कलियुग करेगा बुद्धिभ्रष्ट, सत्कर्म से मिटेंगे कष्टः सनकादि ऋषियों ने दिया नारद को ज्ञान- जरूर पढ़ें

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हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.कलियुग का प्रवेश हो चुका था. नारदजी पृथ्वी पर कलियुग का चक्र देख रहे थे. कलि का प्रभाव देखकर उनके मन में तरह-तरह के भाव आ रहे थे. भटकते-भटकते वह नर्मदा क्षेत्र में पहुंचे.
वहां विचरते हुए नारदजी को एक रोती हुई युवती दिखी. उस युवती के पास ही दो पुरुष मूर्च्छित पड़े थे. नारदजी उसके पास गए और रोने का कारण पूछा.
स्त्री बोली- मैं भक्ति हूं. ये दोनों, मेरे पुत्र ज्ञान और वैराग्य हैं. ये असमय ही बूढ़े हो गए और अब मूर्च्छित पड़े हैं. आप इनकी मूर्च्छा दूर कर सकते हैं?
नारदजी को उस पर दया आ गई. उन्होंने भगवान का आह्वान किया और स्त्री का कष्ट दूर करने की याचना की.
परमात्मा ने आकाशवाणी की- मात्र आपकी प्रार्थना से इनकी मूर्च्छा दूर न होगी. कलियुग में यदि ज्ञान व वैराग्य को स्थापित करना है तो संतों से परामर्श, सत्संग और सत्कर्म करना होगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.नारदजी सत्संग के लिए बद्रीधाम की ओर चले और सनकादि मुनियों से मिलकर अपनी दुविधा रखी. उनकी भावना जानकर ऋषिगण प्रसन्न हो गए और उन्हें उपदेश दिया.
आपकी भावना दिव्य है. कलि के प्रभाव से ज्ञान और वैराग्य तो अचेत होंगे ही लेकिन इनको दूर करने का भी उपाय है-अच्छे कर्म. कलि लोगों को कर्मों से भटकाएगा और फिर पाप में फंसाकर दुखी करेगा.
एकमात्र निवारण है अच्छे कर्म करना. इसकी राह आपको सत्संग से मिलेगी. आप वेदों, शास्त्रों, धर्मग्रंथों का कथा के माध्यम से प्रचार करें. इससे ही मनुष्य के भटकते मन में समय-समय पर प्रेरणा जागृत होगी. तबसे नारदजी घूम-घूमकर प्रचार कर रहे हैं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.मित्रों, आपने अनुभव किया हो कि हमें अपने किसी अनुचित कार्य का पछतावा तभी होता है जब हम मंदिरों या सत्संग आदि को जाते हैं. कलियुग में बुद्धि को भ्रष्ट होने से बचाए रखना का एकमात्र साधन है- शास्त्रों का ज्ञान, सत्संग और सतकर्म.
इनसे मन को शांति और सही मार्ग मिलता है. यदि आपको जीवन में एक पल के लिए भी ऐसी अनुभूति हुई हो कि शास्त्रों से जुड़कर आपमें कुछ सकारात्मक भाव आए थे, तो उसे जाग्रत रखिए, नारदजी की तरह धर्म का प्रचार करिए.
प्रभु शरणम् वही तो कर रहा है. धर्म के तत्वों को छोटे-छोटे अंशों में दे रहा है. आप इससे लोगों को जोड़ते रहें, यह भी सत्कर्म है. इस धर्मकार्य में सहयोगी बनें.
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– राजन प्रकाश