कार्तिक स्नान का विधान क्या है? कार्तिक माहात्म्यः पांचवां अध्याय

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पिछली कथा से आगे…
कथा सुनने के बाद पृथु बोले- हे मुनि आपने कार्तिक के महाफल का सुंदर वर्णन किया है. अब स्नान की विधि और इसके नियम भी कहिए. यह सुनकर नारदजी प्रसन्न हुए.
नारदजी बोले- हे राजन, आप श्रीविष्णु के अंश से उत्पन्न हुए हैं, आपसे कोई बात छुपी नहीं है. फिर भी आपने पूछा तो मैं आपके समक्ष नियमों का वर्णन करता हूं. आश्विन मास में शुक्लपक्ष की एकादशी से सावधान होकर कार्तिक के व्रतों को प्रारंभ करें.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.पहर भर रात्रि रहे तो प्रतिदिन उठें. शौचादि से निवृत होकर दातुन लाते समय वृक्ष से कहें- हे वनस्पति हमको आयु, बल, यश, तेज, संतान, द्रव्य, वेदपाठ की शक्ति और बुद्धि दें. इस मंत्र को पढञकर गूलर आदि किसी दूध के वृक्ष की बारह अंगुल लंबी दातुन लाएं.
व्रत के दिन ऐसा न करें. प्रतिपदा, अमावस्या, नवमी, षष्ठी तिथियों और सूर्यवार तथा चंद्र व सूर्य ग्रहण के दिन दातुन न करें. कटेरी, संभालू, कपास, पीपल, वट, अरंड और गंधहीन वृक्षों का दातुन न करें.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इसके बाद श्रीविष्णु और महादेवके मंदिर में प्रसन्नता और विधिपूर्वक पुष्प, गंध, तांबूल ले जाएं. वहां भगवान की पाद्य आदि से स्तुति करके नमस्कार करें व भजन गाएं. देवालय में भजन करने वाले विष्णुस्वरूप होते हैं.
जैसे सतयुग में तप, ज्ञान, यज्ञ, दान आदि से भगवान प्रसन्न होते हैं वैसे ही कलियुग में भक्तिपूर्वक भजन मोक्ष प्रदान करने वाले हैं.
नारदजी बोले- सिरस, धतूरा, कटेर, मल्लिका, सेमर, आक, कनेर के फूल तथा अक्षतोंसे भगवान विष्णु की पूजा नहीं होती. जयकुंद, सिरस, चमेली, मालती, केतकी आदि के फूलों से सूर्य की पूजा करने से लक्ष्मी की हानि होती है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.यथायोग्य विधि से ही देवताओं की पूजा करके भगवान से क्षमा प्रार्थना करें- हे सुरेश्वर! हे देव! मैंने मंत्रहीन और क्रियाहीन होकर किंतु भक्तिसे भरकर पूजा की है. मेरी पूजा पूर्ण हो और आप इसे स्वीकार करें. फिर प्रदक्षिणा करके दंडवत कर लें.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.कार्तिक मास में जो विधिपूर्वक नारायण और महादेव की पूजा करते हैं वे अपने पूर्वजों सहित निष्पाप होकर बैकुंठ को जाते हैं. कथा जारी रहेगी. सातवां अध्याय कुछ ही देर में पढें.
संकलन व संपादन- राजन प्रकाश
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