भय भी जरूरी है, लेकिन किससे? मृत्यु के भय से भयभीत राजा को संन्यासी ने दिया ज्ञानः एक प्रेरक कथा

भय भी जरूरी है, लेकिन किससे?  मृत्यु के भय से भयभीत राजा को संन्यासी ने दिया ज्ञानः एक प्रेरक कथा

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एक राजा को मृत्यु का बड़ा भय रहता था. उसे यही डर होता कि किसी दिन कोई शत्रु उस पर हमला करेगा और उसकी जान ले लेगा. उसका बस एक ही काम रह गया था, अपनी सुरक्षा के उपायों के बारे में सोचना.

उसने एक ऐसा मजबूत महल बनवाया जाए जिसमें सुरक्षा के बेहतरीन प्रबंध थे. आने-जाने का रास्ता सिर्फ एक था जिस पर भरोसेमंद प्रहरी तैनात थे ताकि शत्रु कुछ बिगाड़ न पाए.महल में रोशनदान खिड़कियां भी इस भय में नहीं बनवाई कि कहीं शत्रु सांप आदि भेजकर उसे न मार डालें. परिजनों को शस्त्र से लैस करके मुख्य द्वार के सुरक्षा की जिम्मेदारी भी खुद ही रखी.

राजा को भरोसा हो गया कि शत्रु उसको मार नहीं सकते. वह दरबार भी कम ही जाता. ज्यादा समय सुरक्षित महल में बिताता. राजकाज मंत्रियों के हवाले हो गया और लूट-खसोट मच गई.एक संन्यासी दरबार में आए. वह राज्य की स्थिति बताना चाहते थे लेकिन राजा को तो दरबार में डर लगता था. वह उन्हें किसी बहाने महल में ले आया और पूरा महल दिखाया.

महल दिखाकर राजा ने पूछा- महल कैसे लगा? संन्यासी ने कहा- सुंदर है, सुख के सारे प्रबंध हैं पर एक भूल हो गई. इसमें दरवाजा नहीं होना चाहिए था. दरवाजे से दुश्मन तो नहीं आएंगे लेकिन मौत आ गई तो!इस दरवाजे को भी अच्छे से बंद करके बैठ जाइए तभी पूरी तरह सुरक्षित होंगे. राजा उस तंज का अर्थ समझ गया. उसने क्षमा मांगी.

संन्यासी ने कहा- वही राजा सुरक्षित है जिसके लिए प्रजा प्राण त्यागने में संकोच न करे. मृत्यु का प्रवेश दरवाजे-खिड़कियों से नहीं रोका जा सकता. मृत्यु का प्रवेश रोका जा सकता है मन से मृत्यु का भय मिटाकर.

राजा ने संन्यासी को वचन दिया कि वह प्रजा के कष्ट को समझकर अपनी भूल सुधारेगा. उस महल को कारागार बना दिया गया.कितना सुंदर निर्णय था. जिसे राजा प्राण बचाने के योग्य समझ रहा था वास्तव में वह कारागार ही तो था. भय का भाव बलशाली प्राणी से भी उसकी बुद्धि और बल छीन लेता है फिर यहीं से खुलते हैं असफलता के रास्ते.

भय आवश्यक है- कुसंगति, व्यसन, अनाचार, दूसरों के प्रति हिंसा के भाव और उसके परिणाम से. बाकी सब तो प्रभु पर छोड़ दें.

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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