विशालकाय गणपति और वाहन चूहा! क्यों लंबोदर का वाहन चूहा है, गणेश पुराण की सुंदर कथा

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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंविशालकाय शरीर वाले गणेशजी का वाहन चूहा क्यों बना, यह सबके लिए कौतूहल का प्रश्न है. इसको लेकर गणेश पुराण में एक बड़ी विस्तृत कथा आती है. उसे संक्षिप्त रूप में आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हूं.
सुमेरू पर्वत पर सौभरि ऋषि आश्रम बनाकर तप करते थे. उनकी पतिव्रता पत्नी मनोमयी इतनी रूपवती थीं कि उनके रूप पर यक्ष गंधर्व आदि सभी मोहित थे.
मनोमयी के पतिव्रता और सौभरि की पत्नी होने के कारण गंधर्व मनोमयी की ओर देखने का साहस नहीं कर पाते थे लेकिन क्रौंच नाम एक दुष्ट गंधर्व से न रहा गया.
क्रोंच ऋषि पत्नी के हरण का अवसर देखने लगा. एक बार ऋषि लकड़ियां लाने वन गए. कौंच को मनोमयी के हरण का यह उचित समय लगा. वह आश्रम में आया.
कौंच मनोमयी का हाथ पकड़कर खींचकर अपने साथ ले जाने लगा. ऋषि पत्नी उससे दया की भीख मांगने लगी. उसी समय सौभरि ऋषि आ पहुंचे.उन्होंने कौंच को शाप दिया- तूने चोर की तरह मेरी पत्नी का हरण करना चाहा है, तू मूषक बन जा. तुझे धरती के भीतर छुपकर रहना पड़े और चोरी करके अपना पेट भरेगा.
क्रोंच, मुनि के चरणों में गिरकर माफी मांगने लगा- कामदेव के प्रभाव से मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई इसलिए मैंने ऐसा अपराध किया. आप दयालु हैं, मुझे क्षमा कर दें.
बार-बार माफी मांगने से ऋषि पसीज गए. ऋषि ने कहा- मेरा शाप व्यर्थ तो नहीं जा सकता लेकिन इसमें सुधार कर देता हूं. इस शाप के कारण तुम्हें बहुत सम्मान मिलेगा.
ऋषि ने कहा- द्वापर में महर्षि पराशर के यहां गणपति गजमुख पुत्ररूप में प्रकट होंगे तब तुम उनके वाहन बनोगे, जिससे देवगण भी तुम्हारा सम्मान करने लगेंगे.
शापग्रस्त क्रोंच चूहा बन गया. उसका शरीर विशालकाय था. उद्दंडता तो उसमें पहले से ही थी. ताकत के कारण वह रास्ते में आने वाली सारी चीज़ें नष्ट कर देता.एक बार वह महर्षि पराशर के आश्रम में पहुँच गया. वहाँ उसने आदत के अनुसार मिट्टी के सारे पात्र तोड़ दिए, आश्रम की वाटिका उजाड़ डाली. सारे वस्त्रों और ग्रंथों को कुतर दिया.
भगवान गणेश भी उसी आश्रम में थे. महर्षि पराशर ने चूहे की करतूत गणेशजी को बताई. भगवान गणेश ने उस दुष्ट मूषक को सबक सिखाने की सोची.
उन्होंने मूषक को पकड़ने के लिए अपना पाश फेंका. पाश मूषक का पीछा करता हुआ पाताल लोक तक पहुंचा. पाश मूषक के गले में अटक गया और मूषक बेहोश हो गया.
पाश में घिसटता हुआ मूषक गणेशजी के सम्मुख उपस्थित हुआ. जैसे ही होश आया उसने बिना पल गंवाए गणेशजी की आराधना शुरू कर दी और अपने प्राणों की भीख मांगने लगा.
गणेश जी मूषक की आराधना से प्रसन्न हो गए. उन्होंने कहा- तुमने लोगों को बहुत कष्ट दिए है. मैंने दुष्टों के नाश एवं साधुओं के कल्याण के लिए ही अवतार लिया है.
तुम शरणागत हो इसलिए क्षमा करता हूं. मैं तुमसे प्रसन्न हूं कोई वरदान मांग लो. क्रौंच आदत से मजबूर था. गणेशजी से प्राणदान मिलते ही फिर से उसमें अहंकार जाग गया.वह गणेशजी से बोला, मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए, लेकिन यदि आप मुझसे कोई इच्छा रखते हों तो कहें मैं आपकी इच्छा पूरी कर दूंगा.
मूषक की गर्वभरी वाणी सुनकर गणेशजी मुस्कुराए और कहा- यदि तुम्हारा वचन सत्य है तो तुम मेरा वाहन बन जाओ. मूषक ने बिना देरी किए ‘तथास्तु’ कह दिया.
गणेशजी उस पर सवार हुए. गजानन के भार से दबकर उसके प्राण संकट में आ गए. उसने गणेशजी से अपना भार कम करके वहन करने योग्य बनाने की विनती की. इस तरह मूषक का गर्व चूरकर गणेशजी ने उसे अपना वाहन बना लिया.
कहते हैं कि पहले चूहे विशालकाय होते थे और मनुष्य से बहुत द्वेष रखते थे. गणेशजी ने मानवकल्याण के लिए चूहे को अपने आश्रय में लिया और उसकी विध्वंसक शक्ति को कम किया. आज भी घरों में चूहों के उत्पात मचाने पर भगवान गणेश को याद किया जाता है.
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