जातीय अहंकार व जातीय विद्वेष पतन की ओर ले जाता है, भीष्म ने युधिष्ठिर को सुनाई थी पद्मनाभ नाग की कथाः महाभारत की नीति कथा
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नैमिषारण्य में गोमती के तट पर धर्मात्मा, बुद्धिमान और शास्त्रों का ज्ञाता पद्मनाथ नामक एक नाग रहता था. वह तप, संयम और उत्तम विचारों से युक्त हमेशा स्वाध्याय में लगा रहता.
तीर्थयात्रा पर निकला एक ब्राह्मण उसके दर्शन को पहुंचा. नागराज घर पर नहीं थे तो नागपत्नी ने अतिथि का सत्कार किया. नागपत्नी ने कहा कि नागराज घर पर नहीं हैं. वह आते ही आपके दर्शन करेंगे.
ब्राह्मण ने कहा- जब तक उनके दर्शन नहीं होते तब तक मैं गोमती के तट पर निराहार उनकी प्रतीक्षा करूंगा. वह नागपत्नी के बार-बार कहने पर भी निराहार गोमती के तट पर बैठा साधना करने लगा.
नागपत्नी परिवार के बुजुर्गों और बच्चों को लेकर ब्राह्मण के पास पहुंची और कहा- हम गृहस्थ हैं और गृहस्थ का अतिथि भोजन न करे तो मन क्लेशयुक्त रहता है. आप हमें सत्कार का अवसर दीजिए.
किंतु ब्राह्मण ने उनका आभार व्यक्त कर यह कहते हुए लौटा दिया कि उसने दर्शन का व्रत लिया है. छह दिनों बाद नागराज आए तो पत्नी ने सब बताया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
अतिथि ने छह दिनों से अन्न ग्रहण नहीं किया है यह सोचकर नागराज पद्मनाभ बड़े दुखी हुए. उन्होंने पत्नी से कहा- मनुष्य नागवंश के दर्शन के लिए इतने व्याकुल नहीं होते. आपने शायद पहचानने में भूल की है.
नाग महापराक्रमी और वेगवान होते हैं, देवताओं, असुरों और ऋषियों के लिए भी वंदनीय हैं. मनुष्यों के लिए हमारा दर्शन सुलभ नहीं हैं. दर्शन के लिए इस तरह आज्ञा देकर मुझे बुला सकने वाला वह कोई मनुष्य नहीं है.
नागपत्नी ने कहा- उसकी सरलता से मैं इतना तो समझती हूं कि वह देवता नहीं है. जो शरण में आए हुए के आंसू नहीं पोछता उसकी मर्यादा और कीर्ति भस्म हो जाती है. नीति कहती है कि आपको तत्काल उसके दर्शन करने चाहिए. मर्यादा उसमें है.
नाग की आंखों पर पड़ आई श्रेष्ठता की पट्टी तत्काल उतर गई. वह बोला- इंद्र के भी बलशाली रावण रोष के कारण मारा गया, कार्तवीर्य अर्जुन इंद्र को हराना का सामर्थ्य रखता था किंतु परशुरामजी ने उसका वध कर दिया.
वे सभी अंहकार के वश में आ गए थे. तुम्हारे वचनों ने मुझे पथभ्रष्ट होने से रोका. उत्तम जीवनसंगिनी सदा अपने पति को धर्म के मार्द पर ले जाती हुई मोक्ष प्रदान करती है. मैं तत्काल ब्राह्मण के दर्शन को जाता हूं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
पद्मनाभ ने ब्राह्मण को प्रणाम कर कहा- मैं ही पद्मनाभ हूं. मेरे लिए क्या आदेश है. ब्राह्मण ने कहा- आप भगवान सूर्य के परमप्रिय हैं. ऐसी कोई बात बताइए जो आपने सूर्य में देखी हो.
पद्मनाभ बोला- एक दिन भगवन संसार को अपने तेज से तपा रहे थे. उसी समय सूर्य के समान तेज वाला एक व्यक्ति दिखाई दिया जो अपने तेज से अंधकार को चीर रहा था.
भगवान भास्कर ने अपनी दोनों भुजाएं उसके स्वागत में फैला दीं. वह तेज उनकी किरणों में समाकर एकाकार हो गया. मैंने भगवान से पूछा कि यह दूसरे सूर्य कौन थे?
सूर्यदेव ने कहा- वह एक सिद्ध मुनि थे. जीवन की सभी आसक्तियों का त्यागकर वह सदा ध्यानमग्न रहे और महादेव की आराधना करते रहे. उसने कभी भी ऐसे अन्न का एक दाना भी न लिया था जिसे प्राप्त करने में किसी भी शील वृत्ति का हनन हुआ हो.
ऐसे तपस्वी देवतुल्य और देवताओं से भी श्रेष्ठ हो जाते हैं. ऐसे लोगों को उत्तम गति प्राप्त होती है और मैं स्वयं सहर्ष उनको स्वीकार करके स्वयं को धन्य करता हूं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
नागराज की बात सुनकर ब्राह्मण उठा और उनकी आज्ञा लेकर चलने लगा. उसने कहा- मैं आत्मज्ञान के लिए भटक रहा था. ज्ञान जिसके पास भी उसे प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए.
आप नागकुल के हैं और मैं मानव, किंतु आपने जो मुझे ज्ञान दिया वह श्रेष्ठ है. अब मैं भी आपके ज्ञान के अनुसार चित्त को स्थिर करके साधना और स्वाध्याय में लगूंगा.
भीष्म पितामह बोले- युधिष्ठिर मैंने तुम्हें यह कथा इसलिए सुनाई ताकि तुमको कभी भी स्वयं के चक्रवर्ती सम्राट होने का अभिमान न हो. हमेशा सदगुणों के स्वागत के लिए तैयार रहना चाहे वह किसी निकृष्ट से ही क्यों न प्राप्त होते हों.
जातीय अहंकार और जातीय द्वेष ये दोनों अवगुण मानव को अविवेक की ओर धकेलते हैं जिसके कारण वह सभी सदगुणों से हीन होकर दुर्गति को प्राप्त करता है. उस समय पर कोई सच्चा मित्र या गुरू ही मार्द दिखाता है जैसे पद्मनाभ की पत्नी ने उसे अधर्म से रोका.
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संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्