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भागवत कथाः मरूदगणों ने भरत को प्रदान किया बृहस्पति का औरस पुत्र भारद्वाज

भागवत कथाः मरूदगणों ने भरत को प्रदान किया बृहस्पति का औरस पुत्र भारद्वाज

lordvishnu
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भरत चक्रवर्ती सम्राट हुए. उन्होंने 133 अश्वमेध यज्ञ करके संपूर्ण धरा को एकछत्र के अंतर्गत किया और उसका नाम भारतवर्ष पड़ा. उनकी कीर्ति ऐसी थी कि वह स्वर्ग को धरती से हाथ उठाकर छू सकते थे.

भरत की रानियों से तीन पुत्र हुए लेकिन भरत को तीनों में से किसी में भी अपने उत्तराधिकारी का गुण नहीं दिखा. इस भय में कि कहीं अयोग्य पुत्र जन्म देने के कारण महाराज उनका त्याग न कर दें, रानियों ने पुत्रों की हत्या कर दी.

इससे भरत के वंश को आगे बढ़ाने का संकट पैदा हो गया. वंश को आगे बढ़ाने के लिए भरत ने मरुत्सोम नामक यज्ञ किया. मरूदगणों ने प्रसन्न होकर उन्हें अपने द्वारा पालित भरद्वाज नामक पुत्र प्रदान किया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.भरद्वाज बृहस्पति और उतथ्य की पत्नी ममता के पुत्र थे. ममता अपूर्व सुंदरी थीं. वह बृहस्पति के प्रति प्रेम रखती थीं. एक बार बृहस्पति कामपीड़ित हुए और अपनी भाभी से प्रेम निवेदन किया.

ममता ने समझाया कि बृहस्पति का तेज अमोघ है. उसके प्रभाव से उन्हें गर्भ ठहरेगा लेकिन गर्भ में पहले से ही शिशु है जिसे षडंग वेदों का ज्ञान हो चुका है. गर्भ में दूसरे शिशु के लिए अभी स्थान नहीं है.

बृहस्पति ममता के समझाने पर भी नहीं माने और रमण किया. गर्भस्थ शिशु दीर्धतमा ने बृहस्पति को रोकना चाहा लेकिन दैवयोग से कामांध हुए बृहस्पति ने दीर्घतमा को अंधा होने का शाप दे दिया.

गर्भ में पुनः शिशु के आ जाने से ममता डर गईं और उन्होंने उसका त्याग करना चाहा तो बृहस्पति ने कहा- यह मेरा औरस पुत्र और मेरे भैया का क्षेत्रज पुत्र होगा. इस तरह दोनों का पुत्र द्वाज है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.माता-पिता दोनों ने ही उसके भरण से किनारा किया तो मरूदगणों ने उन्हें पाला और उनका नाम हुआ भरद्वाज. भरद्वाज के जन्म के लिए दीर्घतमा के साथ अन्याय हुआ इसलिए ममता ने उसे वितथ नाम भी दिया.

भरत का वंश चलाने के लिए उनके समान ही पौरूष और तेज वाले संतान की आवश्यकता थी. इसलिए मरूद्गणों ने भरद्वाज को भरत को प्रदान कर दिया. भरत ने जन्मांध दीर्घतमा को पुरोहित बनाकर अश्वमेध यज्ञ कराए थे.

इस तरह भरद्वाज का जन्म ब्राह्मण कुल में और भरण क्षत्रिय कुल में हुआ. भरद्वाज ने भरत का वंश आगे बढ़ाया. उस वंश में रंतिदेव हुए. रंतिदेव की कथा आगे सुनाएंगे.

संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्

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