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इंद्र के वध के लिए यज्ञकुंड से निकला वृटासुर, प्राण बचाने के लिए श्रीहरि के आदेश पर इंद्र ने दधीचि से मांगा अस्थिदानः भागवत कथा में आज दधीचि का प्रसंग

इंद्र के वध के लिए यज्ञकुंड से निकला वृटासुर, प्राण बचाने के लिए श्रीहरि के आदेश पर इंद्र ने दधीचि से मांगा अस्थिदानः भागवत कथा में आज दधीचि का प्रसंग

dadhichi
इंद्र द्वारा अपने पुत्र विश्वरूप का वध करने से क्रोधित त्वष्टा ने इंद्र को यज्ञकुंड में भस्म करने के लिए आहुति डालनी शुरू की. यज्ञ कुंड से एक भयानक असुर वृटासुर प्रकट हुआ.

त्वष्टा ने उसे इंद्र का वध करने का आदेश दिया. वृटासुर इतना भयंकर था कि उसे देखकर देवता जान बचाकर भागने लगे.

जो भी देव वृटासुर के सामने पड़ता वह उसे लील जाता. इंद्र ने उस पर वज्र चलाया तो वृटासुर ने पलटकर जोरदार आघात किया और इंद्र का वज्र ही टूट गया.

इंद्र के साथ-साथ देवता जान बचाने भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे. श्रीहरि ने यज्ञस्थल पर अपने पुरोहित की हत्या करने के लिए इंद्र को जमकर खरी-खोटी सुनाई.

इंद्र ने क्षमा मांगी. देवताओं द्वारा बार प्रार्थना करने पर श्रीहरि ने इंद्र से कहा- यदि तुम्हें अपनी और देवों की रक्षा करनी है तो अथर्व पुत्र दधीचि से सहायता मांगो.

घोर तप के कारण दधीचि की अस्थियां वज्र के समान कठोर हो चुकी हैं. उनकी अस्थियों से फिर से व्रज बनाना होगा और वृतासुर से युद्ध करना होगा.

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इस आदेश के पीछे एक रहस्य था. इंद्र का अभिमान चूर करने के लिए श्रीहरि ने इंद्र को उसी महर्षि दधीचि के पास भेजा जिनकी हत्या का इंद्र ने कभी प्रयास किया था.

एक बार महर्षि दधीचि ने बड़ा ही कठोर तप आरंभ किया. उनकी अपूर्व तपस्या के तेज से तीनों लोक प्रकाशित हो गए. इन्द्र का सिंहासन तक डोलने लगा.

इन्द्र को लगा कि दधीचि अपने कठोर तप से इन्द्र का पद प्राप्त करना चाहते हैं. इसलिये उन्होंने महर्षि की तपस्या को भंग करने का षडयंत्र रचा.

इंद्र ने स्वर्ग की अप्सरा अलम्बुषा के साथ कामदेव को दधीचि का व्रत भंग करने के लिए भेजा. अलम्बुषा और कामदेव ने खूब प्रयास किया लेकिन ऋषि अडिग रहे.

दोनों ने हार मान ली और स्वर्ग लौट आए. कामदेव और अप्सरा के निष्फल होने से इन्द्र का भय और बढ़ गया और उन्होंने महर्षि की हत्या करने का निश्चय किया.

इंद्र देवसेना लेकर दधीचि के आश्रम पर चढ़ आए. समाधि में लीन महर्षि पर कठोर-अस्त्र-शस्त्रों से प्रहार करना शुरू कर दिया लेकिन महर्षि का कोई अहित न कर सके.

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इंद्र ने समझ लिया कि दधीचि का सामना करने उनके बस के बाहर की बात है और वह स्वर्ग लौट गए. दधीचि ने इंद्र को ऐसे बर्ताव पर भी कुछ नहीं कहा था.

श्रीहरि के आदेश पर अस्थियां मांगने दधीचि के पास गए. इंद्र ने दधीचि को सारी स्थिति बताई और सकुचाते हुए उनकी अस्थियां मांगी.

दधीचि ने कहा-देवराज हर जीव अपने जीवन से प्रेम करता है और मैं भी जीने की कामना रखता हूं. क्या देवराज को किसी के प्राण असमय मांगना शोभा देता है?

तब इंद्र ने विनम्रता से दधीचि को सबकुछ बताकर कहा कि वह श्रीहरि के आदेश से उनके पास आए हैं. दधीचि ने विश्वकल्याण के लिए शरीर त्यागने का निर्णय किया.

उन्होंने समाधि ले ली. देहांत के बाद उनकी अस्थियां लेकर इंद्र ने विश्वकर्मा को दिया. विश्वकर्मा ने दधीचि की हडिड्यों से फिर से वज्र बनाकर इंद्र को दिया.

नर्मदा नदी के किनारे भयंकर देवासुर संग्राम हुआ जिसमें एक ओर इंद्र थे तो दूसरी ओर वृटासुर. वृटासुर के साथ युद्ध में इंद्र परास्त होने लगे.

वृटासर द्वारा निगल लिए जाने पर इंद्र की रक्षा उसी नारायण कवच से हुई जो विश्वरूप से उन्हें दी थी. भागवत में वृटासुर-इंद्र युद्ध का प्रसंग बहुत सुंदर है. इस पर चर्चा अगले भाग में करेंगे.

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