न मृत्यु न काल, जानिए शास्त्र किसे मानते हैं प्राणी के अंत का कारण

न मृत्यु न काल, जानिए शास्त्र किसे मानते हैं प्राणी के अंत का कारण

Yamraj
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गौतमी नामक एक ब्राह्मणी थी. उसके इकलौते पुत्र को एक सांप ने डंसकर मार दिया. एक बहेलिए अर्जुनक ने सांप को डंसते देखा और कंटीले तांत में सांप को फंसा लिया.

अर्जुनक तांत में फंसे सांप को लेकर गौतमी के पास आया. अर्जुनक ने कहा-इसी सांप ने तुम्हारे पुत्र को डंसकर मार डाला है. मैं इस हत्यारे सांप का अंत कर देता हूं.

गौतमी ने कहा- होनी को टाला नहीं जा सकता. इसकी हत्या से मेरा पुत्र वापस तो नहीं आएगा. इसलिए इसे छोड़ दो.

अर्जुनक ने कहा- इसने आपके पुत्र से पहले भी लोगों को डंसा होगा. भविष्य में भी यह लोगों को डंसेगा. इसे तो मार ही देना चाहिए. तांत में फंसा सांप छटपटा रहा था.

सांप ने कहा- बालक को डंसने में मेरा क्या दोष? मुझे काल ने विवश किया था. जिस तरह मिट्टी का बर्तन बनाने में डंडा और चाक दोनों कुम्हार के अधीन होते हैं वैसे ही मैं मृत्यु के अधीन हूं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.अर्जुनक ने कहा- चलो मान भी लिया कि तुम मृत्यु के अधीन हो लेकिन बालक की मृत्यु तो तेरे ही कारण हुई है. इस महिला की हानि का कर्ता तो तू ही है.

अर्जुनक ने कहा- शास्त्रों में कहा गया है, अनिष्ट करने वाले से ज्यादा दोषी अनिष्ट के लिए प्रेरित करने वाला होता है. मैंने मृत्यु की प्रेरणा से बालक को डंसा था. वह मुख्य अपराधी है.

मृत्यु के देवता तीनों का वार्तालाप सुन रहे थे. उनकी शंका मिटाने के लिए वह प्रकट हुए. मृत्यु ने कहा- मैं भी तो काल के अधीन हूं. काल की आज्ञा से मैंने सांप को डंसने के लिए प्रेरित किया था.

इसलिए बालक की मृत्यु का कारण न तो सांप है और न मैं हूं. काल ही सबका संहारक हैं. जीवों के प्राण लेने के लिए वह उत्तरदायी हैं. मुझे क्यों दोष दे रहे हो?

मृत्यु देवता की बात से अर्जुनक सहमत नहीं था. मृत्यु ने फिर कहा- हम पर आरोप लगाना अनुचित है. हम तो काल के सेवक हैं. इसलिए असली दोषी से प्रतिवाद करो.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.काल हर जगह मौजूद होते हैं. वह भी इस वार्तालाप को सुन रहे थे. उन्होंने सोचा कि इन सबकी शंका का समाधान करना चाहिए अन्यथा भ्रम में ये दोषारोपण करते रहेंगे.

काल प्रकट हुए और बोले- अर्जुनक इस बालक की मृत्यु का कारक न तो यह सांप है, न मृत्यु और न ही मैं. अपनी मृत्यु का प्रेरक यह बालक स्वयं है.

काल बोले- संसार में हर प्राणी स्वयं अपने काल का प्रेरक है. इंसान का कर्म हमेशा उसका पीछा करता है. कर्मों के अनुसार जीवों के काल की दशा तय होती है.

जिस प्रकार मिट्टी के लोंद से अपनी पसंद का बर्तन बनाता है. उसी प्रकार जीव अपने कर्म से अपने लिए काल का विधान तय करता है. तुम इस सांप को मुक्त कर दो.

अर्जुनक और ब्राह्मणी दोनों काल की बात से संतुष्ट होकर चले गए. विधाता ने मृत्यु का निर्धारण करने का मानदंड तय किया है.

काल प्राणी के कर्मों के आधार पर उसका अंत लिखते हैं. जिसने भी जन्म लिया उसका अंत निश्चित है.

अंत आसान हो या कष्टप्रद इसका निर्धारण कर्मों के आधार पर होता है. हमें तय करना है कि हम अपने लिए कैसी मृत्यु की इच्छा रखते हैं.(महाभारत की कथा)

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली

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