जो प्राप्त है, वह पर्याप्त है, कीमती उपहार के बदले संतोष चुनने वाला योगी बना राजपुरुष- प्रेरक कथा

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एक राजा समय-समय पर प्रतियोगिताएं आयोजित करवाता और विजेता को सम्मान सहित पुरस्कार भी देता. प्रजा इससे उत्साहित रहती थी. एक बार राजा ने राजपुरुष के चयन की प्रतियोगिता रखी.
उसने एक वाटिका बनवाई जिसमें हर तरह की वस्तुएं रखी गईं लेकिन उन पर उनका मूल्य नहीं लिखा. राजा ने ऐलान किया कि जो व्यक्ति इनमें से सबसे कीमती वस्तु लेकर वाटिका से बाहर आएगा उसे राजपुरुष घोषित किया जाएगा.
लोग वाटिका में जाते और अपनी समझ से सबसे मूल्यवान वस्तु उठा लाते. कोई हीरे-जवाहरात लाया, कोई पुस्तक उठाकर लाया क्योंकि उसके लिए ज्ञान अधिक मूल्यवान था।हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.एक गरीब रोटी उठाकर लाया क्योंकि उसकी नजर में रोटी ही मूल्यवान थी. एक भक्त ईश्वर की मूर्ति उठाकर लाया. राजा सभी से उन वस्तुओं के बारे में पूछता जो वे उठा थे.
तभी एक योगी आया. वाटिका में काफी देर घूमने के बाद वह खाली हाथ बाहर निकला. राजा योगी से पूछा- आप क्या लेकर आए? योगी ने कहा- मैं आपके बाग से संतोष लेकर आया हूं, महाराज. राजा ने पूछा- यह संतोष क्या सबसे मूल्यवान है?
योगी ने जवाब दिया- हां, महाराज इस वाटिका में आपने जितनी भी वस्तुएं रखी हैं, उन्हें प्राप्त करके खुशी तो जरूर होगी लेकिन वह होगी अस्थाई और क्षणिक. इसे हासिल कर लेने के बाद फिर कुछ और पाने के लिए मन बेचैन होगा.
परंतु जिसके पास सच्चा संतोष है. वह सभी इच्छाओं से ऊपर होगा और सुखी रहेगा. मै वैसे भी यहां कुछ प्राप्त करने के लिए आय़ा ही नहीं था. मैं तो बस देखना चाहता था कि मानव मन को भटकाने के लिए कौन-कौन सी मरीचिकाएं रखी गई हैं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.योगी चलने हुआ तो राजा ने उसे रोक लिया और कहा आप ही राजपुरुष घोषित होने योग्य हैं. योगी ने तो संतोष साध रखा था. इसलिए उसने कहा- यह पद मेरे किसी उपयोग का ही नहीं है.
राजा ने कहा- इसीलिए आपको राजपुरुष बनाना चाहता हूं. राजपुरुष को कई विशेष अधिकार होते हैं. अन्य राज्यों जाने पर भी उसे विशेष अधिकार मिलते हैं. जिसे पद की लालसा ही नहीं वह पद का दुरुपयोग कर ही नहीं सकता.
राजा ने योगी को मना लिया और राजपुरुष घोषित किया. संतोषम् परमं सुखम्. संतोष अनमोल है. कुछ पा लेने की इच्छा, सबकुछ पा लेने की इच्छा में बदल जाती है और ऐसा अंतोष पनपता है कि इंसान बहुत कुछ पाकर भी सबकुछ से हीन ही समझता रहता है.
कुछ पाने की लालसा से मुक्त व्यक्ति के पास कुछ भी न होते हुए ऐसा आभास होता है कि उसके पास कोई कमी नहीं है. जो प्राप्त है वह पर्याप्त है के भाव में वह मानसिक शांति में रहता है.
संकलनः बीर सिंह
संपादनः प्रभु शरणम्
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