महिषासुर ने मां जगदम्बे को सुनायी मंदोदरी की कहानी: नवरात्रि कथा – 2
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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंमहिषासुर बड़ा मायावी था. उसने मोटे,काले और बड़ी बड़ी सींग वाले कुरूप भैंसे का शरीर त्याग कर एक सुंदर सजीले पुरुष का रूप धर लिया. दिव्य वस्त्रों, तरह तरह के गहनों से सज़ा, वह दूसरा कामदेव लग रहा था. हाथ में धनुष बाण ले रथ पर सवार वह मां जगदंबा के सामने पहुंच गया.
महिषासुर दुर्गा जी से बोला, सुंदरी! सारे देवता मुझसे हार चुके हैं. अब तीनों लोक मेरे हैं. तुम मेरी पटरानी बन जाओ. कहोगी तो देवताओं से बैर छोड़ दूंगा. समूचे ब्रह्मांड का सुख तुम्हारे कदमों में होगा. यह संयोग बड़ी मुश्किल से मिला है इसका लाभ उठाओ.
वह कहता रहा, मधुर वचन बोलने वाली देवि तुम्हारे रूप ने मेरे मन को मोह लिया है. मैं काम देव के बाणों से घायल हूं. मुझ पर दया करो. मुझे जीवन भर के लिये तुम्हारी चाकरी मंजूर है. मैं सारे हथियार तुम्हारे चरणों में रख कर यह वचन देता हूं कि सारी जिंदगी तुम्हारा नौकर बन कर रहूंगा. बस मेरी बन जाओ.महिषासुर इसी तरह देवी के रूप की तारीफ करता हुआ अनाप शनाप बकता रहा तब देवी ने कहा, परम पुरुष परमात्मा के अलावा मैं किसी पुरुष के बारे में नहीं सोचती. तू स्त्री सुख के लिये इतना बेचैन क्यों है. मूर्ख, स्त्री का संग करने में महान कष्ट उठाना पड़ता है, लोहे की जंज़ीर से आज़ाद हो सकता है स्त्री बंधन से नहीं. क्या इतना भी नहीं जानता.
मां जगदंबा ने आगे कहा, सुखी होना चाहता है तो स्त्री सुख नहीं मन की शांति पाने का प्रयास कर. मेरे हाथों तेरा वध होगा यह तय है पर तेरी बातों ने मुझे खुश कर दिया है. इसलिये तुझे एक जीवन दान देते हुये कहती हूं कि चाहे तो देवताओं से बैर छोड़ कर पाताल भाग जा और वहां सुख से रह.
महिषासुर बोला, तुम कोमलअंगों वाली नारी हो, इतनी सुंदर स्त्री को मार देना मुझे शोभा नहीं देगा. मैं तो आज तुम्हें घर ले चलने के विचार से आया हूं, जबरन ले जाना नहीं चाहता. तुम अपने लिये बने सबसे बेहतरीन वर को ठुकरा रही हो. ऐसा न हो कि बाद में तुम्हें मंदोदरी की तरह पछताना पड़े जिसने योग्य वर नहीं स्वीकारे और बाद किसी मूर्ख की पत्नी बन दुःख झेलना पड़ा.
महिषासुर की इस बात पर मां अंबे ने कहा, यह मंदोदरी कौन थी जिसे राजा ने त्याग दिया और वह किस धूर्त नरेश से फिर ब्याही गयी तथा उसको कौन से दुःख झेलने पड़े, इस कथा का यहां क्या मतलब है, बताओ. देवी दुर्गा के यह कहने पर महिषासुर ने माता को राजकुमारी मंदोदरी की कहानी इस प्रकार सुनायी.सिंहल नाम के देश का राजा था चंद्रसेन, वह बड़ा धर्मात्मा, शूरवीर और प्रजापालक था. चंद्रसेन की पत्नी गुणवती ने एक बेटी को जन्म दिया जिसका नाम रखा गया मंदोदरी.
मंदोदरी जब विवाह के लायक हुई तो राजा चंद्रसेन ने उसके लिये वर ढूंढना शुरू किया. बहुत तलाशने के बाद मद्र देश के राजा सुधन्वा का बेटा उनको मंदोदरी के लिये सबसे उत्तम लगा. पत्नी गुणवती भी सुधन्वा के बेटे कम्बुग्रीव से मंदोदरी का विवाह करने पर राजी थी.
पर मंदोदरी सहमत न थी. उसने कह दिया कि वह कतई शादी नहीं करेगी. शादी एक गुलामी है और वह जिंदगी भर स्वतंत्र रहना चाहती है. बेटी की बात सुनकर रानी ने चंद्रसेन को साफ बता दिया कि मंदोदरी को विवाह में कोई रुचि नहीं उसने तो जीवन भर के लिये कुमारीव्रत ले लिया है.
यह सुनकर राजा ने मंदोदरी के विवाह के प्रयत्न छोड़ दिये. कुछ बरस बीत गये तो एक बार सखियों के साथ वनविहार करते हुये उसका सामना कोसल नरेश वीरसेन ने उसे देखा, वीरसेन उसकी सुंदरता देखते ही उस पर मुग्ध हो गया और उसकी सखी सैर्न्ध्री से बोला, मैं राजकुमारी को चाहता हूं और अभी तक कुंवारा हूं. उससे शादी करना चाहता हूं.
सैरंध्री ने वीरसेन का प्रस्ताव राजा चंद्रसेन से कहा तो उन्होंनेइस के लिये उसे मंदोदरी को मनाने को कहा. पर मंदोदरी का दो टूक जवाब था कि वह किसी से भे कभी विवाह न करेगी. वीरसेन बेशर्मों की तरह क्यों मुझ पर आंखें गड़ाये है. सैरंध्री ने वीरसेन को मना कर दिया.
मंदोदरी की एक छोटी बहन थी इंदुमती, वह विवाह के लायक हो चली थी. राजा ने उसके लिये स्वयंवर आयोजित किया. इंदुमती ने एक सुंदर और बलशाली राजकुमार के गले वरमाला डाल दी तो यह देख मंदोदरी के मन में भी कामभाव जागा. उसकी भी नजर में एक सजीला राजकुमार जंच गया. चंद्रसेन को अपने दिल की बात मंदोदरी ने बता दी.राजा ने मुस्करा कर मंदोदरी की बात सुनी और भारी दान दहेज के साथ उस राजकुमार के साथ मंदोदरी को ब्याह कर विदा कर दिया. सुंदरी मंदोदरी के साथ उस नरेश ने खूब आनंद किया. पर उसका चरित्र ठीक न था. एक दिन मंदोदरी ने अपने पति को किसी के साथ दुराचार करते हुये अपनी आंखों से देख लिया.
मंदोदरी ने सोचा मुझसे कामवश भूल हो गयी. मोह में मैंने कितना बड़ा अनर्थ कर ड़ाला. इस धूर्त ने मुझे ठग लिया. अब क्या करूं इस ताकतवर नरेश का मैं क्या बिगाड़ सकती हूं. रानी हूं, कहीं भाग भी नहीं सकती. पिता के पास लौटूं तो सहेलियों में मजाक बनेगा. आत्महत्या करना कठिन है. मन मसोस कर सारे दुःख झेलते हुए अच्छे दिनों के इंतज़ार में यहीं दिन काटने पड़ेंगे.
महिषासुर कहता रहा, तो इस तरह मंदोदरी का हर क्षण नरक हो गया. इसलिये हे सुंदरी तुम भी अपने लिये सबसे उत्तम इस वर को अपमानित कर ठुकराने और फिर कामातुर हो किसी और को अपनाने जैसी गलती मत करो कि मंदोदरी की तरह पीछे पछताना पड़े. तुम मेरी बात मान लो और अब मेरी हो जाओ.
अब मां जगदंबा ने कहा, मूर्ख, मैं अरूपा और अजन्मा हूं. जब जब देवताओं की रक्षा करनी होती है उनकी प्रार्थना पर मैं रूप धारण करती हूं. मेरी बात ध्यान से सुन, तुझे मारने के लिये ही मैं प्रकट हुई हूं. अब अगले ही क्षण या तो तू पाताल भाग जा या फिर युद्ध के लिये तैयार हो जा….. और महिषासुर ने अपना धनुष उठा लिया.
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