भागवत कथाः श्रेष्ठ दानशील राजा रंतिदेव की कथा
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भरद्वाज ने राजा भरत का कुल आगे बढ़ाया. उसी कुल में आगे चलकर राजा रंतिदेव हुए. महाराज रंतिदेव ने आकाश के समान बिना उद्योग किए दैववश प्राप्त संपत्ति का उपभोग करते.
इस तरह उनकी संपत्ति समाप्त होती गई. उन्हें संग्रह पर यकीन न था. इसलिए संग्रह नहीं करते थे. आहार स्वरूप जो मिल जाता वह ग्रहण कर लेते नहीं मिलता तो उपवास कर लेते.
एक बार 48 दिनों तक उन्हें अन्न और जल नसीब न हुआ. उन्चासवें दिन उन्हें कुछ घीस खीर व हलवा तथा जल प्राप्त हुआ. 48 दिनों से भूखा-प्यासा राजा के परिवार को राहत मिला.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.रंतिदेव का परिवार उसे ग्रहण करने की तैयारी कर ही रहा था कि उसी समय एक ब्राह्मण आए. रंतिदेव ने उस भोजन में से ब्राह्मण को भी खिलाया. बचे हुए अन्न को परिवार ने आपस में बांट लिया.
वे लोग खाने बैठे ही थे कि तभी एक शूद्र आया और उसने प्राणरक्षा के लिए अन्न मांगा. रंतिदेव ने उसे भी भोजन कराया. उसके बाद बचे हुए भोजन को सभी ग्रहण करने की तैयारी करने लगे.
तभी एक अतिथि आया जिसके साथ एक कुत्ता भी था. उसने भी स्वयं के लिए और कुत्ते के लिए आहार मांगा. रंतिदेव ने बचा हुआ सारा भोजन उन्हें दे दिया. अब सिर्फ एक व्यक्ति के लिए पर्याप्त जल बचा था.
रंतिदेव का परिवार उस जल को बांटकर पीने ही जा रहा था कि एक चांडाल आ पहुंचा. उसने कहा मैं अत्यंत पीड़ित हूं. हीन कुल में पैदा हुआ इसलिए किसी ने सहायता नहीं की. मुझे थोड़ा जल ही दे दीजिए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.रंतिदेव ने वह जल उसे दे दिया. चांडाल के जल पीते ही वहां पर ब्रह्मा-विष्णु-महेश प्रकट हो गए. रंतिदेव ने उन्हें प्रणाम किया. देवों ने उनसे अभीष्ट मांगने को कहा.
रंतिदेव ने मांगा- प्रभु संसार की किसी भी आसक्ती और स्पृहा मे नहीं लिप्त होना चाहता. मैं इन सबसे मुक्ति की कामना रखता हूं. मुझे भक्ति में लीन होना चाहता हूं.
श्रीहरि की इस मनोकामना से देवतागण बड़े प्रसन्न हुए. श्रीहरि ने उन्हें अपने अंदर लीन कर लिया और राजा के परिजनों को महादानियों में श्रेष्ठ पद पर आसीन किया.
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
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