हिंदू होने पर गर्व करते हैं तो जानना चाहिए कि हमने यह गौरव पुनः पाया कैसे था?
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हमारा फेसबुक पेज लाइक कर लें इससे आपको प्रभु शरणम् के पोस्ट की सूचना मिलती रहेगी. इस लाइन के नीचे हमारे फेसबुक पेज का लिंक है उसे क्लिक करके लाइक कर लें.आज हम सनातन पर अभिमान करते हैं. कहीं भी सीना चौड़ाकर हर्ष से नाद करते हैं- गर्व से कहो हम हिंदू हैं. हमारा धर्म पूरी तरह वैज्ञानिक है, व्यवहारिक है प्रामाणिक है. पर आज से कुछ साढ़े बारह सौ वर्ष पूर्व का इतिहास जानेंगे तो कांप जाएंगे.
भारतभूमि में अवैदिक जैन और बौद्ध मत का बोलबाला था. महात्मा बुद्ध और तीर्थंकर के उपदेशों को उनके शिष्य भूल चुके थे. अहिंसा और किसी से भी घृणा न करो का भाव बौध और जैन मतावलंबियों में से लुप्त हो रहा था.
राजाश्रय प्राप्त होने और बुद्ध तथा तीर्थंकर के मूल सिद्धांतों का खंडन करते हुए इन्होंने मूर्ति पूजा आरंभ कर दी तो उनके सामने सनातन परंपरा शत्रुवत लगने लगी क्योंकि सनातन में मूर्ति पूजन प्रचलित था.
स्वयं को सनातनी और वैदिक धर्म का अनुयायी मानकर चलना इतना सहज सरल नहीं रह गया था. सनातन की गौरवशाली परंपरा धीरे-धीरे मंद पड़ रही थी. वैदिक धर्म की रक्षा के लिए एक अवतार की बड़ी आवश्यकता थी. भगवान शिव ने धर्मरक्षा के लिए अवतार लेने का निर्णय किया.
दक्षिण भारत के एक शिवभक्त शिवगुरु नामपुद्रि के यहां विवाह के कई वर्षों बाद तक कोई संतान नहीं हुई. उनकी पत्नी विशिष्टा देवी ने कहा- हम तो शिवजी की शरण में हैं. क्यों न हम शिवजी को प्रसन्न कर उनसे पुत्र की याचना करें.
शिवगुरु को बात जंच गई. पति-पत्नी दोनों ने शिवजी की कठोर आराधना आरंभ की. लंबे समय तक उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और कहा- वर मांगो.
शिवगुरु ने मांगा- प्रभु हमें एक दीर्घायु और सर्वज्ञ पुत्र प्रदान करें जो धर्मपरायण हो.
भगवान शंकर ने कहा- मैं तुम्हें एक वरदान दूंगा. या तो दीर्घायु पुत्र मांग लो या फिर सर्वज्ञ. दीर्घायु सर्वज्ञ नहीं होगा और सर्वज्ञ दीर्घायु नहीं हो सकता. बोलो तुम कैसा पुत्र चाहते हो?’
शिवगुरु ने सर्वज्ञ पुत्र की याचना की. भगवान शिव ने कहा- तुम्हें सर्वज्ञ पुत्र की प्राप्ति होगी. मैं स्वयं पुत्र रूप में तुम्हारे यहां अवतीर्ण होऊंगा.
शिवगुरू ने अपनी पत्नी को स्वप्न बताया. दोनों बड़े प्रसन्न थे. शिवजी का वरदान फलीभूत हुआ.
विशिष्टा देवी को गर्भ ठहरा और समय आने पर वैशाख शुक्ल पंचमी के दिन एक तेजस्वी, अति सुंदर, दिव्य कांतियुक्त बालक ने जन्म लिया.
बालक का जन्म शिवजी की कृपा से हुआ था इसलिए उसका नाम रखा गया-शंकर.
भोलेनाथ के अनन्य भक्त शिवगुरू के घर एक ऐसे बालक ने जन्मलिया है जिसके चेहरा एक विशिष्ट तेज से चमक रहा है. बात फैल गई और दूर-दूर से विद्वान बालक के दर्शन को आने लगे.कुछ प्रकांड ज्योतिषी भी आए यह जानने कि आखिर किन ग्रहों का प्रभाव है कि नवजात शिशु के चेहरे से कांति निकल रही है. एक प्रकांड ज्योतिषी ने बालक के दर्शन किए पर उसके बाद उनका चेहरा उदास हो गया.
शिवगुरू ने कारण पूछा तो वह टालने लगे. ज्योतिषी की ब़ड़ी प्रसिद्धि थी.
शिवगुरू ने हठ कर दिया तो उन्होंने बताया कि बालक अल्पायु है. इसकी आयु केवल आठ वर्ष है. यदि यह तप करे तो इसे आठ साल की आयु और प्राप्त हो सकती है.
शिवगुरू को स्वप्न का स्मरण हो आया. बालक शंकर को भी पता था कि उनको बहुत कम उम्र में बहुत से कार्य पूरे करके मृत्यु लोक से विदा लेना है. एक वर्ष की उम्र में ही इनमें देवत्व का गुण आ गया. दो वर्ष की उम्र में माता से पुराणों का ज्ञान प्राप्त कर लिए.
पिता की अकाल मृत्यु होने से शैशवावस्था में ही शंकर के सिर से पिता का साया उठ गया. सारा बोझ शंकर की माता के कंधों पर आ पड़ा. पाँच वर्ष की अवस्था में इनका यज्ञोपवीत संस्कार करवाकर वेदों का अध्ययन करने के लिए गुरुकुल भेज दिया गया.
ये प्रारंभ से ही प्रतिभा संपन्न थे, अत: इनकी प्रतिभा से इनके गुरु भी बेहद चकित थे. अप्रतिम प्रतिभा संपन्न बालक शंकर ने मात्र दो वर्ष में वेद, पुराण, उपनिषद्, रामायण, महाभारत आदि ग्रंथ कंठस्थ कर लिए.
तत्पश्चात गुरु से सम्मानित होकर घर लौट आए और माता की सेवा करने लगे.
उनकी मातृ शक्ति इतनी विलक्षण थी कि उनकी प्रार्थना पर आलवाई (पूर्णा) नदी, जो उनके गाँव से बहुत दूर बहती थी, उसने अपनी दिशा बदल दी और इनके गांव के समीप बहने लगी जिससे उनकी माता को नदी स्नान में सुविधा हो गई.
कुछ समय बाद इनकी माता ने इनके विवाह की सोची पर आचार्य शंकर गृहस्थी के झंझट से दूर रहना चाहते थे. एक ज्योतिषी ने जन्म-पत्री देखकर बताया भी था कि अल्पायु में इनकी मृत्यु का योग है.ऐसा जानकर आचार्य शंकर के मन में संन्यास लेकर लोक-सेवा की भावना प्रबल हो गई थी. संन्यास के लिए उन्होंने माँ से हठ किया पर इकलौते पुत्र को माता कैसे जाने देतीं. उन्होंने साफ मना कर दिया.
शंकर को एक उपाय सूझा. कुछ समय बाद वह अपनी माता के साथ किसी पर्व के अवसर पर नदी स्नान को गए तो तैरते-तैरते माता को पुकारा- माता मुझे मगरमच्छ ने पकड़ लिया है और नीचे खींच रहा है.
माता ने चीखना-चिल्लाना आरंभ कर दिया. बालक ने कहा- माता एक ही रास्ता है. तुम मुझे शिवजी के लिए अर्पण कर दो, वही मेरी प्राण रक्षा करेंगे.
माता ने कहा- ऐसा है तो मैं तुझे शिवजी की सेवा के लिए समर्पित करती हूं. वही इस मगरमच्छ तुम्हारी रक्षा करें. शंकर तैरकर बाहर आ गए तो माता के जान में जान आई.
शंकर ने तत्काल याद दिलाया- माता आप मुझे शिवजी के लिए समर्पित कर चुकी हैं. अब मैं उनके लिए अर्पित हूं. मुझे शिवकार्य से मत रोकना, मुझे संन्यास ग्रहणकर धर्म के अन्वेषण के लिए जाने की आज्ञा दो.
माता बहुत रोईं-कलपीं. शंकर नर्मदा की ओर निकल पड़े. आदि शेषावतार माने जाने वाले गोविन्द भगवत्पाद के आश्रम पहुंचे. गोविंदपाद भी जैसे उनकी ही प्रतीक्षा में जीवन गुजार रहे थे.
शंकर ने उनसे दीक्षा ग्रहण की. दो वर्ष बाद गुरू ने आदेश किया- तुम अब एक पूर्ण संन्यासी हो. राजयोग, हठयोग और ज्ञान योग की शास्त्र शिक्षा पूरी कर चुके हो. अब तुम व्यवहारिक शिक्षा के लिए काशी जाओ.
संन्यास लेने से शंकर की पूर्णायु आठ वर्ष से सोलह वर्ष हो गई.
वयोवृद्ध गुरुभाइयों के साथ एक तेजस्वी शंकर काशी पहुंचे तो वहां हलचल मच गई. विद्वान उनके दर्शन को आने लगे. उनकी आयु ही थोड़ी थी पर उनके ज्ञान की बराबरी करने वाला कोई न था.
शंकर को उनके ज्ञान को देखते हुए अब आचार्य मान लिया गया था. शंकर से वह अब शंकराचार्य के रूप में काशी में विख्यात हो गए थे.शंकराचार्य एक दिन ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करने के लिए गंगा के तट पर जा रहे थे. रास्ते में एक स्त्री अपने पति का शव रखकर विलाप कर रही थी.
शंकराचार्य ने उससे शव को मार्ग से हटाने के लिए कहा तो उस स्त्री ने कहा कि शव को क्यों नहीं कह देते कि वह हट जाए.
शंकराचार्य ने कहा- शव में हटने की शक्ति नहीं है.
स्त्री ने कहा- आपके मतानुसार तो शक्ति निरपेक्ष ब्रह्म ही जगतकर्ता है तो यह शव शक्ति के बिना क्यों नहीं हटता? इतना कहकर वह स्त्री वहां से अंतर्धान हो गई.
इससे शंकराचार्य को शक्ति के महत्व का ज्ञान हुआ. तब उन्होंने श्री की उपासना प्रारंभ की और श्रीविद्या के प्रवर्तक के रूप में जाने जाने लगे.
शंकराचार्य जी ने कनकधारा स्तोत्र की रचना क्यों और कैसे की इसकी एक बड़ी रोचक घटना है.
पांच वर्ष की उम्र थी शंकर की. भिक्षा मांगने के लिए उन्होंने एक दरवाजे पर आवाज लगाई. उस घर में एक गरीब स्त्री रहती थी.
वह संकोच के साथ बाहर आई और बोली- मैं अत्यंत निर्धन हूं. मैंने आज भोजन भी नहीं किया है.
मेरे पास देने के लिए एक आंवले के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है. मुझे क्षमा करें. स्त्री ने वह आंवला उनके भिक्षापात्र में डाल दिया.
यह सुनकर बालक शंकर का हृदय द्रवित हो गया. उन्होंने उसके दरवाजे पर ही खडे होकर माता लक्ष्मी की आराधना शुरू की. स्तुति के लिए उन्होंने जो श्लोक कहे वही कनकधारा स्तोत्र है.
मां लक्ष्मी प्रसन्न हुईं और उस स्त्री के घर कनकवर्षा हुई. इस तरह उसकी दरिद्रता दूर हो गई.शंकराचार्यजी की बचपन की एक और चमत्कारिक घटना बड़ी प्रसिद्ध है.
बालक शंकर गुरुजी के आश्रम में रहकर अध्ययन करते थे. एक बार बरसात में अचानक बाढ़ का पानी चढने लगा.
ऐसा लगा कि पानी आश्रम को लील ही जाएगा. गुरूजी बड़े चिंतित थे. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए.
बालक शंकर ने गुरू को व्याकुल देखा तो बाढ़ को रोकने का निश्चय किया. अपने कमंडल में बाढ़ के पानी को समाहित कर लिया और पानी वहां से लुप्त हो गया.
काशी में रहकर शंकराचार्य वैदिक धर्म के उत्थान कार्य में जुट गए. इन्हें एक दिन गंगा के किनाने सामान्य ब्राह्मण के रूप में वेदव्यासजी ने दर्शन दिए.
वेदव्यास ने शंकर से ब्रह्मसूत्र का अर्थ पूछा. शंकराचार्य ने बताकर संतुष्ट किया. भगवान वेद-व्यासजी के साथ उनका आठ दिनों तक शास्त्रार्थ चला.
अंत में वेदव्यास ने अपना परिचय देकर इन्हें पूर्ण आशीर्वाद दिया और अद्वैतवाद का प्रचार करने का आदेश दिए और साथ इनकी उम्र 16 वर्ष से 32 वर्ष होने का आशीर्वाद भी दिया.
शंकराचार्य निर्गुण सिद्धांत के अनुयायी थे. संसार की मिथ्या और माया को समझने का भाव उनके अंदर इतना प्रबल हो चुका था कि वह सगुण उपासना की तरफ ध्यान ही न देते थे. उस समय सनातन में सगुण उपासना ही प्रचलित थी.
शंकराचार्य कहा करते- मैं सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण से रहित हूं. मैं शरीर, इंद्रिय, प्राण और अंतःकरण की क्रिया से रहित हूं.
आकार से रहित हूं, अविद्या रूपी मल से रहित हूं. आकाशतत्व के समान सभी प्राणियों में व्याप्त हूं. देश काल और वस्तु से रहित जो परब्रह्म है वही मैं हूं.
वह गुरू की आज्ञा से लोगों को वेदांत का उपदेश तो दे रहे थे किंतु हृदय से तो वह संसार को असत् समझ रहे थे. उनका कार्य हृदय से नहीं बस यंत्रवत हो गया था.
उन्हें इस भाव से निकालने के लिए एक दैवीय चमत्कार हुआ.शंकराचार्य एक दिन गंगा की ओर जा रहे थे. सामने से एक चांडाल चार कुत्तों के साथ नशे में धुत आता दिखाई दिया. चांडाल ने पूरा रास्ता धेर लिया था.
उसका स्पर्श न हो जाए इस आशंका से शंकराचार्य ने कहा- रास्ते के एक तरफ होकर चलो औऱ मुझे मार्ग दो. मेरे जाने का स्थान तो छोड़ दो.
चांडाल ने चलते-चलते कहा- कौन किसको स्पर्श करता है? सर्वत्र एक ही वस्तु व्यापत है. किसके भय से तुम दबकर चल रहे हो? आत्मा किसी को स्पर्श नहीं करती. जो आत्मा तुममें है वही मुझमें है फिर तुम दूर जाने को किसे कह रहे हो, इस शरीर को या आत्मा को?
कहते हैं स्वयं भगवान विश्वनाथजी चांडाल रूप धरकर आए थे उन्हें सिद्धांत पर अड़े न रहकर जनमत को साथ लेकर धर्म की स्थापना का कार्य करने का आदेश देने.
शंकराचार्य का जीवन उसी पल बदल गया. प्रमुख शिष्यों के साथ बद्रिकाश्रम चले गए औऱ ब्रह्मसूत्र पर प्रसिद्ध भाष्य लिखा. इसके बाद ग्यारह प्रमुख उपनिषदों पर प्रसिद्ध शारीरिक भाष्य भी लिखा.
शंकराचार्यजी ने बौद्ध, जैन आदि अवैदिक मतों द्वारा सनातन पर हो रहे प्रहार का जोरदार जवाब देते हुए जनमानस को तैयार करना शुरू किया.
कुमारिल भट्ट उनके पास मिलने आए और उन्हें इस कार्य में सहयोग का भरोसा दिया और कहा मुझसे भी विद्वान मेरा शिष्य मंडन मिश्र है. उससे मिलो और वैदिक धर्म का उद्धार करो. यह कहकर उन्होंने शरीर त्याग दिया.
अवैदिक धर्मों के खिलाफ मोर्चा खोलने से उनपर कई बार जानलेवा हमले हए. देश की यात्रा शुरू की और मंडन मिश्र से भी मिले. मंडन मिश्र को शास्त्रार्थ में पराजित कर दिया तो उनकी पत्नी भारती ने शंकराचार्य को चुनौती दी.
भारती ने उनसे कामशास्त्र और स्त्रीशरीर के रहस्यों से जुड़े प्रश्न पूछने आरंभ किए.
बालब्रह्मचारी शंकराचार्य को स्त्रीदेह का ज्ञान ही न था. उस समय उन्होंने ऐसा कार्य किया जो देवताओं और हमारे आदि ऋषिण कर किया करते थे.
शंकराचार्य ने परकाया प्रवेश किया.अपने शरीर से आत्मा को निकालकर एक मृत गृहस्थ के शरीर में पहुंचाया और फिर स्त्री देह का ज्ञान लेकर वापस अपने शरीर में लौट गए. इसके बाद उन्होंने भारती देवी के सभी प्रश्नों के उत्तर दिए. पति-पत्नी दोनों उनके शिष्य बन गए.
सनातन धर्म के प्रचार के लिए शंकराचार्य ने अनेक स्थानों का भ्रमण किया। इन्होंने काशी, कुरुक्षेत्र, बद्रिकाश्रम में अन्य मतों के प्रचारकों से एवं विद्वानों से शास्त्रार्थ किया.
इनके प्रभाव से पुन: सनातन धर्म की ओर लोगों की रुचि होने लगी। इन्होंने अनेक मंदिर भी बनवाए। पूरे भारत की यात्रा करने के पश्चात देश के चारो दिशाओं में एक-एक पीठ स्थापित किए.
पूर्व में पुरीधाम में गोवर्धन मठ, पश्चिम में द्वारकाधाम में शारदा मठ, उत्तर के योतिर्धाम में ज्योतिर्मठ व दक्षिण के रामेश्वरम धाम में श्रृंगेरी मठ के नाम से विख्यात है.
इन्होंने दो सौ ग्रंथों की रचना की है जिसमें ब्रह्मसूत्र भाष्य, गीता भाष्य, विवेक चूड़ामणि, उपनिषद भाष्य, प्रबोध सुधाकर, उपदेश साहसी, अपरोक्षानुति, सौन्दर्य लहरी व प्रपंचसार तंत्रम आदि प्रमुख हैं.
बत्तीस वर्ष की अवस्था में इन्होंने सनातन पंरपरा के गौरव को पुनःस्थापित कर लिया और फिर ब्रह्मलीन हो गए.
आदि शंकराचार्य जी ने जो कार्य किए हैं उसके लिए सभी सनातनी आजीवन ऋणी और श्रद्धाभाव से नतमस्तक रहेंगे. उन्होंने सनातन के ज्ञान को लिपिबद्ध किया. उसका प्रचार किया. उनके द्वारा लिखे भाष्य को आधार बनाकर उसके बाद के संतों ने प्रचार किया तो सनातन का गौरव पुनः स्थापित हुआ.
संभवतः सनातन के नामलेवा आज न होते यदि शिव ने शंकराचार्य के रूप में अवतार न लिया होता.
भगवान आदि शंकराचार्य की जयंती पर उन्हें शत्-शत् नमन.
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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