श्रीकृष्ण का रूक्मिणीजी से परिहासः अपूर्व सुंदरी रुक्मिणी ने क्यों चुन लिया काला-कलूटा रणछोड़ पति?
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भगवान श्रीकृष्ण अपनी रानियों से हास-परिहास कर रहे थे. रूक्मिणी जी को भगवान स्वयंवर से भगा लाए थे. उनरे भाई रुक्मी और अन्य राजाओं के साथ युद्ध भी करना पड़ा था.
एक दिन भगवान ने रुक्मिणीजी से कहा- प्रिय! बड़े-बड़े नरपति जो ऐश्वर्य में कुबेर और इंद्र जैसे थे, सुंदरता में कामदेव जैसे थे, बल में भी मुझसे बहुत आगे थे. फिर उन्हें छोड़कर मुझसे विवाह क्यों किया?
रूक्मिणी जी को छेड़ते हुए प्रभु बोले- मैं तो किसी भी प्रकार तुम्हारे योग्य नहीं. मैं तो जरासंध आदि राजाओं से डरकर समुद्र की शरण में आ बसा हूं. मेरे वेष का कोई ठिकाना नहीं है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.मेरा पिता कौन हैं? माता कौन हैं? ठीक प्रकार से इसका भी ठिकाना नहीं. कोई कहता है देवकी-वासुदेव का पुत्र है, कोई कहता यशोदा-नंदबाबा का पुत्र है. मैं तो रूप में भी काला हूं.
जो निर्धन दुखियारे हैं वे ही मेरा नाम लेते हैं. हम उनसे ही प्रेम करते हैं और वे लोग भी हमसे प्रेम करते हैं. जो स्वयं को धनवान समझते है वे मुझे प्रेम नहीं करते. देवी रूक्मिणी आपने निर्णय में चूक कर दी. भगवान ने चुटकी ली और मुस्काने लगे.
अब रुक्मिणीजी की बारी थी. वह बोलीं- प्रभु! बिलकुल सत्य कहा आपने. आप समुद्र में छिपकर रहते हैं. प्रभु! ह्रदय में तो काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ आदि बैठे हैं. आत्मा ही समुद्र है आप तो उस आत्मा रूपी समुद्र में रहते हैं.
रूक्मिणी आगे बोलीं- आपने कहा आपके वेष का ठिकाना नहीं, आपके माता-पिता का ठिकाना नहीं. तो प्रभु! आप तो जगत के पिता हैं. आपके पिता कौन हो सकते है!हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.आपने कहा आप काले हैं. प्रभु! अच्छा है आप काले हैं. काले होने पर दाढ़ी वाले(साधू-संत) और बिना दाढ़ी वाले (गोपियां) सभी आप पर मरते हैं. यदि गोरे होते तो जाने क्या हो जाता!
आपने कहा कि निर्धन आपका भजन करते हैं. निर्धनों (साधू संतों) के कहने पर मैंने आपसे विवाह किया. तो प्रभु मेरी दृष्टि में सारा जमाना निर्धन है और धनवान कौन है? जिसके पास रामनाम रूपी धन है, वही धनवान है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इस संसार से जाते समय सभी एक जैसे जाते हैं, धनी बनकर कौन जाता है? सब कुछ यहीं छूट जाता है परन्तु जिसके पास आपका नाम रूपी धन है वह तो मरकर भी वो अपने साथ अनंत धन ले जाता है.
रुक्मिणीजी का उत्तर सुनकर लीलाधर निरूत्तर होकर प्रसन्न मन से मुस्काराने लगे.
प्रभु भक्तों, अधिकमास आरंभ हो चुका है. यह पुरुषोत्तम मास है. यह नाम स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने दिया था. इस मास में हम श्रीकृष्ण लीलाएं देने का प्रयास कर रहे हैं. यह कथा हमें Whatsapp से मिली.
प्रभु शरणम्
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