Advertisement728 × 90

प्रभु दर्शन से वंचित हरिभक्त कछुआ ही क्या केवट और सुदामा के रूप में प्रभु सेवा को आया था- आज की रामकथा

प्रभु दर्शन से वंचित हरिभक्त कछुआ ही क्या केवट और सुदामा के रूप में प्रभु सेवा को आया था- आज की रामकथा

ram-ji-hd-.2
प्रभु शरणं के पोस्ट की सूचना WhatsApp से चाहते हैं तो अपने मोबाइल में हमारा नंबर 9871507036 Prabhu Sharnam के नाम से save कर लें। फिर SEND लिखकर हमें उस नंबर पर whatsapp कर दें।
जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी।
अब आप बिना इन्टरनेट के व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र , श्रीराम शलाका प्रशनावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ तथा उपयोग कर सकते हैं.इसके लिए डाउनलोड करें प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प.
Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
एक कछुआ भगवान विष्णु का बड़ा अनन्य भक्त था. एक बार गंगासागर स्नान को आए कुछ ऋषियों के मुख से उसने श्रीहरि के चरणों की महिमा सुनी. कछुए के मन में प्रभु चरणों के दर्शन की तीव्र इच्छा हुई.

उसने ऋषियों से पूछा कि उसे प्रभु चरणों के दर्शन कैसे हो सकते हैं. ऋषियों ने बताया कि प्रभु के चरणों के दर्शन का सौभाग्य उन्हीं पुण्यात्माओं को मिलता है जिन पर वह प्रसन्न होते हैं.

कछुए पूरी निष्ठा से प्रभु की भक्ति करता था. लेकिन उसे यज्ञ-हवन आदि तो करने आते नहीं थे, इसलिए उसे लगा कि उसकी भक्ति तो पूरी है नहीं. लेकिन जंतु रूप में तो श्रीहरि ने ही भेजा है, इसलिए मेरी क्या गलती!

उसने ऋषियों से पूछा कि प्रभु कहां वास करते हैं? ऋषियों ने कहा- वैसे तो प्रभु सब जगह हैं लेकिन उनका निवास पाताल लोक से भी आगे बैकुंठधाम में है. क्षीर सागर में वह शेषनाग की शय्या पर विराजते हैं.

कछुआ चल पड़ा बैकुंठ लोक की खोज में. बेचारा अपनी धीमी चाल में सदियों का सफर करता आखिरकार पहुंच ही गया, श्रीहरि के धाम.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.प्रभु विश्राम कर रहे थे. उसने प्रभु के चरणों के दर्शन करना चाहा लेकिन शेषनाग ने रोक दिया.

कछुआ विनती करता रहा लेकिन शेष ने एक न सुनी. बेचारे के बिना श्रीहरि के चरणों के दर्शन हुए ही प्राण निकल गए. कछुए की तपस्या अधूरी रह गई.

अगले जन्म में वह कछुआ केवट बना. प्रभु ने श्रीराम अवतार लिया. शेषनाग लक्ष्मण रूप में और माता लक्ष्मी सीता रूप में आईँ.

प्रभु को नदी पार करनी थी. केवट नदी पार कराने आया. केवट का तप अधूरा रहा था- उसने शर्त रखी कि प्रभु आप पैर धुलवाएंगे तभी नाव में सवारी मिलेगी.

उसने उलाहना दिया- कहीं मेरी नाव भी अहिल्या की तरह नारी बन गई तो परिवार कैसे पालूंगा.

शेषनाग और लक्ष्मीजी के सामने ही केवट ने प्रभु के चरण कमलों को पखारने का सुख प्राप्त किया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.पर कछुए रूपी केवट का मन भरा नहीं. प्रभु ने सोचा कि अगर वह संतुष्ट न हुआ तो बार-बार जन्म लेता रहेगा. कुछ करना होगा.

श्रीहरि भगवान कृष्ण के रूप में आए, कछुआ इस बार सुदामा हुआ. माता लक्ष्मी रुक्मिणी और शेषनाग बलदाऊ का रूप धरकर आए. एक दिन सुदामा बना वह कछुआ प्रभु से मिलने आया.

उसके पैरों में धूल लगी थी. राह के पत्थरों से घाव हो गया था और खून बह रहा था. प्रभु ने अपने हाथों से सुदामा के पैर धोए, रुक्मिणी जल लेकर आईं और बलदाऊ दो मित्रों का मिलन देखकर भाव विभोर होते रहे.

अब कछुए को अभिलाषा से ज्यादा सुख मिल चुका था.

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली

आप सभी Maa Durga Laxmi Sharnam एप्पस जरूर डाउनलोड कर लें. माँ लक्ष्मी व माँ दुर्गा को समर्पित इस एप्प में दुर्लभ मन्त्र, चालीसा-स्तुति व कथाओं का संग्रह है. प्ले स्टोर से डाउनलोड कर लें या यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करें. विनती है कि कृपया एप्प की रेटिंग जरूर कर दें.

ये भी पढ़ें-
जानिये क्यों कोई काम छोटा नहीं होता : हनुमानजी के जीवन की अति प्रेरक कथा
माता सीता ने क्या युद्ध में रावण के वंश के एक असुर का संहार भी किया था
कहीं आप भी तो नहीं करते वही काम जिससे राजा भोज जैसे विद्वान मूर्खराज कह दिए गए- प्रेरक कथा
प्रभु श्रीराम का सम्मान, धर्मसंकट में सेवक श्री हनुमानः हनुमानजी की भक्ति कथा

हम ऐसी कथाएँ देते रहते हैं. Facebook Page Like करने से ये कहानियां आप तक हमेशा पहुंचती रहेंगी और आपका आशीर्वाद भी हमें प्राप्त होगा: Please Like Prabhu Sharnam Facebook Page

error: Content is protected !!