यज्ञ की सच्ची आहुति क्या है.
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जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी।राजपाट संभालने के बाद एक बार युधिष्ठिर ने विधि-विधान से महायज्ञ का आयोजन किया। उस यज्ञ में दूर-दूर से राजा-महाराजा और विद्वान ऋषि-मुनिजन आए।
यज्ञ पूरा होने के बाद देवताओं को पूरे विधान से दूध और घी से आहुति दी गई। सभी को प्रतीक्षा थी देवताओं द्वारा आकाश से बजाई जाने वाली आकाश-घंटियों की ध्वनि की।
यज्ञ की आहुति पूरी होने के बाद भी आकाश घंटियां सुनाई नहीं पड़ी। जब तक आकाश घंटियां नहीं बजतीं, यज्ञ अपूर्ण माना जाता है। महाराज युधिष्ठिर को बड़ी चिंता हुई।
वह सोचने लगे कि आखिर यज्ञ में कौन सी कमी रह गई कि आकाश घंटियां सुनाई नहीं पड़ीं। उन्होंने भगवान कृष्ण से अपनी समस्या बताई।
श्रीकृष्ण ने कहा- महाराज ऐसा लगता है कि इस यज्ञ में संभवतः कोई आत्मा तृप्त नहीं हुई इसीलिए देवों ने आपके लिए आकाश घंटियों से स्वर नहीं किया।
यह सुनकर युधिष्ठिर की चिंता और बढ़ गई। मेरे आयोजन में ऐसी कमी भी रह गई कि यहां कोई अतृप्त ही रह गया! यह तो सचमुच बड़ा अपराध है।हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.श्रीकृष्ण उनकी चिंता भांप गए। उन्होंने कहा कि आप चक्रवर्ती सम्राट हैं। आपको यह सोचने की आवश्यकता नहीं कि आपके यज्ञ में पधारा कोई व्यक्ति अतृप्त रह गया। आप एक राजा की दृष्टि से इसे देखने का प्रयास करें तो निदान निकलेगा।
भगवान की बात सुनकर युधिष्ठिर की उलझन और बढ़ गई। उन्होंने पूछाः भगवन क्या मैं राजा के रूप में अपने कर्मों का पूरा निर्वाह नहीं कर रहा हूं? यह तो और बड़ा अन्याय है।
भगवान मुस्कुराए। आप श्रेष्ठ राजा हैं, धर्मराज हैं। धर्म आपके संरक्षण में सबसे ज्यादा समर्थवान है। मैं आपको जो समझाने का प्रयास कर रहा हूं, उसे देखें।
आप किसी गरीब, सच्चे और निश्छल हृदय वाले व्यक्ति को बुलाकर उसे अपने हाथों से भोजन कराएं। जब उसकी आत्मा तृप्त होगी तो आकाश घंटियां अपने आप बज उठेंगी।’
यधिष्ठिर बोले- प्रभु आप ही ऐसे किसी व्यक्ति का पता बताएं। मैं उन्हेंं तृप्त करने का पूरा प्रयास करूंगा। श्रीकृष्ण ने ऐसे एक व्यक्ति का पता दिया।
धर्मराज युधिष्ठिर स्वयं उसकी खोज में निकले। आखिरकार उन्हें उस निर्धन की कुटिया मिल गई। युधिष्ठिर ने अपना परिचय देते हुए उससे प्रार्थना की, ‘बाबा, आप हमारे यहां भोजन करने की कृपा करें।’
पहले तो उसने मना कर दिया लेकिन काफी प्रार्थना करने पर वह तैयार हो गया। युधिष्ठिर उसे लेकर यज्ञ स्थल पर आए।हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
द्रौपदी ने अपने हाथ से स्वादिष्ट भोजन बनाकर उसे खिलाया। पांचों भाई उसकी सेवा में लगे रहे। उस व्यक्ति के चेहरे पर संतोष के भाव तो दिख रहे थे।
भोजन करने के बाद उस व्यक्ति ने ज्यों ही संतुष्ट होकर डकार ली, आकाश की घंटियां गूंज उठीं। यज्ञ की सफलता से सब प्रसन्न हुए।
युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा- ‘भगवन, इस यज्ञ में संसार भर से श्रेष्ठ ज्ञानीजन पधारे। उन्होंने भोजन किया और प्रसन्न हुए पर यज्ञ सफल न हुआ। इस निर्धन व्यक्ति में ऐसी कौन सी विशेषता है कि उसके खाने के बाद ही यज्ञ सफल हो सका।’
क्या आपका विशेष कृपापात्र है या कोई और बात है, यह जानने की बड़ी उत्सुकता है।
श्रीकृष्ण ने कहा, ‘धर्मराज, इस व्यक्ति में ऐसी कोई विशेषता नहीं है। मुझे सभी सज्जन प्रिय हैं। यह विशेष रूप से इसलिए प्रिय है क्योंकि यह निर्धन है किंतु उपलब्ध साधनों में भी पूरी तरह धर्मनिष्ठ है। संतोषी पुरुष है।
दरअसल आपने पहले जिन्हें भोजन कराया वे सब तृप्त थे। जो व्यक्ति पहले से तृप्त हैं, उन्हें भोजन कराना कोई विशेष उपलब्धि नहीं है।
जो लोग अतृप्त हैं, जिन्हें सचमुच भोजन की जरूरत है, उन्हें खिलाने से उनकी आत्मा को जो संतोष मिलता है, वही सबसे बड़ा यज्ञ है। वही सच्ची आहुति है। आप ने जब एक अतृप्त व्यक्ति को भोजन कराया तभी देवता प्रसन्न हुए और सफलता की सूचक घंटियां बज गईं।
संसार में जो दीन-हीन, निर्धन, बीमार और संकट में फंसे व्यक्ति की सहायता को आगे आता है वह व्यक्ति मुझे वशेष रूप से प्रिय हो जाता है। मेरे इस अवतार का अर्थ ही यही है।हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
भगवान बोले- जहां भी कोई मेरी सहायता के लिए सच्चे मन से पुकारता है मैं वहां किसी न किसी रूप में अवश्य आता हूं। कोई बड़ा निमित्त बनाता हूं। वह व्यक्ति मेरा भक्त है, आपकी प्रजा है। यहां असंख्य लोग भोजन ग्रहण कर रहे थे। आवश्यकता से अधिक खा रहे थे, दान ले रहे थे किंतु वह भूखा था।
मैं संतुष्ट कैसे होता! उस व्यक्ति को भोजन कराकर आपने मुझे भोग लगाया है। इसी कारण आकाश घंटियां बज उठीं।
छोटी सी कथा है पर इसे बहुत ध्यान से समझने की जरूरत है। हम सैंकड़ों हजारों रूपए उनकी प्रसन्नता के लिए सहर्ष खर्च देते हैं जो पहले से खाए-अघाए हैं। जिन्हें उसकी आवश्यकता ही नहीं। वह उसे खाकर भी मीनमेख निकाल देते हैं।
वहीं सामने ऐसे लोग उनके फेंके हुए को लपककर भेट भरने की आस लगाए देखते रहते हैं। भगवान को तो प्रसन्नता तब होती है जब आप उसकी सेवा कर रहे होते हैं जो अपने कर्मों का दंड भोग रहा होता है।
ईश्वर किसी को दंडित नहीं करना चाहते। जो दंड भोग रहा होता है उसकी आत्मा के साथ ईश्वर भी दुखी रहते हैं लेकिन एक व्यवस्था बनी है जिसे वह खंडित नहीं कर सकते।
ऐसे में उन्हें तब बड़ी प्रसन्नता होती है जब हम ईश्वर के स्थान पर उस परेशानहाल की सहायता करते हैं। सच पूछें तो यही सच्ची पूजा, सच्चा यज्ञ, पूर्ण व्रत है।
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