पांच प्रेतों के चंगुल में पड़े भक्त की रक्षा को तत्काल पहुंचे श्रीकृष्ण. कौन है ये पांच प्रेत- अंतिम भाग

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जो प्रेत संतप्तक को मारकर उसका मांस खाने को लड़ रहे थे, अचानक उन्होंने उसे छोड़ दिया और फिर प्रणाम करके प्रदक्षिणा करने लगे. इससे संतप्तक आश्चर्य में था.
संतप्तक ने पांचों प्रेतों से उनके प्रेत बनने के कारण और विचित्र नामों का रहस्य पूछा तो प्रेतों ने बारी बारी से बताना आरंभ किया. सबसे पहले पर्युषित बोला.
आप विद्वान हैं अत: यह तो जानते ही हैं कि पर्युषित बासी भोजन को कहते हैं. मैने श्राद्ध के समय एक ब्राह्मण का अपने घर न्योता दिया था. ब्राह्मण बहुत वृद्ध था. मार्ग में धीरे धीरे चलने के कारण कुछ विलंब से मेरे घर पहुंचा.
मुझे सुबह से ही भूख लग रही थी. मैं अपनी भूख को सह नहीं पाया. मैंने न तो ब्राह्मण की प्रतीक्षा की, न ही कोई श्राद्ध कार्य किया. भूख से बेचैन होकर मैंने श्राद्ध हेतु बने भोजन को चुपके से खा लिया.
विलंब से पहुंचे ब्राह्मण के लिए कुछ भी नहीं बचा था. मैंने चालाकी से पर्युषित यानी बासी भोजन उसे खिला दिया. जानबूझ कर किए इसी पाप से मुझे इस प्रेत योनि की प्राप्ति हुयी. ब्राह्मण को पर्युषित भोजन देने के कारण मेरा यह नाम पडा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.दूसरा प्रेत सूचीमुख बोला- मैं उस समय एक बलिष्ठ क्षत्रिय युवक था. एक ब्राह्मणी अपने पांच वर्षीय एकलौते पुत्र के साथ तीर्थस्नान का लाभ लेने भद्रवट गयी. मैं बड़ा दबंग और लुटेरा था और रास्ते चलते लोगों का सामान छीन लिया करता था.
मैंने उस ब्राह्मणी के लडको जोर का घूंसा मारा और दोनों के वस्त्र और खाने का सामान छीन लिया. प्यास से व्याकुल और सर पर वार से चकराया वह लडका जब अपनी माता से लेकर जल पीने को मांगने लगा तो मैंने डपट दिया.
भयानक डपट सुनकर वह बालक भय से बुरी तरह सहम गया. मैंने उसका जलपात्र उससे छीन लिया. उसमें थोडा सा ही जल बचा हुआ था. सारा जल मैंने ही पी लिया. इस तरह डर और प्यास से व्याकुल उस बालक की कुछ ही देर में मृत्यु हो गयी.
अपनी आंखों के सामने अपने प्यारे पुत्र को दम तोड़ते देख उसकी मां ने भी पास के कुएं में कूदकर जान दे दी. हे ब्राह्मण श्रेष्ठ इस पाप से मैं प्रेत बना. इस पाप के चलते पहाड़ जैसा शरीर होने पर भी मेरा मुख सुई की नोक के बराबर ही है.
मैं बलवान हूं. छीन झपटकर भोजन आसानी से प्राप्त कर लेता हूं. पर सुई के छेद जैसे मुख से उसको खाने में असमर्थ हूं. भूख से व्याकुल बालक का भोजन छीनकर मैंने उसका मुंह बन्द किया था. इससे मेरा मुंह सुई के नोक जैसा हुआ और मुझे सूचीमुख कहते हैं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.अब शीघ्रगबोला- मैं तो एक धनवान वैश्य था. कारोबार के लिए देश परदेश की यात्रा करता ही रहता था. एक बार अपने एक घनिष्ठ मित्र के साथ व्यापार करने दूसरे देश को गया.
दुर्भाग्य से इस यात्रा में व्यवसाय मेरे मन के अनुसार नहीं हुआ. हर जगह घाटा ही हुआ स्थिति ऐसी भी आयी कि मेरा धन समाप्त हो चुका था. मेरे मित्र के पास बहुत धन था. मेरे मन में उस धन के लिए लोभ आ गया.
एक बार हम दोनों नाव से एक नदी से एक स्थान से दूसरे स्थान को जा रहे थे . जल मार्ग लंबा और नदी विशाल और गहरी थी. मेरा मित्र थककर सो गया.
लालच से मेरी बुद्धि क्रूर हो उठी थी. मैंने उचित अवसर भांपकर अपने मित्र को नदी में धकेल दिया. नाविक सहित कोई भी इस बात को न जान सका. मित्र के हीरे, जवाहरात सोना आदि लेकर मैं अपने देश लौट आया.
सारा सामान अपने घर में रखकर मैंने मित्र की पत्नी से जाकर कहा कि मार्ग में डाकुओं ने मेरे प्यारे मित्र को मारकर सब सामान छीन लिया. मैं बहुत दुःखी हूं और किसी तरह से जान बचा कर भाग आया हूं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.मेरे मित्र की पत्नी ने सब की ममता त्यागकर तत्काल ही अपने पति के वियोग शोक में आग लगा कर जान दे दी. मैं बाधाविहीन हो, प्रसन्न मन घर लौट आया. जीवन भर उस धन का उपभोग किया, आनंद लूटा.
पर जब मैं मरा तो मेरा यह पाप कि मित्र को नदी में फेंक कर शीघ्र घर लौट आया, उसके कारण मुझे प्रेत योनि भुगतने का दंड मिला और उस प्रकरण के चलते मेरा नाम शीघ्रग हुआ.
रोधक बोला- हे विप्रवर, मैं शूद्र जाति का था. राजा और राज्य की अच्छी सेवा के बदले राजा से मुझे उपहार में सौ गांव मिले थे. मेरे परिवार में वृद्ध माता पिता और एक छोटा सगा भाई था. लोभ से मैंने भाई को अलग कर दिया.
मेरे पास अपार धन था जबकि भाई, भोजन वस्त्र की कमी से दुखी रहने लगा. उसे दुखी देखकर मेरे माता पिता मेरे मना करने पर भी मुझसे छिपाकर उसकी सहायता कर देते थे. कभी वस्त्र देते तो कभी भोजन और अन्न.
जब मुझे यह बात पता चली तो क्रोधित होकर मैंने माता पिता को जंजीरों से बांधकर एक सूने घर में डाल दिया. अकेलेपन और कष्ट से कुछ दिन बाद वे वहीं जहर खाकर मर गए. माता-पिता के मरने से छोटे भाई के पास कोई सहारा न रहा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.छोटा भाई भी भूख से व्याकुल इधर उधर भटकता हुआ मर गया. इस पाप से मुझे यह प्रेत योनि मिली. अपने माता पिता को बन्दी बनाने और रोक कर रखने के कारण मेरा नाम रोधक पडा.
लेखक बोला- मैं उज्जैन का ब्राह्मण था. लोग मेरी प्रतिष्ठा मानते थे क्योंकि मैं वहां के प्रसिद्ध और संपन्न मन्दिर में पुजारी था. राजा भी कभी कभी उस मंदिर में पूजा को आते. उस मन्दिर में सोने की बनी और रत्न से जडी हुई बहुत सी मूर्तियां थीं.
उन रत्नों को देखकर मेरे मन में पाप आ गया और मैंने नुकीले लोहे से मूर्ति के नेत्रों से चमकते रत्न निकाल लिये. क्षत विक्षत और नेत्रहीन विरूपित मूर्ति बहुत ही विकृत दिखने लगी.
संयोग से अगली ही सुबह राजा उसी मंदिर में पूजा करने आ गया. मैं इस घटना से अनभिज्ञता जताते हुये वहीं पर था ही. आखिर मुझ पर किसी को कहां शंका होती. विकृत, विरूपित अंधी देव मूर्तियां देख धर्मालु राजा क्रोध से तमतमा उठा.
राजा ने वहीं अपनी अंजुली में जल उठाकर प्रतिज्ञा की कि जिसने भी चोरी की है वह श्रेष्ठ ब्राह्मण ही क्यों न हो, उसको प्राणदंड देगा. यह सुनकर मैं बुरी तरह डर गया. मैंने रात में चुपके से राजा के महल में जाकर तलवार से उसका सिर काट दिया.
चोरी के सामान के साथ मैंने उज्जैन छोड़ चल दिया. होने की किसे पता. कोई नहीं जानता उसकी मृत्यु कैसे होनी है. रास्ते में जंगल पड़ा. वहां बाघ ने मुझे मार डाला. नुकीले लोहे से प्रतिमा को छेदने और काटने का कार्य करने के कारण मैं नरक भोगने के बाद लेखक नामक प्रेत हुआ.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.ब्राह्मण ने कहा- मैं समझ गया कि तुम्हारे दुष्कर्मों के अनुसार ही तुम्हारे नाम पड़े हैं. मैं तुम सबके आचरण और आहार के बारे में जानना चाहता हूं.
प्रेतों ने बताया- जिस घर में श्राद्ध तर्पण, भक्ति-पूजा नहीं होती, अशौच, अशुद्धि रहती है. हम उसके शरीर से मांस और रक्त चूसकर उसे पीड़ित करते हैं.
मांस खाना, रक्त पीना ही हमारा आचरण है. मल और विभिन्न अभक्ष वस्तुएं ही हमारा भोजन है. हम सब अज्ञानी, तामसी और मन्दबुद्धि हैं. जाने कैसे अचानक ही हमें अपने पूर्वजन्म की स्मृति हो गई. हमने कैसा व्यवहार किया, क्यों किया, हम यह नहीं जानते.
कथा सुनाकर श्रीकृष्ण गरूड़ से बोले- प्रेतों का वार्तालाप पूरा होते ही मैंने उन्हें दर्शन दिया. ब्राह्मण ने मेरी अर्चना कर प्रेतों के उद्धार की प्रार्थना की. मैंने ब्राह्मण और प्रेतों का उद्धार करते हुए ब्राह्मण संतप्तक समेत पांचों प्रेतों को भी अपने लोक में वास दिया.
प्रभु ने कहा- कर्मों के अनुसार दंड भोगना ही पड़ेगा. निकृष्ट कर्म करने वाला दंड से बच नहीं सकता. अज्ञानतावश उसे भ्रम होता है कि उसका पाप गुप्त रहेगा. फिर दैवयोग से उसमें भक्तिभाव जाग्रत होने के बाद ही उसका कल्याण होता है.
यदि मनुष्य अपना कल्याण चाहता है तो उसे पापों से दूर रहना चाहिए. यदि अज्ञानतावश कोई पाप हो जाए तो उसका तुरंत पश्चाताप करे अन्यथा उसे इस जन्म और अगले जन्म में इन पापों का कई गुणा दंड भोगना पड़ता है.
संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली
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