शनिपीड़ा से बचाव के तरीके जो शनि प्रदोष पर अचूक सिद्ध होते हैं.
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शनिवार को जो प्रदोष होता है वह शनि प्रदोष कहलाता है. शनिदेव ने शिवजी की कृपा से ही न्याय के देवता का पद प्राप्त किया है. प्रदोष शिवजी की पूजा का दिन है. इसलिए जो भी लोग शनि प्रदोष का व्रत रखते हैं या व्रत न रख पाने पर भी शनि प्रदोष पर विशेष पूजा करते हैं उन पर शनिदेव प्रसन्न होते हैं और उनके कष्टों का निदान करते हैं.
इश पोस्ट में हम आपको शनि प्रदोष व्रत से जुड़ी सारी जानकारियां देंगे. शनि पीड़ा की शांति के लिए प्रदोष को क्या करना चाहिए, प्रदोष व्रत कैसे करना चाहिए, इस व्रत का उद्यापन कैसे करना चाहिए, ज्योतिषशास्त्र में इस व्रत का महत्व, प्रदोष को किए जाने वाले कुछ सरल उपाय जिनसे शनिपीड़ा से शांति मिलती है- उन सबका विवरण विस्तार देंगे. यह पोस्ट आपके लिए संग्रहणीय साबित होने वाली है. अंत तक पढ़ें.
प्रत्येक पक्ष की त्रयोदशी के व्रत को प्रदोष व्रत कहते हैं. सूर्यास्त के पश्चात रात्रि के आने से पूर्व का समय प्रदोष काल कहलाता है. इस व्रत में महादेव भोले शंकर की पूजा की जाती है. आज का प्रदोष शनिवार को होने के कारण शनि प्रदोष कहा जाएगा.
शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए शनि प्रदोष को बहुत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली बताया गया है.
शिवजी ने शनि को उत्तम पद प्रदान किया है. इसलिए आज के दिन प्रदोष काल में शिवजी की पूजा से शनि बड़े प्रसन्न होते हैं.
मेष व सिंह राशि पर अभी शनि की ढैय्या चल रही है. धनु, तुला और वृश्चिक पर शनि की साढ़ेसाती है.
तुला पर साढ़ेसाती का अंतिम ढैय्या है तो वृश्चिक राशि के लिए द्वितीय ढैय्या जबकि धनु राशि पर पहला ढैय्या है. इन पांचों राशि वालों को इस दिन पूजा से शनि पीड़ा से पूरे साल राहत मिलेगी.
जिनकी कुंडली में शनि दोष हो, शनि नीच होकर बैठे हों, शत्रुघर में हों, किसी पापग्रह के साथ बैठे हों, ढैय्या या साढेसाती के प्रभाव में हों, शनि का मारकेश हो तो ऐसे लोगों को शनि के कारण पीड़ा भोगना पड़ता है. उन्हें शनिदेव को प्रसन्न करने के प्रदोष के दिन जरूर उपाय करने चाहिए.
शनि दोष व्यक्ति को निर्धन, आलसी, दुःखी, नशीले पदार्थों का सेवन करने वाला, अल्पायु निराशावादी, जुआरी, कान का रोगी, कब्ज का रोगी, जोड़ों के दर्द से पीड़ित, वहमी, उदासीन, नास्तिक, बेईमान, तिरस्कृत, कपटी, अधार्मिक, व्यापार में हानि सहने वाला तथा मुकदमे व चुनावों में पराजित होने वाला बनाता है.
इस व्रत में व्रती को निर्जल रहकर व्रत रखना होता है. प्रात: काल स्नान करके भगवान शिव की बेल पत्र, गंगाजल, अक्षत, धूप, दीप सहित पूजा करें. संध्या काल में पुन: स्नान करके इसी प्रकार से शिव जी की पूजा करनी चाहिए. इस प्रकार प्रदोष व्रत करने से व्रती को पुण्य मिलता है.
यदि आप व्रत करने में सक्षम नहीं हैं तो शनि प्रदोष व्रत कथा अवश्य पढ़ें और भगवान शिव पर देसी घी का दीपक और शनि देव पर सरसों के तेल का दीपक अर्पित करें.
इससे भी अक्षय पुण्यों की प्राप्ति होती है और भगवान शिव व शनि देव की कृपा भी प्राप्त होती है.शनि प्रदोष व्रत की कथाः
प्राचीन समय की बात है. एक नगर सेठ धन-दौलत और वैभव से सम्पन्न था. वह अत्यन्त दयालु था. उसके यहाँ से कभी कोई भी ख़ाली हाथ नहीं लौटता था. वह सभी को जी भरकर दान-दक्षिणा देता था लेकिन दूसरों को सुखी देखने वाले सेठ और उसकी पत्नी स्वयं काफ़ी दुखी थे.
दुःख का कारण था- उनके सन्तान का न होना. सन्तानहीनता के कारण दोनों घुले जा रहे थे. एक दिन उन्होंने तीर्थयात्रा पर जाने का निश्चय किया और अपने काम-काज सेवकों को सौंप चल पड़े.
अभी वे नगर के बाहर ही निकले थे कि उन्हें एक विशाल वृक्ष के नीचे समाधि लगाए एक तेजस्वी साधु दिखाई पड़े. दोनों ने सोचा कि साधु महाराज से आशीर्वाद लेकर आगे की यात्रा शुरू की जाए.
पति-पत्नी दोनों समाधिलीन साधु के सामने हाथ जोड़कर बैठ गए और उनकी समाधि टूटने की प्रतीक्षा करने लगे.
सुबह से शाम और फिर रात हो गई लेकिन साधु की समाधि नहीं टूटी. मगर सेठ पति-पत्नी धैर्यपूर्वक हाथ जोड़े पूर्ववत बैठे रहे. अंततः अगले दिन प्रातः काल साधु समाधि से उठे.
सेठ पति-पत्नी को देख वह मन्द-मन्द मुस्कराए और आशीर्वाद स्वरूप हाथ उठाकर बोले- ‘मैं तुम्हारे अन्तर्मन की कथा भांप गया हूँ वत्स! मैं तुम्हारे धैर्य और भक्तिभाव से अत्यन्त प्रसन्न हूँ.’
साधु ने सन्तान प्राप्ति के लिए उन्हें शनि प्रदोष व्रत करने की विधि समझाई और शंकर भगवान की निम्न वन्दना बताई.
हे रुद्रदेव शिव नमस्कार। शिव शंकर जगगुरु नमस्कार॥
हे नीलकंठ सुर नमस्कार। शशि मौलि चन्द्र सुख नमस्कार॥
हे उमाकान्त सुधि नमस्कार। उग्रत्व रूप मन नमस्कार॥
ईशान ईश प्रभु नमस्कार। विश्वेश्वर प्रभु शिव नमस्कार॥
तीर्थयात्रा के बाद दोनों वापस घर लौटे और नियमपूर्वक शनि प्रदोष व्रत करने लगे. कालान्तर में सेठ की पत्नी ने एक सुन्दर पुत्र जो जन्म दिया. शनि प्रदोष व्रत के प्रभाव से उनके यहाँ छाया अन्धकार लुप्त हो गया. दोनों आनन्दपूर्वक रहने लगे.
प्रदोष व्रत का उद्यापन कैसे करेंः
इस व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशियों तक रखने के बाद व्रत का उद्यापन करना चाहिए.
– व्रत का उद्यापन त्रयोदशी तिथि पर ही करना चाहिए.
– उद्यापन से एक दिन पूर्व श्री गणेश का पूजन किया जाता है. पूर्व रात्रि में कीर्तन करते हुए जागरण किया जाता है.
– प्रात: जल्दी उठकर मंडप बनाकर, मंडप को वस्त्रों और रंगोली से सजाकर तैयार किया जाता है.
– ‘ऊँ उमा सहित शिवाय नम:’ मंत्र का एक माला यानी 108 बार जाप करते हुए हवन किया जाता है.
– हवन में आहूति के लिए खीर का प्रयोग किया जाता है.
– हवन समाप्त होने के बाद भगवान भोलेनाथ की आरती की जाती है और शान्ति पाठ किया जाता है.
– अंत: में दो ब्रह्माणों को भोजन कराया जाता है और अपने सामर्थ्य अनुसार दान दक्षिणा देकर आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है.
शनि की पीड़ा और शांति के उपाय अगले पेज पर. नीचे पेज नंबर पर क्लिक करें.
सबको पीड़ा नहीं देते शनिः
शनि संतुलन एवं न्याय के ग्रह हैं. अपने पिता सूर्य से अत्यधिक दूरी के कारण प्रकाशहीन हैं इसलिए इन्हें अंधकारमय, विद्याहीन, भावहीन, उत्साहहीन, नीच, निर्दयी, अभावग्रस्त माना जाता है पर शनि ग्रहों के बीच दंडाधिकारी हैं.
विशेष परिस्थितियों में शनि अर्थ, धर्म, कर्म और न्याय का प्रतीक हैं.
इसके अलावा शनि ही सुख-संपत्ति, वैभव और मोक्ष भी देते हैं. इसलिए जब आप शनि के प्रभाव में हों तो आप बुरी आदतों का त्याग कर दें. सोभ, छल, धोखा, बेईमानी से एकदम दूरी बना लें अन्यथा शनि बहुत पीडित करते हैं.
यथासंभव आध्यात्म का मार्ग लें. बेइमानी से बचें. जिस शनि से आप डर रहे हैं वह आपके लिए लाभ के राह खोल देंगे.
शनि पीड़ा की शांति के उपायः
हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, दशरथ कृत शनिस्तोत्र का यथासंभव स्वयं पाठ करना चाहिए.
शनि प्रदोष को यथासंभव शिवजी, हनुमानजी और शनिदेव की प्रार्थना करें.
अपाहिजों, बीमारों की सेवा करनी चाहिए. गरीबों को काला कंबल दान करना चाहिए.
अपने से बड़ों के प्रति आदर का भाव रखना चाहिए. माता-पिता की सेवा करें.
मांस-मदिरा के सेवन से बचें और यथासंभव सत्य ही बोलें.
सरसों के तेल का छाया पात्र में दान. एक बड़े कटोरे में सरसों का तेल लें. उसमें पांच का सिक्का डालकर अपनी छाया देखें. फिर वह तेल किसी को दान कर दें.
चीटिंयों के लिए शनिवार को चीनी मिश्रित आटा खाने के लिए एकांत में रख दें.
शाम को पीपल के पेड़ के नीचे तिल या सरसों के तेल का दीपक जलाएं. पीपल की सात बार परिक्रमा भी करें.
शनि की ढैया से ग्रस्ति व्यक्ति को हनुमान चालीसा का सुबह-शाम यथासंभव पाठ करना चाहिए.
शेष उपाय अगले पेज पर. नीचे पेज नंबर पर क्लिक करें.
शनिवार के दिन एक रोटी में गुड़ घी लगाकर अपने सिर के ऊपर से सात बुरा घुमाकर कुत्ते को खिलाने से लाभ होता है. इसे भैरव प्रयोग कहा जाता है. रोटी घुमाते समय कोई टोके नहीं इसका ध्यान रखें. इसे कम से कम चार शनिवार और अधिकतम 16 शनिवार को करना चाहिए.
शनिवार के दिन किसी चौराहे पर जाकर पांच सिक्कों को मुठ्ठी में बंद करके अपने सिर पर से सात बार घुमाकर वहीं चौराहे पर रख देना चाहिए. यह प्रयोग एक या दो बार करने से भी लाभ होता है.
मंदिर में जाकर दशरथ कृत शनि स्तोत्र का 11 बार एवं एक माला शनि बीज मंत्र का पाठ करें. दशरथ कृत शनि स्तोत्र आपके एप्प के चालीसा सेक्शन में है. बीज मंत्र बहुत सरल है.
मंत्र- ऊं ऐं ह्रीं, श्रीं शनैश्चराय नमः
शनि से भय वे खाएं जो कुटिल हैं, दूसरों से जलते हैं, दूसरों को हानि पहुंचाने या बेईमानी की भावना रखते हैं, कपटी हैं. शनि आपके अंदर ऐसी भावना की प्रेरणा देकर आपकी परीक्षा भी लेते हैं. यदि आप उनकी परीक्षा में फेल हो गए तो फिर परिणाम भोगने ही होंगे. यदि न्याय के मार्ग पर हैं तो शनि आपका कल्याण करते हैं.
प्रस्तुतकर्ताः
डॉ. नीरज त्रिवेदी,
सहायक प्रोफेसर, ज्योतिष, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान
ज्योतिषाचार्य, पीएचडी (ज्योतिष)बनारस हिंदू विश्वविद्यालय
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ऐसी अनगिनत कथाओं का एक संसार है जहां आप धार्मिक-आध्यात्मिक कथाएं, जीवन को बदलने वाली प्रेरक कथाएं, रामायण-गीता, ज्योतिष और सभी प्रमुख मंत्रों को पढ़ सकते हैं उन मंत्रों के क्या लाभ हैं, उसके बारे में जान सकते हैं.
किसी और के कहने पर विश्वास करने से अच्छा एक बार स्वयं आजमाकर देख लिया जाए. इस लाइन के नीचे प्रभु शरणम् एप्प का लिंक है. उसे क्लिक करके एप्प को देखें फिर निर्णय़ करें. ये एक धार्मिक प्रयास है. एक बार तो इसे देखना ही चाहिए.
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