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महादेव को हर्षित करने के लिए श्रीराम को करना पड़ा स्वयं महादेव से ही युद्ध

महादेव को हर्षित करने के लिए श्रीराम को करना पड़ा स्वयं महादेव से ही युद्ध

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शत्रुघ्न के नेतृत्व में श्रीराम का अश्वमेघ का घोड़ा देवपुर पहुंचा. वहां के राजा वीरमणि श्रीराम एवं महादेव के बड़े भक्त थे. रामसेना में हनुमान, सुग्रीव और भरत पुत्र पुष्कल जैसे महारथी चल रहे थे जिन्हें जीतना देवताओं के लिए भी संभव नहीं था.

वीरमणि के दोनों बेटे रुक्मांगद और शुभंगद भी बड़े वीर थे. राजा वीरमणि ने तप से भगवान शंकर को प्रसन्न किया था. महादेव ने उनकी और उनके राज्य की रक्षा का वरदान दिया था.

महादेव के द्वारा रक्षित होने के कारण कोई भी देवपुर राज्य पर आक्रमण करने का साहस नहीं करता था. वीरमणि के पुत्र रुक्मांगद ने अश्वमेध का अश्व पकड़ लिया. उसने शत्रुघ्न को युद्धकर घोड़ा छुड़ा लेने की चुनौती दी.

जब वीरमणि को पता चला कि उनके बेटे ने अनजाने में श्रीराम के यज्ञ का घोडा पकड़ लिया है तो वह चिंतित हुए. वीरमणि ने बेटे को समझाया कि श्रीराम से शत्रुता नहीं करनी चाहिए. उनका घोडा वापस लौटा दो.

रुक्मांगद ने कहा कि अब तो उसने शत्रुघ्न को चुनौती भी दे दी है, इसलिए पीछे हटने से हमारा और प्रभु राम दोनों का अपमान होगा. वीरमणि से आज्ञा लेकर रुक्मांगद श्रीराम की सेना से युद्ध के लिए तैयार हुआ.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.अब बात श्रीराम के सम्मान की हो गई तो वीरमणि को भी अपने भाई वीरसिंह और दोनों पुत्रों के साथ युद्ध में आना पड़ा. रुक्मांगद की चुनौती पर शत्रुघ्न युद्ध के लिए तैयार हुए तो भरत पुत्र पुष्कल उन्हें रोककर स्वयं युद्ध के लिए जाने की जिद की.

हनुमानजी सारी बातें सुन रहे थे. उन्होंने बताया कि स्वयं भोलेनाथ वीरमणि की रक्षा करते हैं इसलिए युद्ध को टालने का प्रयास करें. उन्होंने वीरमणि को समझाकर युद्ध टालने की सलाह दी. उन्होंने श्रीराम को सारी बातें बता देने की भी सलाह दी.

हनुमानजी की बात पर शत्रुघ्न तुनक गए. उन्होंने हनुमानजी को कहा कि श्रीराम को युद्ध भूमि में आने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी . भयानक युद्ध छिड़ा. पुष्कल राजा वीरमणि से भिड़ गया. दोनों में घमासान युद्ध हुआ.

अंत में पुष्कल ने वीरमणि पर आठ नाराच बाणों से प्रहार किया. वीरमणि बेहोश होकर गिर पड़े. उधर वीरमणि के भाई वीरसिंह को हनुमानजी ने बुरी तरह घायल कर दिया. शत्रुघ्न ने वीरमणि के पुत्रों को नागपाश में बांध लिया.

वीरमणि की बेहोशी टूटी तो उन्होंने महादेव को पुकारा. भक्त को मुसीबत में देख महादेव ने सेनापति वीरभद्र के नेतृत्व में नंदी, भृंगी सहित अपने सभी वीर शिवगणों को युद्ध के लिए भेज दिया. महादेव की सेना देखकर शत्रुघ्न कांपने लगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उन्होंने हनुमानजी से कहा कि जिस वीरभद्र ने दक्ष प्रजापति का सिर काट डाला था और जो स्वयं महाकाल की छाया है, उसे युद्ध में हराने का उपाय बताइए. परंतु इससे पहले कि हनुमानजी कुछ सोच पाते पुष्कल वीरभद्र से जा भिड़े.

वीरभद्र ने पुष्कल को कहा कि वह वीरभद्र से न भिड़े, किसी अन्य को भेजे लेकिन पुष्कल पीछे नहीं हटे. पुष्कल ने वीरभद्र पर शक्ति का प्रहार कर दिया. वीरभद्र चक्कर खाकर गिर पड़े. वीरभद्र के क्रोध की सीमा न थी. उन्होंने त्रिशूल से पुष्कल का सिर काट लिया.

नंदी ने शिवास्त्र का प्रयोग कर हनुमानजी को बांध लिया. श्रीराम सेना को हारता देख वीरमणि की सेना में उत्साह आ गया. हनुमानजी की सलाह पर सब श्रीराम को प्राण रक्षा के लिए पुकारने लगे. पुकार सुन श्रीराम, लक्ष्मण और भरत के साथ वहां आ गए.

भरत ने पुष्कल का शव देखा तो वह शोक में मूर्छित हो गए. श्रीराम को क्रोध आया उन्होंने युद्ध शुरू किया. शिवगणों पर उन्होंने महर्षि विश्वामित्र द्वारा दिए दिव्यास्त्र चलाए. शिवगणों को साक्षात काल नजर आ रहा था. उन्होंने महादेव का आह्वान शुरू कर दिया.

अब महादेव स्वयं युद्ध के लिए आ गए. देवगण सांसें रोके आकाश से युद्ध देख रहे थे. जब भोलेनाथ ने युद्ध क्षेत्र में प्रवेश किया तो उनके तेज से श्रीराम की सेना मूर्छित हो गयी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.जब श्रीराम ने रणक्षेत्र में महादेव को देखा तो शस्त्र त्यागकर उन्हें प्रणाम कर स्तुति की. श्रीराम ने शिव की स्तुति करते कहा- आपके ही प्रताप से मैंने रावण का वध किया. यह अश्वमेघ यज्ञ भी आपकी ही इच्छा से हो रहा है. आप प्रसन्न हो युद्ध का अंत करें.

शिवजी बोले- हे प्रभु श्रीराम मैं तो स्वयं आपका अनुरागी हूं. आपसे युद्ध की सोच भी नहीं सकता लेकिन मैंने वीरमणि की रक्षा का वरदान दिया है. वरदान से पीछे नहीं हट सकता. आप संकोच छोड़ कर मुझसे युद्ध करके मुझे हर्षित करें.

महादेव की आज्ञा मान कर श्रीराम ने युद्ध आरंभ किया. भीषण युद्ध छिड़ गया. श्रीराम ने अपने सारे दिव्यास्त्रों का प्रयोग महादेव पर कर दिया पर वह महादेव को संतुष्ट नहीं हो सके. कोई राह नहीं निकल रही थी.

अंत में श्रीराम ने शिवजी के पाशुपत अस्त्र का संधान किया और महादेव से बोले- हे प्रभु, यह आपका ही दिया वरदान है. इस ब्रह्मांड में ऐसा कोई नहीं जो इस अस्त्र का सामना कर सके. हे महादेव आपकी ही आज्ञा और इच्छा से मैं आपपर इसका प्रयोग करता हूं.

श्रीराम ने दिव्यास्त्र भगवान शिव पर चला दिया. वह अस्त्र सीधा महादेव के हृदयस्थल में समा गया. भगवान रूद्र इससे संतुष्ट हो गए. उन्होंने श्रीराम से कहा कि आपने युद्ध में मुझे संतुष्ट किया है इसलिए जो चाहें वरदान मांग लें.

श्रीराम ने भरत के पुत्र पुष्कल के साथ युद्ध में मारे गए सभी योद्धाओं का जीवनदान मांगा. दोनों ओर के सारे योद्धा जीवित हो गए. वीरमणि ने यज्ञ का घोड़ा लौटा दिया और राजकाज रुक्मांगद को सौंप कर वह भी शत्रुघ्न के साथ अश्वमेध अभियान में चल पड़े.

संकलन व संपादन : प्रभु शरणम्

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