बेशक ज्ञान होना ज़रूरी है पर ज्ञान होने से भी ज़्यादा ज़रूरी है ये बात
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बुद्ध ने एक नगर में डेरा डाला. उनके शिष्यों ने एक स्त्री के कर्कश स्वभाव की चर्चा की और कहा जब भी वे उसके घर के आगे से गुजरते हैं, वह किसी न किसी पर चिल्ला रही होती है. अपमान के भय से वे उसके घर भिक्षा मांगने नहीं गए.
बुद्ध ने स्वयं उस घर से भिक्षा मांगने का निर्णय़ किया. अगले दिन पहुंचे और भिक्षा मांगी. स्वभाव के अनुकूल वह नौकरों पर किसी वजह से बरस रही थी. बुद्ध पुकारते रहे. इससे वह चिढ़ गई और बोली- थोड़ी प्रतीक्षा नहीं कर सकते? प्राण निकल रहे हैं!भिक्षा लेकर आई तो देखा स्वयं बुद्ध हैं. उसे बड़ी ग्लानि हुई और क्षमा मांगी. स्त्री ने बुद्ध से कहा- भगवन मुझे कुछ उपदेश करिए. मैं जीवन से बहुत दुखी हूं. बुद्ध ने कहा कल भिक्षा लेने आउंगा तो उपदेश दूंगा.
स्त्री ने पूरी, पुए, खीर हल्वा और न जाने क्या-क्या बनाया. बुद्ध आए. स्त्री ने कहा- प्रभु मैंने उत्तम भोजन बनाया है. आप इसे ग्रहण करने के बाद मुझे उपदेश दीजिए. बुद्ध ने भिक्षापात्र आगे बढ़ा दिया.यह क्या पात्र में तो पहले से थोड़ा गोबर रखा था. स्त्री बोली- भगवन इसमें तो गोबर है. मेवे वाली खीर तो खराब हो जाएगी. लाइए पहले यह पात्र धो दूं. बुद्ध ने कहा- कोई बात नहीं इसमें ही डाल दो. मैं खा लूंगा.स्त्री को क्रोध आने लगा. उसके मन में तरह-तरह के प्रश्न आने लगे, कि बुद्ध सचमुच ज्ञानी हैं या ज्ञान की अफवाह फैला रखी है. उसने खीर नहीं डाली. बुद्ध समझ गए.
वह बोले- जिस तरह तुमने गोबर वाले पात्र में खीर डालना अनुचित समझा उसी तरह ज्ञान प्राप्त करने के लिए मन का मैल निकलना जरूरी है, अन्यथा मैल के बीच रहकर ज्ञान स्वयं दुर्गंध फैलाने लगेगा. मेरा यही उपदेश है.ज्ञानियों की कमी नहीं है. कमी है तो उस ज्ञान के सही इस्तेमाल करने वालों और उस पर अमल करने वालों की. रावण ज्ञान में श्रीराम से आगे था लेकिन अभिमान, क्रोध और चरित्रहीनता ने उसके ज्ञान को ढंक लिया और मारा गया.
कुपात्र के पास ज्ञान कल्याणकारी होने के स्थान पर अनिष्टकारी हो जाता है.
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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