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लक्ष्मी को कहां स्थान देने से हो जाता है विनाश?

लक्ष्मी को कहां स्थान देने से हो जाता है विनाश?

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इस लाइन के नीचे हमारे फेसबुक पेज का लिंक है उसे क्लिक करके लाइक कर लें.पैसा सिर चढ़कर बोलता है यह आपने लोगों को कहते सुना होगा. जब माया जीव के मस्तिष्क पर अपना प्रभुत्व जमा लेती हैं तो उसका विनाश निश्चित हो जाता है.

मस्तिष्क पर उनका ऐसा कब्जा होता है कि फिर इंसान मतिभ्रमित होकर वह सारे कर्म कर लेता है जो उसे नाश की ओर ले जाते हैं. तभी तो लक्ष्मीजी के साथ गणेशजी की पूजा होती है.

गणेशजी बुद्धि के देवता हैं. धन आने पर बुद्धि का लोप होने की आशंका रहती है इसलिए बुद्धि को साधने के लिए गणेशजी की भी पूजा हो जाती है.

एक कथा सुनाता हूं कि आखिर क्यों कहा जाता है कि लक्ष्मी सिर पर सवार हों तो बुद्धि भ्रष्ट करके विनाश की ओर ले जाती हैं. इसकी एक पौराणिक कथा है.

एक बार असुरराज जम्भासुर ने देवताओं से भयंकर युद्ध छेड़ दिया. असुरों ने देवों को हराकर इन्द्रलोक पर कब्जा कर लिया.

देवगुरु बृहस्पति की सलाह पर देवता भगवान दत्तात्रेय के पास पहुंचे. अपनी विपत्ति सुनाकर उन्होंने मदद मांगी.

भगवान दत्तात्रेय ने इंद्र से कहा कि वह इसकी एक राह सुझाएंगे. थोड़ी कठिन तो है मगर उससे संकटों का निवारण हो सकता है.

इंद्र बोले- भगवन् इस संकट से रक्षा के लिए मैं कोई भी कार्य करने को प्रस्तुत हूं. आप आदेश करें.

दत्तात्रेयजी ने कहा- इंद्र आप इतना करें कि असुरों को युद्ध के लिए ललकारें और उन्हे बहलाकर किसी तरह मेरे आश्रम तक लेकर आइए.

इंद्र ने ऐसा ही किया. अपनी देवसेना लेकर असुरों के पास पहुंचे. युद्ध के लिए असुरों को ललकारा और फिर तुरंत ही युद्धभूमि छोडकर भागने लगे.

इससे असुरों को बड़ा हर्ष हुआ.

देवता उनके भय से भाग रहे हैं, इस प्रमाद में डूबे असुर उनका पीछा करने लगे. वे दत्तात्रेयजी के आश्रम तक आ गए. वहां देवी लक्ष्मी अपूर्व सुंदरी नारी स्वरूप में मौजूद थीं.लक्ष्मीजी का रूप सौंदर्य देखकर असुर युद्ध करना भूल गए और उस नारी पर मोहित हो गए.

उस लक्ष्मीस्वरुपा नारी को असुरों ने सम्मान के साथ पालकी में बिठाया और पालकी को सिर पर उठाकर असुरलोक की ओर चले.

यह देख दत्तात्रेयजी ने इंद्र को आदेश दिया- देवी लक्ष्मी सप्तम स्थान का अतिक्रमण कर दानवों के सिर पर जा बैठी हैं. दानवों का विनाश निश्चित है. यही सबसे उचित समय है असुरों पर आक्रमण करो. जीत निश्चित है.

दत्तात्रेयजी ने बताया- जब लक्ष्मी चरण में हो तो गृहदात्री हैं. अस्थि में हो तो रत्न देती हैं. गुह्य स्थान में हो तो स्त्री, अंक में हो तो पुत्र, ह्रदय में हों तो मनोरथ पूरे करती हैं. कंठ में हो तो भूषण, वाणी में हो तो लावण्य, कवित्व और यश देती हैं.परंतु यदि लक्ष्मी देवी सिर पर आसीन हों तो विनाश करती हैं. असुरों ने स्वयं लक्ष्मी को सिर पर सवार कर रखा है. आप उनसे युद्ध करें. असुरों का विनाश निश्चित है.

देवों ने भगवान दत्तात्रेय द्वारा बताई बात का ध्यान रखकर असुरों पर सहज ही जीत हासिल की. देवों ने भगवान दत्तात्रेय की आराधना की.

भगवान दत्तात्रेय की यह महिमा गर्ग ऋषि ने कार्तवीर्य अर्जुन को सुनाई थी और कहा था कि भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न कर उनके शिष्य बन जाओ फिर तुम्हारे लिए कुछ भी असंभव नहीं.

कार्तवीर्य ने दत्तात्रेयजी को प्रसन्नकर हजार भुजाओं का वर मांगा और सहस्त्रार्जुन या सहस्त्रबाहु के नाम से विख्यात हुआ. उसने रावण को युद्ध में पराजित किया था.
(भृगु संहिता और वायु पुराण की कथा)

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

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