इस स्थान के दर्शन करने वाले मनुष्य, जीवन से मुक्त हो जाते हैं.इतनी कथा सुनाकर सूतजी बोले- श्रीविष्णु देवताओं से ऐसा कहकर वहां से अंतर्धान हो गए. इंद्रादि देवता अपने अंशों में वहां रहते हुए अंतर्धान हुए. जो मनुष्य शुद्ध मन से इस कथा को सुनते हैं उन्हें भी प्रयागराज और बदरीवन में जाने का फल प्राप्त होता है.
कथा जारी रहेगी…

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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