अस्त्र त्यागने के हजारों वर्ष बाद शिवजी से क्यों भिड़ गए थे परशुरामः अनसुनी कथा

अस्त्र त्यागने के हजारों वर्ष बाद शिवजी से क्यों भिड़ गए थे परशुरामः अनसुनी कथा

parshuram-photo-1200x800

पौराणिक कथाएँ, व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र, गीता ज्ञान-अमृत, श्रीराम शलाका प्रशनावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ने के हमारा लोकप्रिय ऐप्प “प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प” डाउनलोड करें.
Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें

हमारा फेसबुक पेज लाइक कर लें इससे आपको प्रभु शरणम् के पोस्ट की सूचना मिलती रहेगी. इस लाइन के नीचे हमारे फेसबुक पेज का लिंक है उसे क्लिक करके लाइक कर लें.परशुरामजी ने हैहयवंशी क्षत्रियों का वध क्यों किया यह कथा सर्वविदित है. आज मैं आपको श्रीपरशुरामजी की कुछ ऐसी कथाएं सुनाता हूं जो आपने शायद न सुनी हैं.

श्रीपरशुरामजी की कथा की शृंखला प्रभु शरणम् एप्प में चली थी जिसमें 15 भाग में हमने उनकी संक्षिप्त जीवनी, साधना और युद्धों का वर्णन किया था. उस शृंखला के पोस्ट में से ही ही एक कथा लेकर आए हैं. आप प्रभु शरणम् एप्प डाउनलोड कर लें. हम जल्द ही परशुरामजी की कथा शृंखला पुनः प्रकाशित करेंगे.

समंतपंचका में परशुरामजी ने अंतिम युद्ध लड़ा. यहीं पर हजारों क्षत्रपों की बलि दी और उनके खून से पांच तालाब भरे. यह सब करने के बाद उन्होंने अपना रक्तरंजित परशु धोया एवं शस्त्र नीचे रखे था. संहार और हिंसा से वे थक गये थे.

परशुरामजी ने 21 बार अभियान चला कर धरती के अधिकांश राजाओं को जीत लिया था. बहुत से भयभीत होकर उनके शरणागत थे. कुछ ने रनिवासों में छुपकर जान बचाई. कुछ ने ब्राह्मणों के घरों में आश्रय लिया और छुपकर रहे.

हैहयवंशीय वीतिहोत्र ने रनिवास में घुसकर जान बचाई थी. उसके वंश के कुछ पुरुष दधीचि के आश्रम में छिप गए. इस तरह उनकी जान बच पाई. पर अब ये भगोड़े क्षत्रप न रह गये थे.

पृथ्वी के सातों द्वीपों पर अब परशुराम का एकछत्र राज था. एक तरह से पृथ्वी क्षत्रपों से खाली हो गई थी. परशुराम के सभी उद्देश्य पूरे हो चुके थे. भूमंडल पर राज्यों को जीतने के कारण उन्हें अश्वमेध यज्ञ का अधिकार प्राप्त हुआ.ऐसे में परशुराम ने पितरों को दिया अपना वचन पूरा करने की सोची. खून से भरे तालाबों में से नहाकर निकले परशुराम ने जब पितरों को अपने शत्रुओं के रक्त से अर्ध्य दिया था तो वे उपस्थित हो गये थे.

उन्होंने परशुरामजी की वीरता की सराहना करने के साथ कहा कि प्रतिशोध और हिंसा ठीक नहीं. पितरों ने परशुराम को आदेश दिया कि तुम अपने इस कर्म का प्रायश्चित्त करो. पहले इसका समापन यज्ञ करो, दान दो फिर तीर्थयात्रा के बाद तप करो.

परशुरामजी को यह भली भांति याद था. परशुराम ने सबसे पहले विश्वजेता और फिर अश्वमेध यज्ञ करने की ठानी. विश्वजेता यज्ञ सफलता पूर्वक संपन्न कराया और उसके बाद सबसे बड़े अश्वमेध यज्ञ की तैयारी की.

समूची धरती के स्वामी का यज्ञ था सो इसे अति विशाल स्तर पर होना था. यज्ञ में सभी ऋषि, मुनि और छोटे-छोटे राजा आए. कश्यप मुनि यज्ञ के मुख्य पुरोहित बने. यज्ञ पूरा होने के बाद परशुराम की बारी दक्षिणा देने की थी.

परशुरामजी ने सबसे पहले महर्षि कश्यप से पूछा कि उन्हें क्या दक्षिणा चाहिए? कश्यप चाहते थे कि परशुराम धरती से दूर रहें. उन्हें भय था कि बचे-खुचे क्षत्रप पुनः सक्रिय होंगे. उन्होंने यदि फिर से कुछ अनुचित किया तो परशुराम एक बार फिर रक्तपात को तैयार हो जाएंगे.

कश्यप ने परशुराम से कहा- मुझे आपके द्वारा जीती हुई सारी धरती चाहिए.परशुरामजी ने सातों द्वीप वाली धरती कश्यप को दान कर दी. परशुराम को पितरों को दिए वचन अनुसार तीर्थाटन और तप को जाना था. ऐसे में कश्यप के संरक्षण में पृथ्वी जाने से वह प्रसन्न थे.

अब यज्ञ कराने में सहायता देने वाले शेष ब्राहमणों को भी दक्षिणा देनी थी. समूची धरती तो कश्यप की हो चुकी थी. उनको परशुराम क्या देते?

कश्यप मुनि ने इसका हल निकाला और यज्ञ के लिए बनी कई सौ क्विंटल की सोने की वेदिका को तोड़कर सभी में बांट दिया गया.

काश्यप मुनि ने परशुराम को आशीर्वाद ही नहीं प्रसन्न होकर भगवान विष्णु का एक अमोघ मंत्र भी दिया.

फिर कश्यप बोले- तुमने यह सारी पृथ्वी मुझे दान कर दी है. अब इस पर रहने का तुम्हारा कोई अधिकार नहीं. तुम एक दिन भी अब इस पर मत रहो.

इसके बाद वह दक्षिण समुद्र तट की ओर चले गए. सह्याद्रि पर्वत से उन्होंने समुद्र में अपना परशु फेंककर समुद्र से कहा कि जहां तक उनका फरसा गया है कम से कम वहां तक समुद्र पीछे हटे.

परशुरामजी के आदेश पर समुद्र ने एक लंबा तटवर्ती क्षेत्र खाली कर दिया. भड़ौंच से कन्याकुमारी तक के दान या भेंट में प्राप्त समुद्र तटीय प्रदेश को शूर्पारक कहा गया.बाद में परशुरामजी और उनके संगियों ने यह क्षेत्र बसाया और यह परशुरामक्षेत्र कहलाया. मुंबई का सोपारा क्षेत्र इसी के अंतर्गत है.

कश्यप की आज्ञा थी कि एक दिन भी पृथ्वी पर नहीं रहना है इसलिए परशुराम ने निर्णय कर लिया था कि अब वे धरती पर दिन में तो रहेंगे पर रात महेंद्र पर्वत पर गुजारेंगे.

वे रात होने से पहले मन के वेग से कुछ ही क्षणों में महेंद्र पर्वत पहुंच जाते.

परशुराम के कानों में पितरों का वह वाक्य गूंजता- बेटा! सार्वभौम राजा का वध ब्राह्मण की हत्या से भी बढ़कर है. जाओ, भगवान का स्मरण करते हुए तीर्थों का सेवन करके अपने पापों को धो डालो’.

परशुराम तीर्थाटन को निकले तभी उन्हें अपने गुरू भगवान शिव के वे वचन याद आए जो शिवजी ने शिक्षा देने के दौरान कहे थे. परशुराम उन दिनों शिवजी से शिक्षा प्राप्त कर रहे थे.

शिवजी शिष्यों को परखने के लिए समय-समय पर उनकी परीक्षा लिया करते थे. एक दिन परखने के लिए गुरु ने शिष्यों को नीति के विरुद्ध कुछ कार्य करने का आदेश दिया. परशुराम को छोड़ सभी छात्र संकोच में दब गए.

परंतु परशुराम ने गुरु से साफ-साफ कह दिया कि वह ऐसा कोई कार्य नहीं करेंगे जो नीति विरूद्ध हो. वह लड़ने को खड़े हो गये और समझाने-बुझाने से भी न माने. शिवजी से ही भिड़ गये.परशुराम ने शिवजी पर उनके ही दिए फरसे से प्रहार कर दिया. शिवजी को अपने फरसे का भी मान रखना था सो उन्होंने चोट खा ली. चोट गहरी लगी. शिवजी का मस्तक फट गया. शिवजी के एक नाम ‘खण्डपरशु’ का यही रहस्य है.

शिवजी ने इसके लिए बुरा न माना बल्कि परशुराम को छाती से लगा लिया और कहा- अन्याय करने वाला चाहे कितना बड़ा क्यों न हो, धर्मशील व्यक्ति को अन्याय के विरूद्ध खड़ा होना चाहिए. यह उसका कर्त्तव्य है. संसार से अधर्म मिटाने से मिटेगा, सहने से नहीं.

शिवजी ने अपने सभी शिष्यों से यह भी कह था कि- बालकों! केवल दान, धर्म, जप, तप, व्रत, उपवास ही धर्म के लक्षण नहीं हैं. अन्याय, अधर्म से लड़ना भी धर्म साधना का एक अंग है.

परशुराम ने तीर्थों का सेवन करने बाद भगवान दत्तात्रेय से षोड़षी मंत्र की दीक्षा ली और स्थाई रूप से महेंद्र पर्वत पर आश्रम बना कर माता त्रिपुरसुंदरी को प्रसन्न करने के लिए घोर तप में रम गये.

परंतु जब सीताजी के स्वयंवर में शिवजी का धनुष टूटा तो वह पुनः क्रोधित होकर उपस्थित हुए. भगवान राम ने उनकी चुनौती स्वीकार कर उनके धनुष की डोरी चढा दी थी.इस घटना से महायोद्धा परशुराम का सारा घमंड सबके सामने चूर चूर हो गया था. सीता-स्वयंवर में जो कुछ भी हुआ परशुराम उससे बड़े खिन्न और दुखी थे.

परशुराम ने अपने पहले किये गये कामों को देखा तो उन्हें लगा कि इतनी वीरता दिखाने, हिंसा करने, जन्म से ब्राह्मण होने के बावजूद क्षत्रियों जैसा आचरण अपनाने का कुल नतीजा केवल इतना ही मिला कि आज एक क्षत्रिय राजकुमार ने मुझे सबके सामने नीचा दिखा दिया.

उनका मन इतना उद्विग्न था कि वह भगवान को पहचान ही नहीं पा रहे थे. उन्हें साधारण राजकुमार ही समझ रहे थे.

परशुराम ने फैसला कर लिया कि अब वह हथियारों को हाथ न लगायेंगे. धनुष बाण फरसा, तलवार जैसे अस्त्र शस्त्र छोड़ शास्त्र की शरण में जायेंगे. बल तो है ही ज्ञान भी लेंगे, पहले जो पाप हो गये उनके पछतावे के लिये कठोर तप करेंगे.

शास्त्रों की शिक्षा बिना गुरु के कैसे होगी? ऐसा सोचते हुए वे किसी योग्य गुरू की तलाश में निकल पड़े.

रास्ते में उन्हें एक अधपगला सा साधु मिला. यह दिखता तो अस्तव्यस्त था पर उसके चेहरे पर अद्भुत तेज था. परशुराम को लगा इससे कुछ बातचीत करनी चाहिये.

परशुराम ने उससे उसका नाम इत्यादि पूछा तो उसने परशुराम में कोई रुचि न दिखाई. परशुराम का स्वभाव पहले ही जैसा था.अपनी उपेक्षा देख वे साधु पर भड़क उठे और उसे बुरा भला कहने लगे. साधु सब सुनता रहा पर बोला कुछ नहीं.

परशुराम को लगा हो न हो यह कोई बहुत पहुंचा हुआ तपस्वी है इसलिये हाथ जोड़ कर अपना पूरा परिचय देने के बाद बोले, मुनिवर स्वभाववश मैंने कुछ गलत कह दिया हो तो मेरी गलती क्षमा करें और मुझे कोई बेहतर गुरु मिल सके ऐसा रास्ता दिखाइये.

साधु बोला, मैं देवगुरु वृहस्पति का भाई संवर्त हूं, लगातार तपस्या में लगे रहने के चलते नहीं चाहता कि कोई मेरा ध्यान भटकाये सो इस तरह पागल सा बना रहता हूं. फिलहाल मेरे पास तुम्हें ज्ञान उपदेश देने का समय नहीं है. तुम गंधमादन पर्वत पर दत्तात्रेय के पास जाओ.

परशुराम गंधमादन की ओर चल पड़े. उन्हें पता चला कि दत्तात्रेय मां त्रिपुर सुंदरी के साधक हैं. उन्होंने सोचा मां त्रिपुर सुंदरी तंत्र और शक्ति की देवी हैं, मैं शक्ति साधक रहा हूं मुझे दत्तात्रेय से दीक्षा लेना बहुत बढिया रहेगा.

गंधमादन पर दत्तात्रेय मुनि का आश्रम बहुत विशाल और सुंदर था. परशुराम आश्रम पहुंचकर दत्तात्रेय मुनि की कुटिया के भीतर चले गये. वहां परशुराम ने देखा कि मुनि एक बेहद सुंदर युवती के साथ बैठे हैं और सामने ही मदिरा भरा बड़ा सा पात्र रखा है.परशुराम ने सोचा, अरे यह मैं कहां आ गया, ऐसे गुरु से क्या कल्याण होगा. वे पीछे मुड़ने ही वाले थे कि हंसने के साथ किसी ने उन्हें पुकारा, आओ, आओ परशुराम, हिचको नहीं. तुम्हें संवर्त ने मेरे पास भेजा है न. कल्याण की लालसा से आये हो. आओ बैठो.

परशुराम सकुचाते हुये भीतर आये, बैठ गये. पर शंका के भाव उनके चेहरे से अभी गया नहीं था. दत्तात्रेय बोले, जिन चीजों को तुम देख रहे हो परशुराम, इस आश्रम के बहुत से साधु और साधक उसे देखकर आश्रम छोड़ कर कर चले गये. मैंने उन्हें नहीं रोका. उनमें श्रद्धा की घोर कमी थी.

तुम श्रद्धा भाव ले कर आये हो, श्रद्धा का मतलब है कि जिसके प्रति श्रद्धा हो उसके दोष देखने की बुद्धि ही उत्पन्न न होने दो. इसलिये तुम इन पर ध्यान न दो. संसार में मुक्ति का रास्ता एक ही है. अपनी इंद्रियों को वश या नियंत्रण में रखना.

यह सब चीजें मैं अपने पास इसलिये रखता हूं कि इनके करीब होने पर भी मैं अपनी इंद्रियों को अपने वश में रख सकूं. इंद्रियों को जीत लिया तो समझो सब जीत लिया. सचाई जानकर परशुराम मुनि दत्तात्रेय के चरणों में गिर पड़े.

दत्तात्रेय ने परशुराम को समझाया कि मां त्रिपुर सुंदरी की आराधना में लग जाओ. वही तुम्हारे सारे मनोरथ पूरे करेंगी. उन्होंने परशुराम को मां त्रिपुर सुंदरी की उपासना की तांत्रिक विधि,रहस्य समझाये, तत्वज्ञान दिया और दीक्षा तथा आशीर्वाद दे कर एकांत साधना के लिये महेंद्र पर्वत पर भेज दिया.
स्रोत: त्रिपुर रहस्य, (Pic courtsey, MaaDurgawallpaper)
अपीलः
यदि आपको लगता है हमारी बात- ईश्वर से डरें नहीं उनसे प्रेम करें सही है और आप भी इसी में विश्वास रखते हैं तो आप प्रभु शरणम् से जुड़ जाएं. हम इसी प्रकार से ईश्वर की भक्तिरस का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं. वर्तमान समय की यही आवश्यकता है. आप प्रभु शरणम् एप्प डाउनलोड कर लें और हमारा फेसबुक पेज भी जरूर लाइक करें.

आप इसे ऐसे समझें कि जो ईश्वर की स्तुति का अभियान चला रहे हैं उसमें आपकी ओर से ये श्रद्धा पुष्प होंगे. आप दिनभर इंटरनेट यूज करते हैं. कुछ डेटा धार्मिक ज्ञान के लिए खर्च की जाए तो क्या हर्ज है.

एप्प का लिंक और फेसबुक पेज का लिंक दोनों ही पोस्ट की शुरूआत में भी था, फिर से दे रहे हैं. अक्षय तृतीया ऐसे शुभ कार्यों के लिए एक शुभ दिवस है.

प्रभु शरणम् की सारी कहानियां Android व iOS मोबाइल एप्प पे पब्लिश होती है। इनस्टॉल करने के लिए लिंक को क्लिक करें:
Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें

फेसबुक पेज लाइक करें-ये भी पढ़ें-

अक्षय तृतीयाः सोना खरीदने नहीं, सोना बनने का पर्व

बच्चों के सामने ईश्वर को कोसकर अपने बच्चे का कितना नुकसान किया कोई अंदाजा है!

पराया धन ढेला समानः सुंदर गुणों के विकास के लिए उपमन्यु की कथा बच्चों को सुनाएं