बच्चे का मन पढ़ाई में नहीं लगता? एक उपाय है, शायद काम आ जाए.
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पढ़ाई तो बेहद जरूरी है और अगर बच्चा पढ़ ही न रहा हो तो चिंता की बात तो है. आज मैं आपको कुछ प्रयोग बताता हूं जो सफल रहा है. बच्चों में पढ़ाई के प्रति रूचि जागी है.
इसे कई लोगों ने आजमाया और लाभ हुआ. मैंने खुद देखा है लाभ होते. तो आज मैं चर्चा करुंगा पढ़ाई में रूचि जगाने पर, आपके अंदर एक जरूरी बदलाव पर और एक पौराणिक कथा भी सुनाऊंगा.
भरद्वाज मुनि के बेटे की कथा आपके लिए अपने बच्चो को पढाई के लिए प्रेरित करने में उपयोगी साबित होगी क्योंकि उनका पुत्र यवक्रीत भी पढ़ने-लिखने से भागता था. स्वयं इंद्र ने एक ऐसा प्रयास किया जो आपको प्रेरित करेगा. आप जरूर पढ़ें.
शुरुआत करते हैं बच्चे में पढ़ाई के प्रति रूचि जगाने के प्रयास से-
बच्चा यदि पढ़ने को तैयार नहीं, आप सारे प्रयास करके हार गए तो एक प्रयास यह भी करिए. उसके सामने खाली मत दिखिए. आप स्वयं उसके सामने पढ़ना शुरू कर दीजिए.
उसे उत्सुकता होगी कि आप क्या पढ़ रहे हैं, क्यों पढ़ रहे हैं. इस उम्र में पढ़ने से क्या फायदा. इस तरह के बहुत से सवाल भी पूछेगा. आपको पूरी तैयारी रखनी है.
कोई पत्रिका या न पढ़ें जिसे देखकर वह अंदाजा लगाए कि आप आपना समय बिताने के लिए पढ़ रहे हैं या पढ़ रही है. आपको गंभीरता दिखानी है. इसलिए संभव हो तो कोई साहित्यिक पुस्तक पढना शुरू कर दें.
बच्चे को प्रयत्नपूर्वक य़ह आभास दिलाइए कि आप जब उसकी उम्र के थे तो किसी कारणवश बहुत सी चीजें नहीं पढ़ पाए इसलिए अपने दोस्तों के मुकाबले आप पिछड़ गए.
इसलिए बचपन की गलती को सुधार रहा/रही हूं. मुझे बहुत पढ़ना है. सबके बराबर पहुंचना है. आपकी भावभंगिमा स्वाभाविक होनी चाहिए जिससे बच्चा प्रभावित हो.
आपकी देखा-देखी आपके बच्चे को भी लगेगा कि उसे भी पढना है. इतने बड़े होने पर जब मेरे माता-पिता पढ़ रहे हैं तो मैं क्यों नहीं?
मेरे माता-पिता जिस कारण आज पछता रहे हैं, मुझे नहीं पछताना क्योंकि एक न एक दिन आखिर पढना ही पढ़ेगा तो क्यों न आज ही पढ़ लें.
मुझे ये टाइम खराब नहीं करना है. मुझे नहीं पछताना है. इस तरह कुछ दिनों में बच्चे के मन में भाव आने लगेगा और उसका मन अध्ययन में रमेगा.
इसके दोहरे लाभ हैं. धीरे-धीरे आप भी कुछ आदतें सुधार लेंगे. व्यर्थ में टीवी के सामने सिर खपाने के स्थान पर कुछ ज्ञान की बातें सीख जाएंगे. मैंने बहुत से लोगों को यह तरीका बताया है, लाभ हुआ है उन्हें.एक बदलाव आपको अपने में लाना है. आप यह मानकर चलना छोड दें कि समस्या बच्चे में है. गौर से देखें तो बच्चे से ज्यादा परेशानी आपमें है.
बहुत से लोग बच्चों पर जबरदस्ती पढ़ाई भी लादते चले जाते हैं. बच्चा कितना भी पढ़ने में होशियार हो, उसके प्रदर्शन से संतुष्ट ही नहीं होंगे.
उसके सामने रोज एक नया लक्ष्य रखते जाएंगे. आपके टारगेट के बोझ तले पिस रहा है आपका बच्चा.
इसे और विस्तार से समझिए.मानकर चलते हैं कि आप युवा माता-पिता हैं. 25 से 30 के बीच के. हाउसवाइफ हैं या वर्किंग पिता हैं.
30 की उम्र में आने से पहले पी.टी.उषा को संसार में सभी जानते थे. जुकरबर्ग ने अरबों रूपए कमा लिए थे. सचिन तेंदुलकर ने सारे रिकॉर्ड बना लिए थे. भगवान शंकराचार्य जी संसार को ज्ञान की रोशनी में नहलाकर विदा हो रहे थे.
पर आप तो साधारण ही रह गए. ऐसा क्यों? आप क्यों नहीं हुए उतने बड़े?
यही बात बच्चे पर भी लागू होती है. क्लास में सबसे आगे कोई एक ही हो सकता है, सभी नहीं. उस होड़ में झोंककर आप अपने बच्चे के नैसर्गिक गुण को न पहचान रहे हैं न उसे निखार रहे हैं.
हर व्यक्ति में भगवान ने एक ऐसा गुण भरा है जो उसे दूसरों से बेहतर बनाता है. आप उसे पहचानने का भी प्रयास करें.
मैं ऐसा नहीं कह रहा कि उसे पढ़ने की जरूरत नहीं. पढ़ना तो बेहद जरूरी है लेकिन फर्स्ट ही आए उसके लिए बाध्य करना जरूरी नहीं.
याद रखिए यदि बचपन से उसे जिम्मेदार नागरिक बनाने पर ध्यान देंगे तो यकीन रखिए वह अपना सुंदर करियर अपने दम पर बना लेगा. जो सद्गगुण आप भरेंगे वह व्यर्थ नहीं जाएगा.
पढ़ने में बड़ा होशियार हो बच्चा पर उद्दंड हो जाए. घर में कोई आए तो उसके साथ बदतमीजी कर दे, रास्ते में चलता किसी को पत्थर मार दे या किसी पर थूक दे और झगड़ा होने लगे.
क्या उस समय आप उसकी मार्कशीट निकालकर दिखाएंगे और सब ठीक हो जाएगा. नहीं न.
मैं कोई काल्पनिक बात नहीं कर रहा, मैंने ऐसे बच्चे देखे हैं. माताृ-पिता लाड करते रहे कि क्लास में फर्स्ट आता है, बस थोड़ा चंचल है. इसे सुधारने की जरूरत है.
यदि आप स्वयं में सुधार लाने को मानसिक रूप से तैयार हो गए हों तो बच्चे को प्रेरित करने के लिए एक कथा सुनाता हूं. यह कथा सुनाकर बच्चे को प्रोत्साहित करें. आपके लिए भरद्वाज पुत्र यवक्रीत की कथा बहुत काम आएगी. आपको कथा सुनाता हूं.
भरद्वाज मुनि के बेटे यवक्रीत को पढ़ने-लिखने में बिलकुल मन नहीं लगता था. धीरे-धीरे उसके सभी मित्र बड़े ज्ञानी हो गए और उन्हें सम्मान मिलने लगा.तब यवक्रीत को लगा कि उसे भी पढ़ाई करके वेद-शास्त्रों का ज्ञान हासिल करना चाहिए था.
उसने सोचा कि अगर वह पढ़ाई शुरू करता है तो फिर ज्ञान प्राप्त करने में तो जाने कितने साल लग जाएंगे.
उसने विचार किया कि अगर देवताओं के राजा इंद्र को तपस्या से प्रसन्न कर ले तो वह सारा ज्ञान उसे दे देंगे. फिर इतने साल तक पुस्तकों के पीछे दिमाग खपाने के झंझट में कौन पड़े!
यवक्रीत गंगा के किनारे ध्यान लगाकर बैठ गया. वह इंद्र का आह्वान करने लगा.
इंद्र को बात पता चल गई.
इंद्र ब्राह्मण का वेश बनाकर आए और यवक्रीत के नजदीक ही बैठकर दोनों हाथों से गंगा में बालू(रेत) फेंकने लगे.
यवक्रीत ने उन्हें ऐसा करते देखा तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ.
उसने इंद्र से कहा- विप्रवर आप नदी में ऐसे बालू क्यों फेंक रहे हैं, आपका क्या उद्देश्य है?
ब्राह्मण वेशधारी इंद्र ने पूछा- पहले तुम बताओ, क्यों तपस्या कर रहे हो?”
यवक्रीत ने बताया कि वह पढ़ने-लिखने में समय व्यर्थ नहीं करना चाहता इसलिए वह तपस्या कर रहा है ताकि इंद्र प्रसन्न हो जाएं और दुनिया का सारा ज्ञान उसे दे दें.
इंद्र ने कहा, “ऐसा नहीं होता. अगर ज्ञान तपस्या से ही मिलने लगे तो कोई अध्ययन क्यों करे, सभी तप करने लगेंगे. खुद देवताओं ने अध्ययन से ज्ञान प्राप्त किया है.”यवक्रीत ने उनकी बात को अनसुना करते हुए कहा- खैर, आप बताइए आप बालू क्यों फेंक रहे हैं?”
इंद्र ने कहा- मैं बालू फेंककर गंगा पर मजबूत पुल बना रहा हूं.
उनकी बात सुनकर यवक्रीत जोर से हंसा.
उसने कहा- आप उम्र में बड़े हैं, ज्ञानी हैं फिर भी कैसी बातें कर रहे हैं. ऐसे कहीं गंगा पर पुल बन सकता है?
इंद्र ने उत्तर दिया- तुम्हारी बात तो ठीक है बेटा कि बालू से पुल नहीं बन सकता लेकिन तुम्हीं बताओ बिना पढ़े ज्ञान कैसे मिल सकता है? जिस प्रकार बिना अक्षर के कोई शब्द नहीं बन सकता, बिना बीज के पौधा नहीं उग सकता उसी तरह बिना अध्ययन के ज्ञान भी नहीं मिल सकता.
इंद्र की बात सुनकर यवक्रीत समझ गया कि वह ब्राह्मण कोई साधारण मानव नहीं हैं.
उसने हाथ जोड़कर कहा- आपने मेरी आंखें खोल दीं. आप कौन हैं? अपना वास्तविक परिचय दें.
इंद्र अपने असली रूप में आ गए. उन्होंने यवक्रीत को समझाया कि अगर तपस्या करके किसी देव को प्रसन्न करके ज्ञान मिल भी गया तो तुम्हें उतना ही ज्ञान मिलेगा जितना कि खुद उस देवता के पास है.
बाकी का ज्ञान तो फिर भी नहीं मिल सकता. लेकिन अगर तुम खुद से अध्ययन करोगे तो दुनिया का कोई भी ज्ञान प्राप्त कर सकते हो.
यवक्रीत ने खूब लगन से अध्ययन किया. समस्त ज्ञान प्राप्तकर बाद में तपोदत्त के नाम से विख्यात हुए.
यदि आपको मेरे द्वारा दिए परामर्श पसंद आ रहे हैं, उनका कोई लाभ आपको महसूस हो रहा है तो कृपया मुझे व्हाटसएप्प पर बताएं. आपके अनुभवों से फिर आगे किसी को लाभ हो सके.
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-राजन प्रकाश
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