यज्ञ हवन से ज्यादा भक्तिभाव से रीझते हैं भगवानः श्रीहरि के प्रिय पार्षदों पुण्यशील और सुशील की स्कंद पुराण में वर्णित कथा

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कांचीपुर के राजा चोल च्रकवर्ती सम्राट थे. राजा पुण्यात्मा थे और प्रजा को संतान की तरह मानकर उसके सुख-दुख का ख्याल रखते थे. कांचीपुरम में कोई दुखी-दरिद्र या पापी न था.
चोल राजा श्रीविष्णुजी के परम भक्त थे. एक बार राजा अनन्तशयन तीर्थ में श्रीविष्णु की पूजा-अर्चना करने गए. विधिवत पूजा के बाद दिव्यमणि, सोने के आभूषणों एवं उत्तम फूलों से श्रीहरि का शृंगार किया.
पंच भक्ष्यों का नैवेद्य चढ़ाया और भक्तिभाव से भगवान के सामने साष्टांग दंडवत में लेट गए. तभी विष्णुदास नामक एक दरिद्र विष्णुभक्त मंदिर में पहंचा.
उन्होंने अपने साथ लाए तुलसी के पत्तों व साधारण फूल व फल श्रीहरि को अर्पित किए. विष्णुदास के तुलसीदल और फूलों से राजा ने जो भेंट अर्पित की थी, वह सब ढ़ंक गया.
यह देखकर राजा कुपित हो गए. उन्होंने विष्णुदास से कहा- तुम्हें पूजा का विधान नहीं पता. उस पर तुम दरिद्र भी हो. मैंने भगवान को जो स्वर्ण पुष्प और आभूषण अपर्ति किए उसे तुमने साधारण फूल-पत्तों से ढंक दिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.राजा की बात सुनकर विष्णुदास ने कहा-आप जिसे अपनी भक्ति बता रहे हैं, दरअसल वह राजलक्ष्मी के कारण आपके सिर पर चढ़े अभिमान के अलावा कुछ भी नहीं है.
राजा ने हंसकर कहा- तुम दरिद्र हो. तुम्हारी भक्ति ही कितनी है. वन के फूल पत्ते चढ़ाने को ही भक्ति नहीं कहते. भगवान दान, यज्ञ और मंधिर निर्माण से प्रसन्न होते हैं.
विष्णुदास ने कहा- भगवान ने कब कहा ऐसा? जो संपत्ति आप उन्हें अर्पित कर रहे हैं वह आपकी है कहां. वह तो प्रभु की ही है. उनके लिए राजा और रंक में कोई भेद नहीं.
अब राजा को क्रोध आया. उसने कहा- यदि तुम ऐसा मानते हो तो और तुम्हें भक्ति का गर्व है तो फिर देखते हैं. भगवान किसे पहले दर्शन देते हैं, तुम्हें या मुझे?
राजा राजमहल को लौट गए. थोड़े दिन बाद राजा ने महर्षि मौदगल्य के नेतृत्व में वैष्णव यज्ञ प्रारंभ कराया. महाराज का यश चारों तरफ फैल गया.
दरिद्र विष्णुदास अपने सामर्थ्य के मुताबिक भगवान श्रीहरि के प्रति श्रध्दा-भक्ति के साथ पूजा-अर्चना में लीन रहे. वह मंदिर में ही रहकर भगवान का स्मरण करते रहे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.एक दिन विष्णुदास के घर में एक विचित्र बात हुई. रोज की तरह पूजा-अर्चना समाप्त कर विष्णुदास ने भोजन बनाया. भगवान को भोग लगाना चाहा तो पाया कि वहां रखा सारा भोग गायब था.
वह फिर से रसोई बनाना चाहते थे लेकिन फिर ख्याल आया कि इससे तो संध्या वंदन के लिए समय ही न बचेगा. उस दिन विष्णुदास भूखे ही रह गए.
दूसरे दिन भी वही हुआ. रसोई बनाकर पूजा करने मंदिर पहुंचे. लौटे तो सारा भोजन नदारद था. विष्णुदास की समझ में नहीं आ रहा था कि यह कैसी माया है.
यही क्रम छह दिनों तक चलता रहा. वैष्णव बिना भगवान को कुछ अप्रित किए भोजन करता नहीं. विष्णुदास भोजन चोरी होने के कारण सात दिन भूखे ही रह गए.
उन्होंने भोजन की चोरी का पता लगाने की सोची. रसोई बनाई और एक कोने में छिपकर बैठ गए. थोड़ी देर बाद वहां एक चांडाल आया. उसका शरीर भोजन के अभाव में दुर्बल हो गया था.
वह इतना दुर्बल था कि तन पर हड्डियों का ढांचा ही बचा था. विष्णुदास को उसे देखकर दया आ गई. उन्होंने कहा रूको सूखी रोटी ही क्यों खाते हो थोड़ा घी तो ले लो.
चांडाल ने आवाज सुनी तो भागा लेकिन शरीर दुर्बल होने के कारण गिर गया. विष्णुदास ने उसे उठाकर भोजन दिया और खुद धोती के चोर से हवा करने लगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.विष्णुदास ने ध्यान लगाया और भगवान से प्रार्थना की- हे श्रीहरि! बेचारे इस बूढ़े को स्वस्थ कर दें. इसे अन्न-जल की कोई कमी न हो, ऐसा वरदान दीजिए.
अपनी प्रार्थना खत्मकर विष्णुदास ने आंखें खोलीं तो उनके समक्ष शंख, चक्र, गदा व खड्गधारी साक्षात श्रीहरि खड़े मुस्कुरा रहे थे. विष्णुदास मुग्ध होकर प्रभु के अनंत दिव्य रूप निहारता रह गए.
उन्होंने परमात्मा की स्तुति की. भगलान प्रसन्न होकर उन्हें दिव्य विमान में चढ़ाकर अपने साथ ले चले. चोल राजा को जब यह समाचार मिला तब उनमें ज्ञानोदय हुआ.
राजा ने अपना राज्य अपने भांजे को दिया और यज्ञकुंड के सामने खड़े होकर कहा- प्रभु आप मुझे मन, वाणी, शरीर और क्रिया द्वारा मिलने वाली दृढ़ भक्ति दीजिएए. यह कहकर वह अग्नि कुंड में कूद पड़े.
भगवान श्रीहरि अग्निकुंड में प्रकट हुए. उन्होंने राजा चोल को भी अपने साथ विमान पर बिठाया और साथ लेकर बैकुंठ धाम के लिए प्रस्थान कर गए.
विष्णुदार पुण्यशील और चोल सुशील नामक श्रीहरि के प्रिय पार्षद हुए. भगवान दोनों को अपने जैसे रूप देकर द्वारपाल बना लिया.
भगवान भक्तों की भक्ति पर सदैव रीझते रहे हैं. चाहे निषादराज, शबरी या जंगल में विचरने वाले रीछ, वानर हों अथवा गोपियों का माखन चुराने वाले बालगोपाल ग्वाले.
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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