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परन्तु मैंने वर के जो-जो दोष बतलाए हैं, मेरे अनुमान से वे सभी शिवजी में हैं. यदि शिवजी के साथ पार्वती का विवाह हो जाए तो दोषों को भी सब लोग गुणों की खान समान ही कहेंगे.
जौं अहि सेज सयन हरि करहीं। बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहीं॥
भानु कृसानु सर्ब रस खाहीं। तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ नाहीं॥3॥
जैसे विष्णु भगवान शेषनाग की शय्या पर सोते हैं, तो भी ज्ञानीजन उनको दोषरहित ही मानते हैं. सूर्य और अग्निदेव अच्छे-बुरे सभी रसों का भक्षण करते हैं, परन्तु उनको कोई बुरा नहीं कहता.
सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई॥
समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं। रबि पावक सुरसरि की नाईं॥4॥
गंगाजी में शुभ और अशुभ सभी जल बहता है, पर कोई उन्हें अपवित्र नहीं कहता। सूर्य, अग्नि और गंगाजी की भाँति समर्थ को कुछ दोष नहीं लगता.
नारदजी हिमवान और मैना के मन को शांति पहुंचाने के लिए तरह-तरह की उपमाएं देते हैं. वह शिवजी के अमंगल वेष को दूसरों के लिए मंगल का कारक बताते तरह-तरह से समझाते हैं. यब प्रसंग कल.
संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली
