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राधाजी के एक शाप के कारण देवों को प्राप्त होने लगा उनका अंश- दक्षिणा, यज्ञ एवं फल की कथा

राधाजी के एक शाप के कारण देवों को प्राप्त होने लगा उनका अंश- दक्षिणा, यज्ञ एवं फल की कथा

krishna radha
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iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंशास्त्रों में बहुत सी कथाएं भक्ति का रस लेने के लिए कही गई हैं. ईश्वर की परम सत्ता है, उनके आगे तर्क गौण है. भक्ति में तर्क का स्थान न्यून होना चाहिए. ऐसी ही कथा है दक्षिणा की उत्पत्ति की कथा.

भगवान श्री कृष्ण सभी गोपियां से स्नेह रखते थे. परन्तु उनमें से एक सुशीला थी जिससे प्रभु मित्रवत थे. उसके साथ सखा की तरह विचार-विमर्श किया करते थे.

नाम के अनुरूप सुशीला अति सुन्दर, निपुण, श्रेष्ठ गुणों वाली और बुद्धिमान थी इसलिए प्रभु को प्रिय थी. उसने भी स्वयं को श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिया था.

सुशीला की भक्ति और निष्ठा तीनों लोकों में प्रसिद्द थी. चूंकि श्रीकृष्ण भी सुशीला से प्रेम करते थे, इसलिए भगवती राधा के सुशीला के प्रति ईर्ष्या भाव रखती थीं.

एक बार सुशीला भगवान् श्रीकृष्ण के पास बैठकर प्रेम से हंसी-ठिठोली कर रही थी. सहसा वहां राधाजी आ गईं. दैवयोग से उस दिन राधाजी के मन में ईर्ष्या उपजी. सुशीला को श्रीकृष्ण के समीप बैठे देख उन्हें क्रोध आ गया.

राधाजी ने सुशीला को उसी समय गोलोक से निष्कासित होने का शाप दे दिया. शापित सुशीला ने तत्काल प्रभु लोक त्याग दिया और हिमालय पर कठोर तप करने लगीं.

इधर, राधाजी के ईर्ष्यालु व्यवहार से रुष्ट श्रीकृष्ण अदृश्य हो गए. राधाजी श्रीकृष्ण के बिना कैसे रहें. उन्हें पश्चाताप भी हो रहा था. दुखी मन से राधाजी ने पुकारा-भगवन, आप मुझे प्राणों से अधिक प्रिय हैं. आपके बिना मेरी कल्पना ही नहीं. स्वामी, आपने ही तो स्त्रियों के व्यवहार में ईर्ष्या का प्रवेश कराया है. उसी ईर्ष्या भाव से पीड़ित होकर मैंने निरपराध सुशीला को शाप देने का अपराध किया. क्षमा करें प्रभु!

राधाजी श्रीकृष्ण का आह्वान करने लगीं. अंततः श्री कृष्ण प्रकट हुए तो राधा को चैन पड़ा. उधर गोलोक से निष्कासित सुशीला ने हजारों वर्ष तक अन्न-जल त्यागा और एक पैर पर खड़े होकर कठोर तप करने लगी.

सुशीला के कठिन व्रत लेकर भगवान श्रीकृष्ण का चिंतन करते देख देवता भी घबरा गए. तप के कारण सुशीला के शरीर से निकलने वाले तेज ने सूर्य को भी ढक लिया.

सभी देवता भगवान श्रीकृष्ण की शरण में गए और उन्हें सुशीला की घोर आराधना और उससे देवों को हो रही पीड़ा के बारे में बताया.

भगवान ने सुशीला को दर्शन दिया- तुम्हारी भक्ति की शक्ति मुझे यहां खींच लाई. मैं तुम्हारे तपोव्रत से प्रसन्न हूं. तुम्हें जो भी चाहिए वरदानस्वरूप मांग लो.

सुशीला ने प्रभु से कहा- सृष्टि में आपसे बढ़ कर कुछ भी नहीं. यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे अपनी पत्नी बनने का सौभाग्य प्रदान करें.प्रभु ने कहा- अगले जन्म में तुम महालक्ष्मी के अंश से उत्पन्न होकर दक्षिणा नाम से प्रसिद्ध होगी. तब मेरे अंश से उत्पन्न यज्ञ तुम्हारा वरन करेंगे. सुशीला ने शरीर त्याग दिया और ज्योति रूप होकर भगवान श्रीकृष्ण के श्री चरणों में लीन हो गईं.

सृष्टि के आरम्भ में यज्ञ करने पर देवताओ को हविष्य का भाग प्राप्त नहीं होता था. उनकी विनती पर भगवती जगदम्बा ने ने अपने दक्षिणी भाग से देवी दक्षिणा को प्रकट किया.

दक्षिणा का श्रीहरि के अंश यज्ञ के साथ विवाह हुआ. विवाह के बाद दक्षिणा ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम फल रखा गया. यही फल मनुष्यों को यज्ञ-हवनादि का फल प्रदान करता है.

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

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