एक पितृभक्त जिस पर मुग्ध हो गए यमराज
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वाजश्रवा के पुत्र उद्दालक विश्वजीत यज्ञ कर रहे थे. उद्दालक ने अपनी सारी संपत्ति दान कर दी थी. उनकी संपत्ति में वे गाएं भी थीं जो न तो दुधारू थीं और न ही स्वस्थ.
उद्दालक के पुत्र थे नचिकेता. एक बार उद्दालक ने नचिकेता को कहा था कि ऐसी गाएं जिनका दान करना उचित नहीं, अगर उनका दान किया जाए तो उस दान से मंगल के स्थान अमंगल होता है.
नचिकेता इस विचार से अधीर हो उठे क्योंकि दान की गाएं दान के लिए उपयुक्त न थीं. पिता का कहीं कोई अमंगल न हो जाए इस चिंता से दुखी नचिकेता ने सम्मान के साथ उद्दालक से कहा- पिताजी! मैं भी आपका धन हूं, मुझे किसे दान कर रहे हैं?
उद्दालक ने बात अनसुनी कर दी लेकिन नचिकेता बार-बार वही प्रश्न करते रहे- पिताजी! पुत्र सबसे बड़ी संपत्ति होता है, इसलिए मुझे किसे दान कर रहे हैं?
तीसरी बार पूछ्ने पर उद्दालक चिढ़ गए.
क्रोधित होकर बोले– मैं तुम्हें मृत्यु को देता हूं. नचिकेता जरा भी विचलित नहीं हुए.
उन्होंने उद्दालक से कहा -‘शरीर नश्वर है, पर सदाचरण सर्वोपरि. अपने वचन की रक्षा के लिए मुझे यम लोग जाने की आज्ञा दें.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उद्दालक को अब पछतावा होने लगा कि क्रोध में उन्होंने यह क्या कर दिया. परंतु विवश थे.
नचिकेता पिता की आज्ञा लेकर यमपुरी के लिए चले. काल से पूर्व ऐसे तपस्वी को आया देखकर स्वयं यमराज कांप उठे.
नचिकेता यम के द्वार पर बैठे रहे. यमराज धर्मसंकट में थे. समय से पूर्व वह नचिकेता को स्थान दे नहीं सकते थे और किसी अग्नितुल्य तेजस्वी ॠषिकुमार का स्वागत नहीं करते तो उससे भी दोष के भागी होते.
इसी उलझन में यमराज फंसे रहे और नचिकेता ने बिना अन्न-जल ग्रहण किए तीन रात यमपुरी के द्वार पर बिता दिए. हारकर यम स्वयं जल से भरा स्वर्ण-कलश अपने ही हाथों में लिए दौड़े.
उन्होंने नचिकेता के पांव पखारे फिर कहा- हे तपस्वी कुमार! पूज्य अतिथि होकर भी आपने मेरे द्वार पर तीन रात्रियां निराहार बिता दीं. यह मुझसे बड़ा अपराध हो गया. आप प्रत्येक रात्रि के लिए एक-एक वर मुझसे मांग लें.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.यम के अनुरोध पर नचिकेता ने तीन वर मांगे. पहला वर मांगा- प्रभो! मेरे पिता मेरे प्रति क्रोध रहित हो जाएं और जब मैं यहां से लौटकर घर जाऊं, तब वे मुझे पहचानकर पुत्रवत आचरण करें.
दूसरा वर मांगा- स्वर्ग के साधनभूत अग्नि ही स्वर्ग में अमृतत्त्व-देवत्व को प्राप्त करने में सहायक होते हैं. मैं उस अग्नितत्व का संपूर्ण रहस्य जानना चाहता हूं.
अल्पायु नचिकेता की तीव्र बुद्धि और अद्भुत जिज्ञासु आचरण से यमराज प्रसन्न हुए.
वह बोले- अग्नि अनन्त स्वर्ग-लोक की प्राप्ति का साधन है. यही विराट रूप से जगत की प्रतिष्ठा का मूल कारण है. उसे विद्वानों की बुद्धिरूप में स्थित मानिए.
यज्ञ की अग्नि प्रज्जवलित करने की सारी अव्यक्त विधियां समजाने के बाद यम ने द्वितीय वर स्वरूप कहा- ‘मैने जिस अग्नि का मर्म आपको बताया वह आपके ही नाम से प्रसिद्ध होगी. आप यह दिव्य रत्नों वाली माला भी ग्रहण करें.
अब तीसरा वर मांगिए. नचिकेता ने मांगा- आपने मुझे स्वर्ग का मार्ग बताया. आप मृत्यु के देवता हैं. आत्मा अदृश्य है. अत: मैं आपसे वही आत्मतत्व जानना चाहता हूं.
यम झिझके. उन्होने कहा- हे ऋषिकुमार आत्म-विद्या साधारण विद्या नहीं. अभी आप कुमार हैं. इसलिए इस विद्या के लिए समय उपयुक्त नहीं. आप चाहें तो इसके स्थान पर मनचाहा वर मांग लें.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.परंतु नचिकेता तो अड़े रहे. यम ने नचिकेता का ध्यान भटकाने के लिए भुवन मोहन अस्त्र का प्रयोग किया. सुर-दुर्लभ सुन्दरियां और समस्त भोग-सामग्रियों का प्रलोभन दिया, पर नचिकेता अडिग रहे.
आखिर यम हार गए. यमराज ने समझ लिया कि यह बालक सचमुच उस ज्ञान को प्राप्त करने का अधिकारी है.
यमराज ने नचिकेता के वैराग्य और भोग-विलास के प्रति अनासक्ति की प्रशंसा की फिर बोले- आप बड़े भाग्यवान हैं. विवेकशील और वैराग्य सम्पन्न पुरुष ही ब्रह्म ज्ञान प्राप्ति के अधिकारी हैं. आप उसके योग्य हैं.
यम ने कहा- आत्मा चेतन है. न जन्मता है, न मरता है. न किसी से उत्पन्न हुआ है और न इससे कोई उत्पन्न होता है. यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और सनातन है तथा शरीर के नष्ट होने पर भी बना रहता है.
यम ने कहा- वह न तो वेद के प्रवचन से प्राप्त होता है न विशाल बुद्धि से मिलता है और न केवल जन्म भर शास्त्रों के श्रवण से ही मिलता है. वह उन्हीं को प्राप्त होता है जिनकी वासनाएं शान्त हो चुकी हैं, कामनाएं मिट चुकी हैं.
आत्म-ज्ञान प्राप्त करने के बाद नचिकेता पृथ्वी पर लौटे तो समस्त तपस्वी समुदाय उनके स्वागत के लिए खड़ा था.
ऋषियों ने कहा- पिता को अनिष्ट रोकने और स्वयं मृत्यु को प्रसन्न कर आत्मा का दिव्य रहस्य प्राप्त करने वाले नचिकेता की पितृभक्ति की कथा तब तक गाई जाएगी जब तक संसार है.
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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