विक्रम-वेताल(किंकर) कथाः स्त्री-पुरुष दोनों के पाप में किसका पाप भारी, विक्रमादित्य का निर्णय? भाग-1

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वेताल बने रूद्रकिंकर ने राजा विक्रम को कहानी सुनानी शुरू की. भोगवती नगरी पर राजा रूपसेन का राज था. राजा बड़ा प्रजापालक और पक्षीप्रेमी था. चिन्तामणि नाम का एक तोता राजा का बड़ा प्रिय था.
एक दिन राजा ने चिन्तामणि से पूछा- हमारा ब्याह किसके साथ होगा? तोते ने कहा- मगधराज की बेटी के साथ. पक्षी की बात का क्या सो राजा ने ज्योतिषी को बुलाकर पूछा. उसने भी तोते की बात दुहरा दी.
अब मगध देश की बात सुनो. मगध के राजा की एक पुत्री मदनमञ्जरी बड़ी ही सुंदर थी. राजकुमारी भी पक्षियों को बहुत प्यार करती थी. उसके पास एक चंचल मैना थी.
एक दिन राजकुमारी ने उससे पूछा- मैना बता मेरा विवाह किसके साथ होगा? मैना ने उत्तर दिया कि भोगवती के राजा रूपसेन के साथ. राजकुमारी ने राजपुरोहित से पूछा तो उसने भी मैना जैसे बात ही कही.
अब जब बात इस स्तर तक पहुंच गयी तो दोनो राजपरिवारों में आपस में संपर्क हुआ इसके बाद दोनों का विधिवत विवाह भी हो गया. रानी अपने साथ अपनी प्यारी मैना भी लाई.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.राजकुमारी और राजकुमार राजा रानी बन गये. दोनों का आपसी प्रेम इतन प्रगाढ हुआ कि दोनों ने अपने तोता मैना की शादी कर दी. राजा-रानी ने तोता-मैना के ब्याह के बाद उन्हें एक ही बड़े पिंजड़े में रख दिया.
पास रहे तो प्यार बढा पर एक दिन तोता-मैना में तकरार हो गयी. मैना ने कहा- पुरुष बड़ा पापी, धोखेबाज और मक्कार होता है. तोते ने कहा- स्त्री तो स्वभाव से झूठी, लालची और हत्यारी होती है. दोनों का झगड़ा देखते ही देखते ही बढ़ गया.
पिंजरे से अधिकतर मधुर आवाजें ही आती थीं, पर आज तो बड़ी कर्कश और तेज आवाजें निकल रही थीं. राजा ने सुना तो पिंजरे के पास जाकर कहा- क्या बात है, तुम आपस में इस तरह लड़ते क्यों हो?
मैना ने कहा- महाराज, मर्द बड़े बुरे होते हैं. आप भी मर्द हैं. संभवत: मेरी बात का बुरा भी मानें और मेरे इस सत्य पर विश्वास न करें इस लिये मैं आपको एक कथा सुनाती हूं. इसके बाद मैना ने राजा को एक कहानी सुनायी.
महाधन नाम का एक सेठ इलापुर नगर में रहता था. उसका विवाह हुआ पर संतान नहीं,बहुत दिनों के बाद तमाम मनौतियों के पश्चात उसके घर एक लड़का पैदा हुआ. सेठ ने उसके लालन पालन में कोई कोर कसर नहीं उठा रखी थी.
अच्छे लालन-पालन पर भी लड़का बड़ा होकर बुरी संगत में पड़ कर जुआ खेलने लगा. इस बीच अचानक सेठ की मौत हो गई. उधर उसके जुआरी लड़के ने पिता द्वारा इकट्ठा सारा धन जुए में खो दिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.लड़के को कमाना तो आता न था. जब पास में कुछ न बचा तो वह इलापुर छोड़कर चन्द्रपुरी नगरी में चला गया. वहाँ के हेमगुप्त नाम के साहूकार का नाम उसने कभी पिता से सुन रखा था. उसने उसी के पास जाने का मन बनाया.
बहुत बूढे हो चुके हेमगुप्त के पास जाकर उसने अपने पिता का परिचय दिया और कहा कि मैं व्यापार को गया था. धन कमाया; लेकिन लौटते में समुद्र में भयंकर तूफ़ान आया. माल सहित जहाज़ डूब गया और मैं जैसे-तैसे बचकर यहाँ आ गया.
हेमगुप्त के एक लड़की थी रत्नावती. सेठ को बड़ी खुशी हुई कि घर बैठे इतना अच्छा लड़का मिल गया. उसने महाधन के बेटे से कहा कि वह निश्चिंत हो कर जब तक चाहे उसी के वहां रहे.
उस लड़के को अपने हेमगुप्त ने घर में रख लिया. महाधन के बेटे ने भी अपनी बुरी आदतें कुछ दिन रोके रखीं तो जल्द ही हेमगुप्त ने भी अवसर देख अपनी लड़की से उसका ब्याह कर दिया.
अब महाधन का बेटा उसका घर जमाई बन कर वहीं रहने लगा. पर ऐसा कब तक चलता. लड़्की ने भी कह कि वह ससुराल देखना चाहती है. लोग तो खैर ताने देते ही थे. महाधन आ बेटा भी मनमौजी का जीवन चाहता था. अन्त में एक दिन वे वहाँ से विदा हुए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.सेठ ने दोनों को बहुत-सा धन दिया और एक दासी को यात्रा में उनकी सेवा के लिये उनके साथ भेज दिया. कहार सब को पालकी में बिठा कर चल दिये. नगर से बाहर एक निर्जन रास्ते के बाद वन पड़ता था.
जंगल में आकर लड़के ने स्त्री से कहा- यहाँ डाकू हो सकते हैं, बहुत डर है, इससे पहले कि कोई ऐसी आशंका सकार रूप ले, वे हमें लूट लें, तुम अपने गहने उतारकर मेरी कमर में बाँध दो.
लड़की ने ऐसा ही किया, जंगल बीता. इसके बाद लड़के ने कहारों को धन देकर डोले को भी वापस करा दिया और दासी को मारकर कुएं में डाल दिया. सबसे निबटने के बाद स्त्री को भी एक अंधे कुएं में पटक कर आगे बढ़ गया.
कुएं में पड़ी रत्नावती अचेत पड़ी रही. चेतना लौटी तो वह रोने लगी. संयोग से एक यात्री उधर से जा रहा था. रोने की आवाज़ सुनकर वह वहाँ आया उसे कुएँ से निकाला. उसको खाना पानी दिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.रत्नावती ने यात्री को बताया कि पास के जंगल से निकले डाकुओं ने उन सबको लूटा और फिर उसको कुंएं में फेंक कर भाग गये. मैं प्रसिद्ध सेठ हेमगुप्त की पुत्री हूं.
यात्री ने रत्नावती को सकुशल उसके घर पहुंचा दिया. स्त्री ने घर जाकर हेमगुप्त से कह दिया कि रास्ते में डाकुओं ने हमारे गहने छीन लिये और दासी को मारकर, मुझे कुएं में ढकेलकर, भाग गये. इस बीच पतिदेव पर क्या गुजरी नहीं पता.
हेमगुप्त ने उसे ढांढस बंधाया कि बाप ने उसे ढांढस बँधाया और कहा कि तू चिन्ता मत कर,निश्चित ही तेरा स्वामी जीवित होगा और वह किसी दिन आ जायेगा.
उधर वह लड़का पत्नी के जेवर लेकर शहर पहुँचा. उसे तो जुए की बुरी लत लगी थी.
वह सारे गहने जुए में हार गया. जब सब पीछे पड़े तो वह यह बहाना बनाकर कि उसके लड़का हुआ है, फिर अपनी ससुराल भाग गया. वहाँ पहुँचते ही सबसे पहले उसकी पत्नी मिली. वह बड़ी खुश हुई. उसे तो काठ मार गया.
उसकी पत्नी ने कहा- आप कोई चिन्ता न करें, मैंने यहाँ आकर वह बात नहीं बताई. दूसरी ही बात कही है. जो कहा था, वह उसने ज्यों का त्यों बता दिया. उधर सेठ अपने जमाई से मिले. जमाई को जीवित और स्वस्थ देख कर वे बड़े प्रसन्न हुए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.कुछ दिन तक तो वह एक बढिया जमाई की तरह सुख भोगता रहा पर कुछ और समय बीतने के बाद एक दिन जब पत्नी गहने पहने सो रही थी, उसने चुपचाप छुरे से उसका गला रेत दिया और उसके गहने लेकर चम्पत हो गया.
मैना बोली- तो देखा महाराज, यह सब मैंने अपनी आँखों से देखा है. ऐसा पापी होता है आदमी! मैना की बात सुनने के बाद राजा ने उसका कोई उत्तर तो नहीं दिया वरन तोते से कहा- क्या इसका कोई उत्तर तुम्हारे पास है, अब तुम बताओ कि स्त्री क्यों बुरी होती है?
मैंना के आक्षेप पर तोता भी तैश में आ गया. तोता बोला स्त्रियों के आचरण के विषय में मैंनो जो कहा है वह भी ऐसे नहीं कहा. मैं भी आपको स्त्री के त्रियाचरित्र की एक कथा सुनाता हूं.
तोते ने राजा को स्त्री की धोखेबाजी की और झूठ की जो कहानी सुनायी उसे हम अगले भाग में सुनायेंगे.
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
मित्रों भविष्य पुराण से हम किंकर(वेताल) कथाएं सुना रहे हैं और आप उन्हें पसंद कर रहे हैं इसका आभार. आप इन्हें कथा रूप में तो लें ही साथ ही इसमें वेताल के माध्यम से बहुत से संकेत भी हैं.
शिवजी ने विक्रमादित्य के सत्य की सेवा में अपने दूत शिवकिंकर यानी वेताल को भेजा था. वेताल सिंहासन बत्तीसी का प्रहरी था जो कथाओं के माध्यम से तरह-तरह के प्रश्न पूछकर सिंहासन पर बैठे विक्रमादित्य के निर्णयशक्ति की जांच कर रहा था.
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