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युद्ध में हारते देवताओं को बृहस्पति ने दिया एक विजय सूत्र, श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया उस सूत्र का महात्मय

युद्ध में हारते देवताओं को बृहस्पति ने दिया एक विजय सूत्र, श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया उस सूत्र का महात्मय

radhekrishna
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एक बार भगवान श्रीकृष्ण और महाराज युधिष्ठिर में वार्ता चल रही थी. युधिष्ठिर भगवान से अपनी शंकाओं के निवारण के लिए प्रश्न पूछ रहे थे. उन्होंने युद्ध और नीति कौशल से जुड़े प्रश्नों के साथ-साथ व्यक्तिगत तथा समाजहित के प्रश्न पूछे.

युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा- भगवन! शौर्य और बल के अतिरिक्त क्या कोई ऐसा उपाय भी है जो मनुष्य की रक्षा के लिए विशेष रूप से फलदायी हो?

श्रीकृष्ण बोले– महाराज! रक्षासूत्र एक ऐसा उपाय है जिससे भी विजय, आरोग्य और सुख प्राप्ति संभव है. क्या आपने इस संदर्भ में शची और इंद्र की कथा नहीं सुनी?

युधिष्ठिर के अनुरोध पर भगवान ने उन्हें रक्षासूत्र बनाने और उसे धारण करने के बारे में बताकर शची और इंद्र के संदर्भ के साथ रक्षासूत्र का महत्व स्थापित करने वाली कहानी सुनानी शुरू की.

भगवन बोले- देवताओं और असुरों में आए दिन संग्राम होते रहते थे. कई बार असुर भी इस संग्राम में विजयी हुए हैं. एक बार ऐसा ही होने वाला था, असुर देवताओं पर भारी पड़ रहे थे और प्रतीत होता था कि वे संग्राम में विजयी हो जाएंगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.अनवरत बारह साल तक चले युद्ध के अंतिम चरण में देवताओं ने युद्ध को जीत लिया. दैत्यों, असुरों का दांव नहीं चला और वे जीतते-जीतते भी देवताओं से पराजित हो गए.

दु:खी होकर सभी असुर नायक सेनापति दैत्यराज बलि की अगुआई में गुरु शुक्राचार्य जी के पास गए और अपनी पराजय का पूरा वृतांत बतलाया. असुरों ने कहा- हम जीत रहे थे परंतु न जाने कैसे देवता जीत गए. हमको इसका बहुत दुख है.

शुक्राचार्य बोले-आप सब वीरता से लड़े. आपका दुख अकारण है. महान योद्धाओं को दुख नहीं करना चाहिए. काल की गति से जय-पराजय तो होती ही रहती है. जय पराजय की चिंता छोड़ भविष्य की रणनीति पर कार्य करे. पराजय से मिली सीख की भी बड़ी भूमिका होती है.

दैत्यराज बलि ने कहा- गुरुवर, यदि हमें पराजय के मूल कारणों का पता लग जाए तो हम अभेद्य रणनीति तैयार कर सकते हैं, पर हम अभी तक नहीं जान सके कि हम पराजित क्यों हुए. कृपया आप हमारा मार्गदर्शन करें.

शुक्राचार्य ने असुरो को संबोधित करते हुए कहा- जब युद्ध का बारहवां वर्ष चल रहा था और अंतिम चरण में देवताओं की पराजय सुनिश्चित होने लगी तो इंद्र को पराजय का भय सताने लगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इंद्र भयभीत हो कर गुरु बृहस्पति के पास पहुंचे. उन्होंने अपनी रणनीति की समीक्षा करने को और सिर पर आ पहुंची पराजय से बचने का उपाय सुझाने का अनुरोध किया. युद्ध ऐसी स्थिति में पहुंच चुका था कि वह भी कुछ नहीं कर सकते थे.

फिर बृहस्पति ने सुझाव दिया कि इंद्र की पत्नी शची विधि-विधान से व्रत करके रक्षासूत्र तैयार करे और श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के दिन उचित मंत्रों के साथ वह सूत्र इंद्र की दाहिनी कलाई में बांध दे. शायद इससे इंद्र को लाभ हो जाए.

दैत्यराज, शची ने बृहस्पति के कहे अनुसार इंद्र को रक्षासूत्र बांधकर देवताओं को अजेय बना दिया. फलस्वरुप इन्द्र सहित समस्त देवताओं की दानवों पर विजय हुई. उसी के तेज और प्रभाव से तुम सब इंद्र से परास्त हुए हो.

शुक्राचार्य ने समझाया- दानवेन्द्र! इस समय वर्ष भर के लिए तुम देवराज इंद्र के साथ संधि कर लो. एक वर्ष तक प्रतीक्षा करो. उसके बाद ही तुम्हारा कल्याण होगा.

शुक्राचार्य के वचन सुनकर सभी दानव निश्चिन्त हो गए कि इस प्रकार की संधि करने के पश्चात देवतागण अब वर्षभर बाद ही आक्रमण करेंगे तब तक हम और तैयारी कर सुनिश्चित विजय प्राप्त कर लेंगे. असुर उचित समय की प्रतीक्षा करने लगे.

श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा- रक्षासूत्र का मैंने विलक्षण प्रभाव आपको बताया. इससे विजय, सुख, पुत्र, आरोग्य और धन भी प्राप्त होता है. यह रक्षा विधान बाद में रक्षा-बंधन के रूप में आया और बहन अपने भाई से रक्षा का दायित्व लेने लगी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.राजा युधिष्ठिर ने पूछा– भगवन! जय प्रदान करने वाले इस रक्षासूत्र में ऐसी शक्ति क्यों आती है, यह जानने की भी इच्छा है. कृपया यह भी सुनाएं.

भगवान बोले– महाराज! दैत्यराज बलि ने शुक्राचार्य के मना करने पर भी जब वामन भगवान को उनकी इच्छानुसार तीन पग भूमि का दान देना स्वीकार किया तो वामन भगवान ने उन्हें वचनबद्ध किया ताकि वह अपने वचन से पीछे न हटें.

महान बलि ने दो पग में ही अपना सर्वस्व गंवा दिया. फिर भी विचलित नहीं हुए. तीसरा पग रखने के लिए बलि ने मस्तक आगे कर दिया था. श्रीहरि ने प्रसन्न होकर बलि को पाताल लोक में वास दिया और एक मन्वंतर में इंद्र होने का वरदान दिया.

स्वयं भगवान बलि की पहरेदारी करने लगे. भगवान ने बलि को सूत्र में बांध तो लिया किंतु उन्हें सर्वस्व प्रदान कर दिया. इसीलिए रक्षा सूत्र ऐसा बंधन है जो अभीष्ट प्रदान करता है.

इसी कारण रक्षासूत्र को बांधते समय यह मंत्र पढा जाता है- येन बद्धोबली राजा दानवेन्द्रो महाबल:। दानवेन्द्रो मा चल मा चल।।” यानी दानवों के महाबली राजा बलि जिससे बांधे गए थे, उसी से तुम्हें बांधता हूँ. हे रक्षासूत्र, तुम मेरे साथ रहो चलायमान न हो.

(संदर्भ: भविष्यपुराण, उत्तर पर्व एवं अन्य पुराण)

संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्

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