गोपाष्टमी से शुरूआत तो धन की बरसात: महालक्ष्मी ने स्वयं बताई है प्रसन्न करने की सबसे आसान विधि

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आपने सुना होगा पूजा-अनुष्ठान में गोबर से लक्ष्मी और गणेशजी की स्थापना करते हैं और फिर उनकी पूजा करते हैं. कभी सोचा कि आखिर गोबर में गणेशजी और लक्ष्मीजी की स्थापना कैसे की जाती है. क्यों मां लक्ष्मी का वास गोबर में माना गया है.
इसके पीछे है एक कथा. गुरूवार को है गोपाष्टमी. गोधन और गोवत्स यानी बछड़े की पूजा का विशेष दिन. कल साधारण सी एक पूजा करके आप कर सकते हैं एक साथ सभी देवताओं को प्रसन्न. पहले पढ़ें महालक्ष्मी के गोबर में वास की कथा और फिर कैसे करें गोपाष्टमी पूजन.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.समुद्र मंथन में अद्भुत शक्तियों वाली पांच प्रकार की गाएं निकलीं- नंदा, सुभद्रा, सुरभि, सुशीला और बहुला. इन गायों को कामधेनु कहा गया. मंथन से निकले विष को महादेव ने पीकर देवों और असुरों दोनों को संकट से बचाया था.
इसलिए महादेव को प्रसन्न करने के लिए देवों और असुरों ने सहमति से शिवजी को कामधेनु गायों का अधिकार सौंपा जिसे महादेव ने ऋषियों को दान कर दी.
महर्षि जमदग्नि को नंदा, भरद्वाज को सुभद्रा, वशिष्ठ को सुरभि, असित को सुशीला और गौतम ऋषि को बहुला गाय मिलीं. इन ऋषियों ने अपने आश्रम में गायों का चमत्कार देखा तो विस्मित रह गए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि ने तो नंदा को अपनी माता का दर्जा दिया. देवों को विस्मय हुआ. उन्होंने ऋषि से कहा कि अगर यह आपकी माता हैं तो समस्त देवों को अपने गोद में स्थान देकर दिखाएं.
नंदा ने अपने पूरे शरीर में सभी देवों को समाहित कर लिया. देवताओं ने तत्क्षण उन्हें अपनी माता मान लिया. उनके शरीर में स्थान मांगा और गुणगान करने लगे.
लक्ष्मीजी तक बात पहुंची औऱ उन्होंने भी नंदा से अपने लायक स्थान मांगा. नंदा ने कहा- एक ऐसा कोई स्थान नहीं बचा जहां हे भगवती मैं आपको प्रतिष्ठित कर सकूं.
सभी देवों ने कोई न कोई स्थान ग्रहण कर लिया है. अब मात्र गोबर ही शेष है किंतु आपको मैं वहाँ कैसे स्थान दूं?हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.लक्ष्मीजी उनकी सरलता पर खुश हो गईं. उन्होंने गोबर को ही अपना अंश स्वीकार किया. इसीलिए पूजा में सबसे पहले गोबर-गणेश की पूजा होती है. गोबर को ऐश्वर्यदायक माना जाता है.
कैसे मनाएं गोपाष्टमी पर्व:
इस दिन प्रातः काल उठकर नित्यकर्म से निवृत होकर स्नान आदि करें.
प्रातः काल में ही गायों को भी स्नान आदि कराकर गौ माता के अंग में मेहंदी, हल्दी, रंग के छापे आदि लगाकर सजाया जाता है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इस दिन बछडे़ सहित गाय की पूजा करने का विधान है.
प्रातःकाल में ही धूप-दीप अक्षत, रोली, गुड़, आदि वस्त्र तथा जल से गाय का पूजन किया जाता है और आरती उतारी जाती है.
इस दिन कई व्यक्ति ग्वालों को उपहार आदि देकर उनका भी पूजन करते हैं.
गायों को खूब सजाया जाता है. इसके बाद गाय को चारा आदि डालकर परिक्रमा करते हैं. परिक्रमा करने के बाद कुछ दूर तक गायों के साथ चलते हैं.
ऐसी आस्था है कि गोपाष्टमी के दिन गाय के नीचे से निकलने वालों को बड़ा पुण्य मिलता है.
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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