परशुराम कथाः शिवकृपा से मिले परशुराम को अमोघ अस्त्र, शापित गंधर्व बने बाघ से की बालक की रक्षा, भाग-6

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भार्गव परशुराम ने भगवान शिव के दिए परशु से असुरों का संहार कर देवताओं को भयमुक्त कर दिया. वे फिर से भगवान शिव के पास लौटे और उनकी स्तुति की.
शिवजी प्रसन्न होकर बोले- मैं तुमसे प्रसन्न हूं. कोई वरदान मांग लो. परशुराम बोले- हे प्रभु, आप सभी अस्त्र समूहों का ज्ञान मुझे प्रदान करें. शस्त्र और शास्त्रों में मुझसे श्रेष्ठ ज्ञाता दूसरा न हो. अपकी कृपा से तीनों लोक में मैं अजेय हो जाऊं.
भगवान शिव ने उन्हें चार प्रकार के आयुध, धनुष, बाण, कवच इत्यादि देने के साथ सुंदर रथ, अजेय होने एवं भूलोक में अपनी इच्छानुसार प्राणों के धारण करने का वरदान दे दिया.
राम ने यह सब ग्रहण करके कहा- भगवन, जब भी अस्त्रों और अन्य आयुधों की आवश्यकता को तो वे उपस्थित हो जाएं अन्यथा गुप्त रहें. शिवजी ने कहा- ऐसा ही होगा और अंतर्धान हो गए. सारे मनोरथ पूर्ण होने पर परशुराम चल पड़े.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
परशुराम कुछ ही आगे बढे होंगे कि उन्हें एक बालक की करूणाभरी पुकार सुनाई पड़ी. वह बालक बचाओ बचाओ की गुहार लगा रहा था. भय के चलते उसकी आवाज घुट जा रही थी फिर भी परशुराम को उसके रोने की आवाज सुनाई पड़ गयी.
उस छोटे बालक का जीवन संकट में देख परशुराम विद्युत गति से बालक के समीप पहुंच गए. बालक भय से पीला पड़ गया. एक बाघ बालक को अपना शिकार बनाने को तैयार था.
वह उसको लक्ष्यकर कूदा तो लगा कि अब निरीह बालक उसका शिकार हुए बिना नहीं बचेगा. बाघ हवा में ही था कि राम ने सामने से कुश का एक तिनका हाथ में ले अस्त्राग्नि का प्रयोग कर दिया.
बाघ बालक पर गिर उसे दबोचने वाला ही था कि भयंकर हुंकार और भीषण मंत्र के साथ चलाये उस अस्त्र ने बाघ को जला कर भस्म कर दिया. यह कार्य इतनी शीघ्रता से हुआ कि बालक को बाघ के पंजों, उसके नाखूनों से कोई चोट नहीं आयी थी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
बाघ के भस्म होते ही वहां एक गंधर्व उपस्थित हुआ जिसने परशुराम को प्रणाम कर कहा- एक ब्राह्मण के शाप से मेरी यह दशा हुई थी. आपने मुझे शापमुक्त कर दिया. अब मैं अपने धाम, स्वर्ग लोक को जाता हूं और वह स्वर्ग सिधार गया.
परशुराम बालक के पास पहुंचे. उन्होंने उसके शरीर पर हाथ फेरा. बालक ने आंखें खोल इधर उधर देखा और फिर राम को देख कर बोला आप कौन हैं और यहां कैसे आये. राम ने कहा तुम कौन हो,? पहले बताओ.
बालक बोला- मुझे अब भी चारों ओर बाघ ही दिख रहा है और उसकी उपस्थिति लग रही है. मैं शांत मुनि का पुत्र हूं. तीर्थ के लिए मैं शालग्राम गया वहां से गंधमादन पर्वत जाने की इच्छा हुई. हिमवान पर्वत से निकल रहा था कि भटक गया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
कोस भर गया था कि इस बीच बाघ ने आक्रमण कर दिया. मैं भयभीत हो भागा और फिर आपने मुझे बचा लिया. अब आप ही पिता की तरह मेरे जीवनदाता और सब कुछ हैं.
बाघ के आक्रमण से धराशायी होने और उसके नीचे आने पर भी कोई चोट न लगने के कारण उस का नाम अकृतव्रण पड़ा. अकृतव्रण के साथ परशुराम भी उसके साथ गए और कुछ समय तक शांत मुनि के आश्रम पर रहे. अकृतव्रण परशुराम का परम शिष्य बन चुका था.
(संदर्भ स्रोत: ब्रह्मांड पुराण)
भगवान परशुराम की कहानी में अकृतव्रण प्रकरण का इसलिए महत्व है क्योंकि संपूर्ण परशुराम चरित में हर स्थान पर अकृतव्रण की भूमिका है. वह साये की तरह उनके साथ रहे हैं. आगे जब राम इतनी सिद्धियां पाकर अपने घर मां पिता के पास पहुंचते हैं.
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