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श्रीरामचरितमानस-बालकांडः समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं, रबि पावक सुरसरि की नाईं

श्रीरामचरितमानस-बालकांडः समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं, रबि पावक सुरसरि की नाईं

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सतीजी ने श्रीहरि से शरीर त्यागने से पहले आशीष मांगा कि हर जीवन और स्वरूप में उन्हें महादेव का साथ ही मिले. श्रीहरि के आशीर्वाद से सतीजी पुनः पर्वतराज हिमवान की पत्नी मैना के गर्भ से प्रकट हुई हैं.

हिमवान से मिलने नारदजी आए हैं. हिमवान के अनुरोध पर नारदजी ने पार्वतीजी का भविष्य बांचा है. उन्हें समस्त सौभाग्य और सद्गुणों से युक्त बताया है किंतु उनका पति गुणहीन, मानहीन, जटाधारी, योगी और अमंगल वेषधारी होगा. हिमवान और मैना अपनी पुत्री का भाग्य जानकर दुखी हैं.

चौपाई :
सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी। दुख दंपतिहि उमा हरषानी॥
नारदहूँ यह भेदु न जाना। दसा एक समुझब बिलगाना॥1॥

नारदजी का कथन सुनकर और उसे हृदय में सत्य जानकर हिमवान और मैना को बहुत दुःख हुआ परंतु पार्वतीजी प्रसन्न हुईं. नारदजी भी इस रहस्य को नहीं जान सके क्योंकि सबकी बाहरी दशा एक सी होने पर भी भीतरी समझ अलग-अलग थी.

सकल सखीं गिरिजा गिरि मैना। पुलक सरीर भरे जल नैना॥
होइ न मृषा देवरिषि भाषा। उमा सो बचनु हृदयँ धरि राखा॥2॥हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
सारी सखियां, पार्वती, पर्वतराज हिमवान और मैना सभी के मन पुलकित थे और सबके नेत्रों में जल भरा था. देवर्षि के वचन असत्य नहीं हो सकते. यह विचारकर पार्वतीजी ने उनकी बातों को हृदय में धारण कर लिया.

पार्वतीजी सोच रही हैं कि ऐसा उत्तम सुहाग तो पुण्यकर्मों के प्रताप से मिलता है किंतु माता-पिता का हृदय तो पुत्री को ऐश्वर्य से परिपूर्ण देखने की लालसा रखता है. पार्वतीजी के मन में शिवजी के लिए अनुराग उत्पन्न हुआ है.

उपजेउ सिव पद कमल सनेहू। मिलन कठिन मन भा संदेहू॥
जानि कुअवसरु प्रीति दुराई। सखी उछँग बैठी पुनि जाई॥3॥

पार्वतीजी को शिवजी के चरण कमलों में स्नेह उत्पन्न हो आया परन्तु मन में यह संदेह भी है कि शिवजी का मिलना तो कठिन है. अवसर ठीक न जानकर उमा ने मन में शिवजी के लिए प्रेम को छिपा लिया और फिर सखी के साथ ठिठोली करने लगीं.

झूठि न होइ देवरिषि बानी। सोचहिं दंपति सखीं सयानी॥
उर धरि धीर कहइ गिरिराऊ। कहहु नाथ का करिअ उपाऊ॥4॥हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
देवर्षि की वाणी झूठी न होगी. यह विचारकर हिमवान, मैना और सारी चतुर सखियां चिन्ता करने लगीं फिर हृदय में धीरज धरकर पर्वतराज ने कहा- हे नाथ! कहिए, अब क्या उपाय किया जाए?

दोहा :
कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा लिलार।
देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार॥68॥

मुनीश्वर नारदजी ने कहा- हे हिमवान्‌! सुनो, विधाता ने ललाट पर जो कुछ लिख दिया है, उसको देवता, दानव, मनुष्य, नाग और मुनि कोई भी नहीं मिटा सकते.

चौपाई :
तदपि एक मैं कहउँ उपाई। होइ करै जौं दैउ सहाई॥
जस बरु मैं बरनेउँ तुम्ह पाहीं। मिलिहि उमहि तस संसय नाहीं॥1॥

तो भी एक उपाय मैं बताता हूँ. यदि दैव सहायता करें तो वह सिद्ध हो सकता है. उमा को वर तो निःसंदेह वैसा ही मिलेगा, जैसा मैंने तुम्हारे सामने वर्णन किया है.

जे जे बर के दोष बखाने। ते सब सिव पहिं मैं अनुमाने॥
जौं बिबाहु संकर सन होई। दोषउ गुन सम कह सबु कोई॥2॥हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
परन्तु मैंने वर के जो-जो दोष बतलाए हैं, मेरे अनुमान से वे सभी शिवजी में हैं. यदि शिवजी के साथ पार्वती का विवाह हो जाए तो दोषों को भी सब लोग गुणों की खान समान ही कहेंगे.

जौं अहि सेज सयन हरि करहीं। बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहीं॥
भानु कृसानु सर्ब रस खाहीं। तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ नाहीं॥3॥

जैसे विष्णु भगवान शेषनाग की शय्या पर सोते हैं, तो भी ज्ञानीजन उनको दोषरहित ही मानते हैं. सूर्य और अग्निदेव अच्छे-बुरे सभी रसों का भक्षण करते हैं, परन्तु उनको कोई बुरा नहीं कहता.

सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई॥
समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं। रबि पावक सुरसरि की नाईं॥4॥

गंगाजी में शुभ और अशुभ सभी जल बहता है, पर कोई उन्हें अपवित्र नहीं कहता। सूर्य, अग्नि और गंगाजी की भाँति समर्थ को कुछ दोष नहीं लगता.

नारदजी हिमवान और मैना के मन को शांति पहुंचाने के लिए तरह-तरह की उपमाएं देते हैं. वह शिवजी के अमंगल वेष को दूसरों के लिए मंगल का कारक बताते तरह-तरह से समझाते हैं. यब प्रसंग कल.

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली

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